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Matarani Bhajan

बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे कोई सोना की जो होती, हीरा मोत्यां की जो होती लिरिक्स || Baans kee baansuriya pe ghano itaraave koee sone kee jo hotee hai, heera motyaan kee jo hotee hai lyrics in hindi || Bhaktilok

150 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे कोई सोना की जो होती, हीरा मोत्यां की जो होती लिरिक्स || Baans kee baansuriya pe ghano itaraave koee sone kee jo hotee hai, heera motyaan kee jo hotee hai lyrics in hindi ||



बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे,

कोई सोना की जो होती, हीरा मोत्यां की जो होती,

जाणे कांई करतो, कांई करतो,

बाँस की बाँसुरिया पे.....


जेल में जनम लेके घणो इतरावे,

कोई महलां में जो होतो, कोई अंगना में जो होतो,

जाणे कांई करतो कांई करतो,

बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे....


देवकी रे जन्म लेके घणो इतरावे,

कोई यशोदा के जो होतो, मां यशोदा के जो होतो,

जाणे कांई करतो कांई करतो,

बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे....


गाय को ग्वालो होके घणो इतरावे,

कोई गुरूकुल में जो होतो, कोई विद्यालय में जो होतो,

जाणे कांई करतो कांई करतो,

बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे....


गुजरया की छोरियां पे घणो इतरावे,

ब्राह्मण बनिया की जो होती, सेठ ठाकुरां की जो होती,

जाणे कांई करतो कांई करतो,

बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे....


सांवली सुरतिया पे घणो इतरावे,

कोई गोरो सो जो होतो, कोई सोणो सो जो होतो,

जाणे कांई करतो कांई करतो,

बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे....


माखन और मिश्री पे घणो इतरावे,

छप्पन भोग जो होतो, काजू मेवा जो होतो,

जाणे कांई करतो... कांई करतो,

बाँस की बाँसुरिया पे घणो इतरावे....

 

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन बाँस की बाँसुरी के माध्यम से भगवान कृष्ण की लीलाओं का गुणगान करता है। भजन में प्रतिपादित किया गया है कि कृष्ण की बाँसुरी की मधुर ध्वनि सोने, हीरे और मोतियों जैसी कीमती वस्तुओं से अधिक मनोमुग्ध करती है। लेखक प्रश्न उठाता है कि कृष्ण की माया क्या करती है, जो जेल में जन्म लेकर भी गायों के चरवाहे, गोपियों के मन को मोहित करने वाले और अलौकिक लीलाओं को प्रदर्शित करने वाले बन गए। यह भजन कृष्ण की दिव्य शक्ति और उनकी सर्वव्यापी उपस्थिति को दर्शाता है।

भजन का भावार्थ यह है कि भगवान कृष्ण की लीला अनन्य और अनिर्वचनीय है। वे जहाँ कहीं भी जन्म लें, चाहे कारागार में हो या महलों में, उनकी दिव्य शक्ति सर्वत्र कार्यरत रहती है। बाँसुरी का प्रतीक कृष्ण की अलौकिक आकर्षण शक्ति को दर्शाता है जो सभी भेदभावों को लाँघकर मनुष्य के हृदय को आकृष्ट करती है। यह भजन यह संदेश देता है कि ईश्वरीय शक्ति भौतिक सीमाओं से परे है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

कृष्ण की बाँसुरी का महत्व श्रीमद्भागवत पुराण में विस्तृत रूप से वर्णित है, जहाँ कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि से सभी प्राणी मुग्ध होते हैं। यह भजन भागवत के रास लीला प्रकरण से प्रेरित है। कृष्ण के विभिन्न जन्मों और लीलाओं - कारागार में जन्म, यशोदा के पास पालन-पोषण, गायों की रक्षा, गोपियों के हृदय को मोहित करना - ये सभी कृष्ण की दिव्य शक्ति का प्रदर्शन हैं जो उपनिषदों में वर्णित ब्रह्मशक्ति को प्रतिफलित करते हैं।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का गायन और श्रवण मन को शान्ति प्रदान करता है, हृदय में भक्ति की भावना जागृत करता है, और आत्मा को ईश्वर के प्रति निवेदित करता है। नियमित चिन्तन से मायिक आकर्षणों से मुक्ति मिलती है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का गायन प्रातःकाल या संध्या के समय सर्वोत्तम है। पूजास्थल में दीप प्रज्ज्वलित करें और कृष्ण की प्रतिमा के सामने बैठें। पद्मासन या सुखासन में बैठकर, मन को शुद्ध करते हुए, श्रद्धा और निष्ठा से भजन गाएँ। भजन गाते समय कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि का आंतरिक ध्यान करें। मानसिक शुद्धता और भक्तिभाव ही साधना की कुंजी है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

बाँस की बाँसुरी का भजन में क्या महत्व है?

बाँस की बाँसुरी कृष्ण की दिव्य शक्ति और अनन्त आकर्षण का प्रतीक है। यह दर्शाती है कि भौतिक सरलता में भी परमेश्वर की शक्ति निहित है। बाँसुरी की मधुर ध्वनि सभी सांसारिक धन-संपत्ति से परे है और सीधे हृदय को छूती है।

भजन में 'जेल में जन्म लेके' और 'देवकी रे जन्म लेके' क्यों दोहराया गया है?

यह कृष्ण के ऐतिहासिक जन्म को दर्शाता है। कंस की जेल में कृष्ण का जन्म हुआ था, लेकिन देवकी और वसुदेव की महान आत्मा ने उन्हें पाला। भजन यह संदेश देता है कि परिस्थितियाँ कृष्ण की लीला को सीमित नहीं कर सकतीं। वे जहाँ भी जन्म लें, उनकी दिव्य शक्ति सक्रिय रहती है।

गोपियों और गायों के संदर्भ का भजन में क्या अर्थ है?

गोपियाँ भक्त आत्मा का प्रतीक हैं और गायें अन्न की प्रतीक हैं। कृष्ण द्वारा गायों की रक्षा और गोपियों को मोहित करना दर्शाता है कि भगवान सभी प्राणियों की रक्षा करते हैं और भक्ति के माध्यम से आत्मा को आकृष्ट करते हैं। यह विश्वव्यापी प्रेम और सेवा का प्रतीक है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 02 Sep 2026

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