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Matarani Bhajan

हर तरफ, हर जगह, हर कही पे है लिरिक्स || Har taraph, har jagah, har kahee pe hai lyrics in hindi || Bhaktilok

105 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

हर तरफ, हर जगह, हर कही पे है हा.. उसी का रूप हा उसी का रूप रौशनी का कोई दरिया तो है हा कही पे ज़रूर रौशनी का कोई दरिया तो है हा कही पे ज़रूर ये आसमान, ये ज़मी, चांद और सूरज क्या बना सका है कभी कोई भी कुदरत कोई तो है जिसके आगे है आदमी मजबूर हर तरफ, हर जगह, हर कही पे है हा.. उसी का रूप इंसान जब कोई है राह से भटका इसने दिखा दिया, उसको सही रास्ता कोई तो है जो करता है मुश्किल हमारी दूर हर तरफ, हर जगह, हर कही पे है हा.. उसी का रूप रौशनी का कोई दरिया तो है हा कही पे ज़रूर

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह भजन सर्वव्यापी परमात्मा की सर्वत्र उपस्थिति का प्रतिपादन करता है। 'हर तरफ, हर जगह, हर कही पे है' - यह मूल पंक्ति यह संदेश देती है कि परमशक्ति हर स्थान, हर जीव, हर परिस्थिति में विद्यमान है। भजन में कहा गया है कि आकाश, पृथ्वी, चंद्रमा और सूर्य जैसी सृष्टि की भव्य रचना किसी भी मनुष्य द्वारा नहीं की जा सकी - यह सब एक परमसत्ता द्वारा निर्मित है। 'रौशनी का कोई दरिया' - ज्ञान और चेतना का अनंत स्रोत सर्वत्र प्रवाहित है। यह भजन यह स्पष्ट करता है कि जब मनुष्य पथभ्रष्ट होता है, तब भी वह दिव्य शक्ति उसे सही मार्ग दिखाती है। यह परम सत्ता हमारी सभी कठिनाइयों को दूर करने में सक्षम है और हमारे जीवन में सदैव सहायक बनी रहती है।

इस भजन का भावार्थ गहरे आध्यात्मिक सत्य को प्रकट करता है। जब कवि कहता है 'उसी का रूप', तो वह यह संदेश देता है कि ब्रह्मांड की सभी चीजें परमात्मा की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। हर प्राणी, हर वस्तु, हर क्षण में ईश्वर का अस्तित्व है - यह अद्वैत दर्शन का मूल सिद्धांत है। भजन का भावनात्मक पक्ष यह है कि मनुष्य कभी अकेला नहीं है; एक सर्वशक्तिमान चेतना सदैव उसके साथ है। 'इंसान जब कोई है राह से भटका' - यह पंक्ति जीवन की यथार्थता को दर्शाती है कि भटकन जीवन का अभिन्न अंग है, लेकिन परमात्मा की कृपा से सही मार्ग मिल ही जाता है। यह विश्वास, समर्पण और आत्मविश्लेषण का भजन है जो हृदय को शांति और आश्वस्ति प्रदान करता है।

यह भजन भक्तिमार्ग का एक सुंदर उदाहरण है जो सर्वेश्वरवाद और आत्मनिवेदन की शिक्षा देता है। वेदांत दर्शन में कहा गया है 'ईश्वरो अहं' - परमात्मा सर्वत्र है, हर जीव उसका अंश है। इस भजन में भक्त का दृष्टिकोण यह है कि मुक्ति और सुख तब आता है जब हम अपनी सीमितता को स्वीकार करते हैं और परमशक्ति के समक्ष समर्पण करते हैं। 'कोई तो है जिसके आगे है आदमी मजबूर' - यह पंक्ति अहंकार के त्याग की बात करती है। भक्तिमार्ग में विश्वास और प्रेम ही मुख्य साधन हैं। यह भजन यह सिखाता है कि निरंतर विश्वास रखने से, सही ज्ञान की खोज से, और परमसत्ता के प्रति पूर्ण समर्पण से ही जीवन सफल और सार्थक बनता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

वेद और उपनिषदों में सर्वव्यापिता का सिद्धांत मौलिक है। ईश नोपनिषद में कहा गया है - 'ईश्वर: सर्वभूतानां हृदये अवस्थितः' अर्थात् परमात्मा सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है। महाभारत में भगवद्गीता का यह श्लोक प्रसिद्ध है कि 'जहां-जहां अग्नि है, जहां-जहां पृथ्वी है, वहां-वहां मेरा रूप है'। रामायण में भी राम का सर्वव्यापित्व वर्णित है - हनुमान और भक्तों को राम सर्वत्र दिखाई देते हैं। पुराणों में शिव और विष्णु की सर्वशक्तिमानता का बार-बार वर्णन आता है। इस भजन का संदर्भ हिंदू दर्शन की यही परंपरा है जहां परमसत्ता को निर्गुण (गुणहीन) और निराकार माना जाता है, फिर भी वह सगुण (सभी गुणों से युक्त) रूप में प्रकट होती है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का नियमित श्रवण और गायन मन को अपार शांति प्रदान करता है। यह भजन चिंता और भय को दूर करता है क्योंकि यह विश्वास जगाता है कि एक दिव्य शक्ति सदैव हमारी देखभाल कर रही है। आत्मविश्वास और आत्मबल में वृद्धि होती है। तनाव, अवसाद और निराशा को मिटाने में सहायक है। मन की एकाग्रता बढ़ती है। आध्यात्मिक विकास होता है और ईश्वर से जुड़ाव बढ़ता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का गायन या श्रवण प्रातःकाल सूर्योदय के समय सबसे अधिक प्रभावी है। शुद्ध मन और स्वच्छ वातावरण में बैठकर इसे गुनगुनाएं। एक दीपक या मोमबत्ती जलाएं और कुछ फूल, अगरबत्ती का प्रयोग करें। सुखासन में बैठें, आंखें बंद करें, और पूर्ण समर्पण के साथ शब्दों को हृदय से अनुभव करें। साथ ही मन को इस विचार में लीन करें कि परमात्मा मेरे अंदर और बाहर सर्वत्र है। नियमित गायन से मन को शांति और ध्यान में गहराई आती है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

यह भजन किस विशेष देवता को समर्पित है?

यह भजन सर्वव्यापी परमात्मा को समर्पित है। यह किसी विशेष देवी या देवता के लिए नहीं, बल्कि उस अद्वितीय, सर्वशक्तिमान सत्ता के लिए है जो समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है। यह सर्वेश्वरवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

भजन में 'रौशनी का दरिया' का क्या अर्थ है?

यह ज्ञान, चेतना और ईश्वरीय प्रकाश का प्रतीक है। जैसे नदी निरंतर बहती है, वैसे ही परमात्मा की कृपा और ज्ञान प्रवाहित होता रहता है। यह आध्यात्मिक जागृति और सच्चे ज्ञान के अनंत स्रोत को दर्शाता है।

इस भजन का मुख्य संदेश क्या है?

मुख्य संदेश यह है कि परमात्मा हर जगह, हर समय, हर परिस्थिति में मौजूद है। भले ही मनुष्य गलत रास्ते पर चला जाए, परमसत्ता उसे सही मार्ग दिखाती है। पूर्ण आत्मनिवेदन और विश्वास ही जीवन का मूल आधार है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 02 Sep 2026

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