Punjabi Devi Bhajan रविवार विशेष (भगवान सूर्य नारायण)

नमस्कार देवी शिवे कल्याणी(namaskaar devi shive kalyaani lyrics in hindi)

नमस्कार देवी शिवे कल्याणी भजन के बोल, हिंदी अर्थ एवं संदर्भ सहित संपूर्ण जानकारी। मां जगदम्बा की भक्ति से जुड़े इस पावन स्तोत्र का पाठ करें।

नमस्कार देवी शिवे कल्याणी - परिचय एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि

"नमस्कार देवी शिवे कल्याणी(namaskaar devi shive kalyaani lyrics in hindi)" देवी दुर्गा और आदिशक्ति के कल्याणकारी, सर्वव्यापक और करूणामयी स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत लोकप्रिय और भावपूर्ण भजन है। यह भजन विशेष रूप से पंजाब और उत्तर भारत की समृद्ध भक्ति परंपरा का हिस्सा है, जिसे साधक माता के दरबार, जागरण, संकीर्तन और देवी उपासना के पावन अवसरों पर अत्यंत श्रद्धा और प्रेम के साथ गाते हैं। इस भजन के माध्यम से भक्त जन मां जगदम्बा के चरणों में अपनी पूर्ण शरणागति, विनय और कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। हिन्दू सनातन धर्म में देवी को 'शिवे कल्याणी' के रूप में संबोधित किया गया है, जिसका अर्थ है वह जो सबका कल्याण करती हैं और जिनका स्वरूप परम मंगलकारी है। 'मधुप' जी द्वारा रचित यह भजन साधक के अंतःकरण को जागृत करने और भगवती की असीम कृपा प्राप्त करने का एक दिव्य माध्यम है। इस लेख में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण बोल, हिंदी अर्थ, भावार्थ और इसके आध्यात्मिक महत्व का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics


मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:

नमस्कार देवी शिवे कल्याणी ।
दो भक्ति का वरदान दुर्गे भवानी॥

जिधर देखते हैं उधर तू-ही तू-है।
हर शै में जलवा तेरा हू-ब हू-है॥
तेरी जुस्त जू है,तेरी गुफ्तगू है।
तू घट घट बसै ,तेरी लीला लासानी॥
नमस्कार देवी...

तू ही शैलपुत्री तू ही दक्षबाला।
तू ही वैष्णो कालका चण्डी ज्वाला॥
उमां रमां सरस्वती जग की पाला।
तू ही देव दानव ,करें नज़रानी॥
नमस्कार देवी...

तेरी रहीमतों का नहीं है ठिकाना।
है दीदार तेरा दया का खजाना॥
तेरे खज़ाने से लेता है जमाना।
तेरी बख्शिशों की ,बड़ी मेहरबानी॥
नमस्कार देवी...

नहीं जानते हैं तेरी कुछ भी माया।
बनें हैं वहीं हम ,जो तूने बनाया॥
तेरी कृपा से है जीवन यह पाया।
‘‘मधुप’’ की भव बाधा ,हरो महारानी॥
नमस्कार देवी शिवे कल्याणी॥

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

देवादिदेव महादेव की शक्ति और संपूर्ण ब्रह्मांड की जननी को समर्पित यह भजन "नमस्कार देवी शिवे कल्याणी" मां भगवती के विराट और कल्याणकारी स्वरूप का सजीव चित्रण करता है। भजन की पहली पंक्ति में साधक आदिशक्ति को प्रणाम करते हुए उनसे केवल सांसारिक सुखों की नहीं, बल्कि सच्ची 'भक्ति के वरदान' की याचना करता है। सांसारिक प्रलोभनों से परे होकर भगवती के चरणों में निष्काम प्रेम ही परम पुरुषार्थ है।

भजन के अंतरा में भक्त की अद्वैतवादी दृष्टि और परमेश्वर के सर्वव्यापक रूप का दर्शन होता है। साधक कहता है कि इस सृष्टि में जिधर भी दृष्टि जाती है, उधर केवल मां का ही प्रकाश और अस्तित्व नजर आता है। प्रत्येक वस्तु और कण में उन्हीं का जलवा विद्यमान है। सूफी और संत काव्य परंपरा के शब्दों जैसे 'जुस्तजू' (तलाश) और 'गुफ्तगू' (बातचीत) का यह प्रयोग इस बात को दर्शाता है कि साधक के श्वास-श्वास में केवल देवी की ही आराधना रची-बसी है। वह घट-घट में निवास करती हैं और उनकी लीलाएं अद्वितीय (लासानी) हैं।

