ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
अथर्ववेद चार वेदों में चतुर्थ है। यह वेद ऋग्वेद के बाद सबसे बड़ा है। अथर्ववेद में २० कांड, ७३१ सूक्त और लगभग ६००० मंत्र हैं। इसे "लोकमान्य वेद" या "घरेलू अनुष्ठानों का वेद" कहा जाता है। इसमें ऋग्वेद की तरह देवताओं की स्तुति के साथ-साथ आयुर्वेद, रोगों के उपचार, गृहस्थ जीवन के संस्कार, तंत्र, मंत्र, और रक्षा के उपायों का विस्तृत वर्णन है।
अथर्ववेद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यह आयुर्वेद की नींव है। इसमें रोगों के निदान, औषधियों के गुण, और स्वास्थ्य रक्षा के लिए मंत्रों का संग्रह है। इसके अतिरिक्त, इसमें विवाह, गर्भाधान, पुंसवन, आदि संस्कारों के मंत्र, और अभिचार (शांति-अशांति) के प्रयोग भी हैं। "पृथ्वी सूक्त" (१२.१) में पृथ्वी की महिमा और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत उपदेश है। "स्कंभ सूक्त" (१०.७-८) में ब्रह्मांड के आधारस्तंभ का दार्शनिक वर्णन है।
अथर्ववेद लोक जीवन से सीधे जुड़ा हुआ है। यह वेद गृहस्थों के दैनिक कर्तव्यों, रोगों से रक्षा, और सुख-समृद्धि के उपायों का संग्रह है। आयुर्वेद, ज्योतिष और तंत्रशास्त्र के कई सूत्र इसी वेद से उद्धृत हैं।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल मंत्रों के साथ आयुर्वेदीय संदर्भ और अनुष्ठान विधियाँ दी गई हैं। यह संस्करण वैद्यों, तांत्रिक साधकों, गृहस्थों और शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी है।