ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
ज्योतिष वेदांगों में छठा अंग है, जिसे "वेदों का नेत्र" कहा गया है। यह खगोल विज्ञान और काल-गणना का शास्त्र है, जिसके द्वारा यज्ञों, अनुष्ठानों और मुहूर्तों का निर्धारण किया जाता है। वेदांग ज्योतिष के प्रणेता लगध ऋषि माने जाते हैं। इसमें ग्रहों, नक्षत्रों, ऋतुओं, अयनांश और चन्द्र-सौर गणना के सूत्र दिए गए हैं।
वेदांग ज्योतिष मुख्यतः गणितीय ज्योतिष (सिद्धांत) और फलित ज्योतिष (होरा) दोनों का आधार है। इसमें पंचांग की रचना, तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण का निर्धारण, और ग्रहणों की गणना के सिद्धांत विद्यमान हैं। बाद में आर्यभट्ट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त आदि ने इसी परंपरा को विकसित किया।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में वेदांग ज्योतिष के मूल श्लोकों के साथ काल-गणना, ग्रह-नक्षत्र विज्ञान और मुहूर्त सिद्धांत को सरल भाषा में समझाया गया है। यह पुस्तक ज्योतिषियों, पंचांग-निर्माताओं और भारतीय खगोल विज्ञान के इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए मूलभूत है।