ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
अष्टाध्यायी महर्षि पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ है। इसमें आठ अध्याय हैं, जो आगे चार-चार पादों में विभक्त हैं। कुल ३,९९६ सूत्रों में पाणिनि ने संस्कृत भाषा की संपूर्ण ध्वनि, शब्द-रचना, और वाक्य-विन्यास का अत्यंत वैज्ञानिक ढंग से सूत्रीकरण किया है। यह ग्रंथ न केवल भारतीय व्याकरण परंपरा का आधार है, बल्कि आधुनिक भाषा विज्ञान (linguistics) के विकास में भी इसका बड़ा योगदान रहा है।
अष्टाध्यायी की विशेषता इसकी सूत्र-शैली है – अल्पाक्षर, अर्थगर्भित और नियमबद्ध। पाणिनि ने धातुओं (मूल क्रियाओं) और प्रत्ययों के संयोग से शब्द-निर्माण के नियम दिए हैं। सूत्रों के साथ "गणपाठ" और "धातुपाठ" भी संलग्न हैं। इस ग्रंथ के आधार पर ही बाद में पतंजलि ने "महाभाष्य" और कात्यायन ने "वार्तिक" लिखे।
पाणिनि ने अपने व्याकरण में "अष्टाध्यायी" के माध्यम से संस्कृत भाषा को मृतप्राय होने से बचाया और उसे वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। आज भी संस्कृत के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए अष्टाध्यायी का अध्ययन अनिवार्य है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में प्रत्येक सूत्र का सरल भाषा में अर्थ और उदाहरण सहित विवेचन किया गया है। यह पुस्तक संस्कृत साहित्य, भाषा विज्ञान और प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा में रुचि रखने वालों के लिए अमूल्य है।