वैदिक नित्यकर्म एवं उपासना

दैनिक षट्काल पूजा एवं उपासना समय सारणी

सनातन धर्म में नित्य पूजा को आत्म-कल्याण, मानसिक शांति और गृह-समृद्धि का आधार माना गया है। शास्त्रों में दिन के २४ घंटों को प्रमुख कालों में विभक्त कर देव आराधना के विशिष्ट मुहूर्त और विधियां बताई गई हैं।

प्रथम काल · ब्रह्म मुहूर्त प्रातः ०४:०० से ०५:३० बजे

प्रातः जागरण, करदर्शन एवं भूमि वंदना

सूर्योदय से पूर्व के दो मुहूर्त (लगभग ९६ मिनट पूर्व) को ब्रह्म मुहूर्त कहा जाता है। इस काल में वातावरण में सत्त्वगुण की प्रधानता होती है। बिस्तर छोड़ते ही सर्वप्रथम अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर दर्शन करना चाहिए, क्योंकि हथेलियों के अग्रभाग में माँ लक्ष्मी, मध्य में माँ सरस्वती और मूल में भगवान गोविंद का वास माना गया है।

करदर्शन महामंत्र:

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती ।
करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ॥

अर्थ: हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी जी, मध्य में सरस्वती जी और मूल में भगवान श्री कृष्ण/गोविंद निवास करते हैं। अतः प्रातःकाल अपने दोनों हाथों का दर्शन करता हूँ।

भूमि क्षमा प्रार्थना:

समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले ।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्वमे ॥

अर्थ: समुद्र रूपी वस्त्र धारण करने वाली और पर्वत रूपी स्तनों वाली हे भगवान विष्णु की पत्नी पृथ्वी देवी! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मेरे पैरों के स्पर्श के लिए मुझे क्षमा करें।
द्वितीय काल · प्रातः कालीन पूजा प्रातः ०६:०० से ०७:३० बजे

स्नान, सूर्य अर्घ्य एवं नित्य देव पूजन

स्नान उपरांत स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। तांबे के पात्र में जल, अक्षत, रोली और लाल पुष्प डालकर भगवान सूर्य नारायण को "ॐ सूर्याय नमः" अथवा "ॐ घृणिः सूर्याय नमः" का उच्चारण करते हुए अर्घ्य दें।

सूर्य गायत्री महामंत्र:

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

विधि: रुद्राक्ष या तुलसी की माला पर कम से कम १ माला (१०८ बार) गायत्री मंत्र का जप करने से तेज, प्रज्ञा और ओज की वृद्धि होती है।

प्रातः पूजा के मुख्य अंग:

  • आचमन व पवित्रीकरण: "ॐ अपवित्रः पवित्रो वा..." मंत्र से शरीर व पूजा सामग्री का पवित्रीकरण।
  • दीप प्रज्वलन: गाय के शुद्ध घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित कर "शुभं करोति कल्याणम्..." बोलें।
  • गणेश वंदना: सर्वप्रथम विघ्नहर्ता श्री गणेश जी का स्मरण करें।
तृतीय काल · मध्याह्न काल दोपहर १२:०० से १२:४५ बजे

राजभोग समर्पण एवं मध्याह्न आरती

दोपहर के समय घर में बने सात्विक भोजन (बिना लहसुन-प्याज) में से प्रथम भाग भगवान को नैवेद्य (भोग) के रूप में समर्पित किया जाता है। भगवान विष्णु व श्री कृष्ण के भोग में तुलसी पत्र अनिवार्य रूप से अर्पित करें।

भोग समर्पण मंत्र:

त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ।
गृहाण संमुखो भूत्वा प्रसीद परमेश्वर ॥

अर्थ: हे गोविंद! आपकी ही दी हुई वस्तु मैं आपको समर्पित कर रहा हूँ। कृपया इसे स्वीकार कर मुझ पर प्रसन्न हों।
चतुर्थ काल · गोधूलि वेला सायं ०६:०० से ०७:१५ बजे

