ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
गन्धर्ववेद संगीत, नृत्य और नाट्य कला का प्राचीन शास्त्र है। इसे सामवेद का उपवेद माना जाता है। इस ग्रंथ में स्वर, राग, ताल, वाद्य यंत्र, नृत्य की मुद्राएँ, अभिनय, और रस-सिद्धांत का विस्तृत वर्णन है। गन्धर्ववेद के आधार पर ही बाद में भरतमुनि ने "नाट्यशास्त्र" की रचना की, जो संगीत, नृत्य और नाट्य का सर्वांगीण ग्रंथ है।
गन्धर्ववेद में गायन के लिए सप्त स्वर (षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद) और उनके शुद्ध एवं विकृत रूपों का वैज्ञानिक विश्लेषण है। तालों की गणना, वाद्य यंत्रों के निर्माण और वादन-विधि, तथा नृत्य के विभिन्न भेदों (तांडव, लास्य) का भी विवेचन है। यह ग्रंथ केवल कला-शिक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि भाव-अभिव्यक्ति, मनोविज्ञान, और रस-निष्पत्ति के सिद्धांतों का भी ज्ञान देता है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में गन्धर्ववेद के मूल सूत्रों के साथ संगीत-सिद्धांत, नृत्य-कला और नाट्य-विधान का सरल विवेचन किया गया है। यह पुस्तक संगीतकारों, नर्तकों, नाट्यकलाकारों और भारतीय कला-परंपरा के अध्येताओं के लिए अमूल्य है।