ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
भविष्य पुराण अट्ठारह महापुराणों में से एक है। इसका नाम "भविष्य" इसलिए है क्योंकि इसमें भविष्य की घटनाओं का वर्णन किया गया है। यह पुराण तीन पर्वों में विभक्त है – ब्रह्मपर्व, मध्यमपर्व और प्रतिसर्गपर्व। इसमें धर्म, व्रत, तीर्थ, दान, राजाओं की वंशावली, और कलियुग के लक्षण बताए गए हैं।
प्रतिसर्गपर्व सबसे चर्चित है – इसमें मुगल, ब्रिटिश और आधुनिक काल की घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जिससे विद्वान इसे ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानते हैं। इसमें भगवान कृष्ण, बुद्ध, शंकराचार्य और अन्य संतों की भविष्यवाणियाँ भी हैं।
भविष्य पुराण में सूर्योपासना का विशेष महत्व है। इसमें व्रतों (जैसे सूर्य षष्ठी, सावित्री व्रत) की विधियाँ, तीर्थों का माहात्म्य और दान-पुण्य के फल बताए गए हैं। उत्तरपर्व में भक्ति और मोक्ष का उपदेश है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल श्लोकों के साथ सरल व्याख्या दी गई है। यह पुराण इतिहास, धर्म और भविष्यदृष्टि में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत उपयोगी है।