अगले चरण में कवि मां के विभिन्न स्वरूपों का स्मरण करता है—चाहे वह पर्वतराज हिमालय की पुत्री शैलपुत्री हों, राजा दक्ष की पुत्री सती हों, त्रिकुटा पर विराजमान वैष्णो देवी हों, मां कालका, चंडी, ज्वाला हों अथवा तीनों लोकों की पालनहार उमा (पार्वती), रमा (लक्ष्मी) और सरस्वती हों। वे ही सम्पूर्ण जगत का पालन करती हैं और देवों से लेकर दानवों तक सभी उनकी शरण में नतमस्तक होकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

भजन के अंतिम चरणों में साधक माता की असीम करुणा और अपनी दीनता का सुंदर वर्णन करता है। वह स्वीकार करताೆ है कि वह माता की माया और अनंत रहस्यों को जानने में असमर्थ है। मनुष्य का यह अस्तित्व केवल मां की इच्छा और रचना का परिणाम है। अंत में रचनाकार 'मधुप' मां से प्रार्थना करते हैं कि हे महारानी! मेरे जीवन की समस्त भव-बाधाओं और दुखों को हर लीजिए और मुझे अपनी शरण में स्थान दीजिए।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक उच्च कोटि की आध्यात्मिक साधना है। इसकी निम्नलिखित मुख्य विशेषताएं हैं:

  • सर्वव्यापकता का दर्शन: भजन अद्वैत वेदांत के उस सिद्धांत को पुष्ट करता है जिसके अनुसार कण-कण में ईश्वर का वास है।
  • सांप्रदायिक सद्भाव व भाषाई सहजता: पंजाबी और उर्दू भाषी सांस्कृतिक प्रभाव वाले शब्दों (जैसे जुस्तजू, गुफ्तगू, रहमत, बख्शिश) का हिंदी भजन में सुंदर समन्वय इसे सार्वभौमिक अपील प्रदान करता है।
  • भक्ति रस की प्रधानता: इसमें विनय, समर्पण और करुणा का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
  • देवी के विभिन्न रूपों का स्मरण: शैलपुत्री से लेकर महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती तक सभी स्वरूपों का एक ही स्थान पर वंदन किया गया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस पावन भजन को प्रातः काल की बेला में दैनिक पूजा-आरती के समय अथवा संध्याकालीन बेला में दीप प्रज्वलित करने के बाद गाना अत्यंत शुभ माना जाता है। इसके अलावा:

  • नवरात्र के पावन दिन: शारदीय और चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते समय इसे विशेष रूप से गाया जाता है।
  • माता के जागरण और चौकी: उत्तर भारत और पंजाब में माता के जागरण और सत्संग के दौरान इस भजन को सामूहिक रूप से बहुत चाव से गाया जाता है।
  • मंगलवार और शुक्रवार: देवी को समर्पित इन वारों पर घर में धूप-दीप जलाकर इस भजन का पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और सकारात्मकता का संचार होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन की केंद्र बिंदु हैं आदिशक्ति, महामाया, मां दुर्गा, भवानी और कल्याणी। सनातन धर्म में 'शिवे' शब्द भगवान शिव के साथ देवी शक्ति के उस अभेद संबंध को दर्शाता है जहाँ शिव और शक्ति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। इस भजन के रचयिता 'मधुप' जी हैं, जिन्होंने अपनी सरल और हृदयस्पर्शी शब्दावली से मां भगवती के चरणों में अपनी अनन्य भक्ति अर्पित की है। देवी उपासना की इस समृद्ध परंपरा में दुर्गा सप्तशती पाठ और दुर्गा अमृतवाणी का भी अत्यधिक महत्व है।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की रचना पारंपरिक लोक-भक्ति और आधुनिक हिंदी-उर्दू मिश्रित सुगम संगीत शैली के प्रभाव से हुई है। पंजाब और उत्तर भारत के लोक कलाकारों ने देवी जागरण की परंपरा को जीवंत रखते हुए इस प्रकार के भजनों को घर-घर तक पहुँचाया है। इसमें प्रयुक्त शब्दावली श्रोता के मन पर सीधा प्रभाव डालती है और अनायास ही नेत्रों में भाव के अश्रु ले आती है। यह उन भक्तों के लिए एक संजीवनी बूटी समान है जो संसार के दुखों से त्रस्त होकर मां के चरणों में शांति की तलाश करते हैं।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