संध्या दीपदान, तुलसी पूजन व महाआरती

सूर्यास्त के समय घर के मुख्य द्वार, मंदिर तथा तुलसी चौरे पर घी का दीपक जलाना परम कल्याणकारी माना गया है। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है और लक्ष्मी जी का स्थाई वास होता है।

तुलसी स्तुति मंत्र:

महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी ।
आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोऽस्तु ते ॥

संध्या आरती उपरांत कपूर जलाकर पूरे घर में आरती की सुगंध का प्रसार करें।
पंचम काल · प्रदोष काल रात्रि ०८:०० से ०९:१५ बजे

श्री हनुमान चालीसा पाठ एवं भगवद् नाम जप

रात्रि के समय परिवार सहित हनुमान चालीसा का पाठ अथवा इष्टदेव के बीज मंत्र का जप करने से भय, तनाव एवं दुःस्वप्नों से मुक्ति मिलती है।

षष्ठ काल · शयन काल रात्रि ०९:३० से १०:०० बजे

शयन सेवा एवं क्षमा याचना स्तोत्र

सोने से पूर्व मंदिर के कपाट बंद कर प्रभु को विश्राम (शयन) कराएं और दिनभर में जाने-अनजाने हुए अपराधों हेतु क्षमा याचना करें।

शिव क्षमा प्रार्थना:

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ॥

पंचोपचार एवं षोडशोपचार पूजन विधि

दैनिक गृह पूजा में पंचोपचार विधि सबसे उपयुक्त और सरल है:

१. गंध (चंदन / रोली)

अनामिका उंगली से भगवान के ललाट पर चंदन या कुमकुम का तिलक लगाएं।

२. पुष्प (ताजे फूल)

देवता के प्रिय पुष्प व माला श्रद्धापूर्वक चरणों में अर्पित करें।

३. धूप (सुगंधित धूप)

वातावरण की शुद्धि हेतु गूगल, लोबान या सुगंधित धूपबत्ती दिखाएं।

४. दीप (ज्योति दर्शन)

शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित कर भगवान के समक्ष आरती स्वरूप घुमाएं।

५. नैवेद्य (भोग व फल)

ऋतु फल, मिष्ठान्न या सात्विक भोजन का भोग अर्पित कर जल से आचमनी कराएं।

दैनिक पूजा संबंधित मुख्य नियम एवं प्रश्नोत्तरी

शास्त्रों के अनुसार पूजा करते समय मुख पूर्व (East) अथवा उत्तर (North) दिशा की ओर होना सबसे शुभ माना गया है। पूर्व दिशा ज्ञान और सूर्य तेज की प्रतीक है, जबकि उत्तर दिशा कुबेर व समृद्धि की दिशा है।

नहीं, कभी भी सीधे जमीन या फर्श पर बैठकर पूजा नहीं करनी चाहिए। इससे पूजा की आध्यात्मिक ऊर्जा भूमि द्वारा अवशोषित हो जाती है। कुशा (घास), ऊन या कंबल के शुद्ध आसन पर बैठकर ही पूजा करें।

घी का दीपक देवता के दाहिनी ओर (अपने बाईं ओर) तथा तेल का दीपक देवता के बाईं ओर (अपने दाईं ओर) रखना चाहिए। दीपक को कभी भी सीधे जमीन पर न रखें, उसके नीचे अक्षत या रोली का आधार अवश्य दें।

आज का पंचांग

आज के शुभ मुहूर्त, चौघड़िया, राहुकाल और नक्षत्र की सटीक गणना देखें।

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संपादकीय एवं शास्त्रीय संदर्भ

यह दैनिक समय सारणी एवं विधि सनातन स्मृति ग्रंथों, धर्मसिंधु एवं निर्णयसिंधु के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार की गई है।