ग्रंथ परिचय (Book Introduction)
ऐतरेयोपनिषद् ऋग्वेद से संबद्ध है और यह ऐतरेय आरण्यक का भाग है। इसमें सृष्टि की उत्पत्ति, आत्मा के स्वरूप, और प्रज्ञान (चेतना) को ब्रह्म के रूप में प्रतिपादित किया गया है। उपनिषद् के प्रारंभ में "आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्" कहकर बताया गया कि प्रारंभ में केवल आत्मा ही था।
इस उपनिषद् में सृष्टि के क्रम का वर्णन है – आत्मा ने लोकों, देवताओं, और फिर शरीर की रचना की। प्रसिद्ध मंत्र "प्रज्ञानं ब्रह्म" (प्रज्ञान ही ब्रह्म है) यहाँ से लिया गया है। यह उपनिषद् अद्वैत वेदांत के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आत्मा को सृष्टि का एकमात्र कारण बताती है।
ऐतरेयोपनिषद् में शरीर के भीतर आत्मा के तीन जन्मों की चर्चा भी है – पहला जन्म माता-पिता से, दूसरा जन्म यज्ञोपवीत से, तीसरा जन्म मृत्यु के बाद। यह उपनिषद् ज्ञान और कर्म के समन्वय का भी उदाहरण प्रस्तुत करती है।
प्रस्तुत हिंदी अनुवाद में मूल संस्कृत मंत्रों के साथ सरल भाषा में अर्थ, पदच्छेद और विस्तृत व्याख्या दी गई है। यह संस्करण वेदांत के अध्ययन, आध्यात्मिक साधना और शोध के लिए अत्यंत उपयोगी है।