भजन की भाषा खड़ी बोली हिंदी है जिसमें ब्रज और पंजाबी लोक-संस्कृति के साथ-साथ सूफी काव्य की मधुर शब्दावली (जैसे- जुस्तजू, गुफ्तगू, रहमत, बख्शिश) का बहुत ही सहज प्रयोग किया गया है। काव्य शैली के दृष्टिकोण से यह एक मुक्तक पद है, जिसमें तुकबंदी (Rhyme Scheme) का विशेष ध्यान रखा गया है ताकि गाने वाले को प्रवाह और लय का आनंद मिल सके। रूपक और अनुप्रास अलंकारों की छटा इस भजन के साहित्यिक सौंदर्य को और अधिक प्रखर बनाती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

  • पूर्ण शरणागति: मनुष्य को अपने अहंकार का त्याग कर मां की शरण में जाना चाहिए।
  • कृतज्ञता का भाव: हमें अपने जीवन और सांसारिक सुखों के लिए ईश्वर और प्रकृति के प्रति हमेशा कृतज्ञ रहना चाहिए।
  • समदृष्टि: संपूर्ण संसार में एक ही शक्ति का विस्तार है, अतः किसी भी जीव से द्वेष न करें।
  • संकट में धैर्य: भव-बाधाओं से घबराने के बजाय भगवती पर अटूट विश्वास रखना चाहिए।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ / प्रसंग
शिवे कल्याणी कल्याण करने वाली माता देवी दुर्गा का मंगलकारी स्वरूप
हर शै में प्रत्येक वस्तु में / कण-कण में ईश्वर की सर्वव्यापकता
जुस्तजू तलाश / खोज ईश्वर को पाने की तीव्र आंतरिक इच्छा
गुफ्तगू बातचीत / संवाद भक्त और भगवान का आंतरिक संबंध
लासानी अद्वितीय / जिसकी कोई तुलना न हो माता की अद्भुत लीलाएं
दक्षबाला राजा दक्ष की पुत्री (सती) माता पार्वती का पूर्व जन्म
उमां रमां सरस्वती पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती त्रिदेवियों का संयुक्त रूप
नज़रानी भेंट / नजराना / प्रणाम देवताओं और दानवों द्वारा सम्मान अर्पित करना
बख्शिशों कृपा / अनुकंपा / दान माता की अहेतुकी कृपा
भव बाधा संसार रूपी सागर के दुख और संकट जीवन के कष्ट

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"नमस्कार देवी शिवे कल्याणी, दो भक्ति का वरदान दुर्गे भवानी॥"
भावार्थ: हे कल्याणकारी देवी! आपको बारंबार नमस्कार है। हे दुर्गे और भवानी! हमें सांसारिक वस्तुओं का मोह न देकर अपने चरणों की सच्ची और निष्कपट भक्ति का वरदान दीजिए।

"जिधर देखते हैं उधर तू-ही तू-है, हर शै में जलवा तेरा हू-ब हू-है॥"
भावार्थ: भक्त कहता है कि मैं अपनी आंखें जिधर भी घुमाता हूँ, मुझे केवल आप ही नजर आती हैं। इस संसार की प्रत्येक वस्तु में आपका ही प्रत्यक्ष प्रकाश और रूप समाया हुआ है।

"तेरी जुस्त जू है, तेरी गुफ्तगू है, तू घट घट बसै, तेरी लीला लासानी॥"
भावार्थ: हे मां! मेरी हर तलाश में केवल आप ही हैं, मेरी हर बातचीत और चिंतन का केंद्र आप ही हैं। आप सभी जीवों के घट-घट में निवास करती हैं और आपकी लीलाएं इस संसार में सबसे अनूठी हैं।

"तू ही शैलपुत्री तू ही दक्षबाला, तू ही वैष्णो कालका चण्डी ज्वाला॥"
भावार्थ: पर्वतराज की पुत्री शैलपुत्री और दक्ष की पुत्री आप ही हैं। वैष्णो देवी, महाकाली, चंडिका और ज्वालाजी के रूप में भी आप ही विराजमान हैं।

"उमां रमां सरस्वती जग की पाला, तू ही देव दानव, करें नज़रानी॥"
भावार्थ: मां पार्वती, महालक्ष्मी और मां सरस्वती—तीनों लोकों का पालन करने वाली आप ही हैं। देव और दानव सभी आपके समक्ष नतमस्तक होकर अपनी हाजिरी और भेंट अर्पित करते हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

इस भजन के भाव को पुष्ट करने वाले कुछ प्रमुख देवी मंत्र निम्नलिखित हैं जिनका स्मरण करना अत्यंत फलदायी होता है:

  • सर्वमంగళ मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोस्तुते॥
  • या देवी सर्वभूतेषु शक्ति-रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
  • इन पावन मंत्रों के नियमित स्मरण से साधक को मानसिक शांति और मां की असीम ऊर्जा की प्राप्ति होती है। आप अधिक जानकारी के लिए श्री दुर्गा चालीसा का पाठ भी अवश्य करें।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम नमस्कार देवी शिवे कल्याणी (Namaskaar Devi Shive Kalyaani)
ाराध्य देवी माँ दुर्गा, आदिशक्ति, भवानी, कल्याणी
रचयिता / कवि श्री 'मधुप' जी
भाषा हिंदी, उर्दू मिश्रित सुगम शब्दावली (भक्ति रस)
मुख्य थीम शरणागति, सर्वव्यापकता और भक्ति का वरदान
उपयुक्त अवसर नवरात्र, माता का जागरण, सत्संग, दैनिक पूजा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन के रचयिता 'मधुप' जी हैं, जिन्होंने अपनी कविताओं और भजनों के माध्यम से आदिशक्ति माँ दुर्गा की महिमा का बहुत ही सुंदर वर्णन किया है।

इस भजन को प्रातः काल की पूजा के समय, संध्या वंदन के दौरान या विशेषकर शारदीय व चैत्र नवरात्रि के दिनों में गाना सबसे उत्तम माना जाता है।

'शिवे कल्याणी' का अर्थ है - वह देवी जो कल्याणकारी हैं, जो मंगलमय स्वरूप वाली हैं और संपूर्ण सृष्टि का कल्याण करती हैं।

हाँ, यह भजन माता के जागरण, चौकी और संकीर्तन कार्यक्रमों में बहुत चाव से गाया जाता है क्योंकि इसके बोल श्रोताओं के मन में भक्ति भाव जगाते हैं।

यह भजन सिखाता है कि ईश्वर कण-कण में व्याप्त हैं और हमें अहंकार का त्याग करके माँ के चरणों में पूर्ण शरणागति व भक्ति का वरदान मांगना चाहिए।

भजन में शैलपुत्री, दक्षबाला (सती), वैष्णो देवी, कालका, चण्डी, ज्वाला, उमा, रमा और सरस्वती आदि प्रमुख स्वरूपों का स्मरण किया गया है।

हाँ, इसकी लय बहुत सरल और प्रवाहमयी है, जिससे संगीत और भजन गायन सीखने वाले इसे आसानी से याद करके गा सकते हैं।

नियमित पाठ करने से मन की चंचलता शांत होती है, आत्मविश्वास बढ़ता है और माता रानी की विशेष कृपा से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री भजनों की पारंपरिक मौखिक और लिखित लोक-साहित्य परंपराओं के आधार पर तैयार की गई है। इसमें प्रयुक्त शब्दों के अर्थ, व्याकरणिक शुद्धता और आध्यात्मिक संदर्भों का विशेष ध्यान रखा गया है ताकि पाठकों को एक प्रामाणिक और संतोषजनक अनुभव मिल सके। संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत इस लेख को पाठकों की सुविधा और सर्च गुणवत्ता मानकों के अनुरूप ढाला गया है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • सनातन देवी उपासना एवं भक्ति साहित्य परंपरा
  • पारंपरिक संकीर्तन और देवी भजन संग्रह
  • श्रीमद्देवीभागवत पुराण एवं दुर्गा सप्तशती संदर्भ
  • लोक-साहित्य और सूफी-भक्ति काव्य संकलन

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 24 Oct 2026

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