भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

Bulake Hmako Bankebihari Bhajan Lyrics - बुला के हमको बांके बिहारी

बुला के हमको बांके बिहारी भजन के बोल हिंदी में पढ़ें। श्री कृष्ण के प्रति समर्पित इस भावपूर्ण भजन का आनंद लें और भक्ति रस में डूब जाएं।

"बुला के हमको बांके बिहारी" एक अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण भजन है, जो श्रीकृष्ण के बांके बिहारी स्वरूप के प्रति भक्त की गहन आत्मीयता, विरह-वेदना और समर्पण को व्यक्त करता है। यह भजन भक्त और भगवान के बीच के उस अनोखे प्रेम-संबंध को उजागर करता है, जिसमें भक्त भगवान से यह पूछता है कि वे उससे छुप क्यों गए हैं, यह पर्दा क्यों बनाया है। बांके बिहारी का स्वरूप वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में विराजमान है, जहाँ भक्त उनके दर्शन की लालसा में तड़पते हैं। यह भजन उसी तड़प, उसी विरह और उसी समर्पण की अभिव्यक्ति है, जो भक्ति साहित्य की एक अनमोल धरोहर है। इस भजन में भक्त भगवान को "संवरिया" कहकर पुकारता है, अपने दिल की बातें कहता है, और उनके रंग में रंग जाने की बात करता है। यह भजन न केवल एक भक्ति गीत है, बल्कि आत्मा की परमात्मा से मिलन की व्याकुलता का प्रतीक है।

मूल संस्कृत श्लोक / पावन पाठ

बुला के हमको बांके बिहारी, छुप गए क्यों मुरारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है।
दिखा दो हमको सूरत प्यारी, आये शरण तुम्हारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है।
ओ रे संवरिया मेरे, मैं तो रंगा हूँ तेरे रंग में,
मुझसे मिला के नज़रे, चल दो बिहारी मेरे संग में,
सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी, बन के तेरा पुजारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है।
ओ रे संवरिया मेरे, दिल में छुपे हैं कई राज रे,
कैसे बताऊ मोहन तुमको दिल की सारी बात रे,
दिल में मेरे तुम रहते हो, ओढ़ के कामल कारी,
ये पर्दा क्यों किया है, ये पर्दा क्यों किया है।
हँसने लगे हैं मुझपे दुनिया के सारे लोग रे,
कैसा लगाया तुमने मुझको मुरारी ये रोग रे,
रोग ये दिल का तुमने लगाया, सुना के बंसी की धुन रे।

पदच्छेद एवं अन्वय

इस भजन के प्रमुख पदों का पदच्छेद एवं अन्वय इस प्रकार है —

बुला के हमको बांके बिहारी — हे बांके बिहारी, हमको बुलाकर। छुप गए क्यों मुरारी — हे मुरारी, आप क्यों छुप गए। ये पर्दा क्यों किया है — यह पर्दा आपने क्यों किया है। दिखा दो हमको सूरत प्यारी — हमको अपनी प्यारी सूरत दिखा दो। आये शरण तुम्हारी — मैं तुम्हारी शरण में आया हूँ। ओ रे संवरिया मेरे — हे मेरे साँवले सलोने। मैं तो रंगा हूँ तेरे रंग में — मैं तो तेरे रंग में रंग चुका हूँ। मुझसे मिला के नज़रे — मुझसे नज़रें मिलाकर। चल दो बिहारी मेरे संग में — हे बिहारी, मेरे साथ चलो। सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी — मैं भी तुम्हारी सेवा करूँगा। बन के तेरा पुजारी — तेरा पुजारी बनकर। दिल में छुपे हैं कई राज रे — दिल में कई राज छुपे हैं। कैसे बताऊ मोहन तुमको दिल की सारी बात रे — हे मोहन, तुमको दिल की सारी बात कैसे बताऊँ। दिल में मेरे तुम रहते हो — मेरे दिल में तुम रहते हो। ओढ़ के कामल कारी — काली कम्बल ओढ़कर। हँसने लगे हैं मुझपे दुनिया के सारे लोग रे — दुनिया के सारे लोग मुझ पर हँसने लगे हैं। कैसा लगाया तुमने मुझको मुरारी ये रोग रे — हे मुरारी, तुमने मुझको यह कैसा रोग लगाया। रोग ये दिल का तुमने लगाया — यह दिल का रोग तुमने लगाया। सुना के बंसी की धुन रे — बंसी की धुन सुनाकर।

विस्तृत शब्दार्थ

शब्द अर्थ
बुला केबुलाकर, आह्वान करके
बांके बिहारीश्रीकृष्ण का एक स्वरूप, तिरछे नयन वाले, वृंदावन के अधिष्ठाता
मुरारीमुरा नामक दैत्य का संहार करने वाले, श्रीकृष्ण
पर्दाआवरण, छिपाव, दूरी
सूरतचेहरा, मुखमंडल, दर्शन
शरणआश्रय, पनाह
संवरियासाँवले रंग वाले, श्रीकृष्ण
रंगप्रेम, भक्ति, आत्मीयता
नज़रेदृष्टि, नेत्र
पुजारीपूजा करने वाला, सेवक
राजरहस्य, भेद
मोहनमोहित करने वाले, श्रीकृष्ण
कामल कारीकाली कम्बल, कृष्ण का परिधान
रोगव्याधि, प्रेम की पीड़ा
बंसीवंशी, बाँसुरी

सरल हिंदी भावार्थ एवं व्याख्या

इस भजन का मूल भाव यह है कि भक्त भगवान से यह पूछ रहा है कि हे बांके बिहारी, आपने मुझे बुलाया, फिर छुप क्यों गए? यह पर्दा क्यों बनाया? भक्त भगवान के दर्शन के लिए व्याकुल है, वह उनकी प्यारी सूरत देखना चाहता है, उनकी शरण में आया है। भक्त कहता है कि हे संवरिया, मैं तो तेरे रंग में रंग चुका हूँ, अब तू मुझसे नज़रें मिला, मेरे साथ चल, मैं तेरा पुजारी बनकर तेरी सेवा करूँगा। भक्त के दिल में कई राज छुपे हैं, वह मोहन को दिल की सारी बातें बताना चाहता है। भक्त कहता है कि हे मोहन, तुम तो मेरे दिल में ही रहते हो, काली कम्बल ओढ़कर, फिर यह पर्दा क्यों? दुनिया के सारे लोग मुझ पर हँसने लगे हैं, तुमने मुझे कैसा रोग लगाया है, यह दिल का रोग तुमने बंसी की धुन सुनाकर लगाया है।

इस भजन की व्याख्या करते हुए हमें यह समझना चाहिए कि यह केवल एक भक्ति गीत नहीं है, बल्कि आत्मा की परमात्मा से मिलन की व्याकुलता है। भक्त और भगवान के बीच का यह प्रेम संबंध अत्यंत गहरा है। भक्त भगवान को अपने सखा, अपने प्रियतम, अपने सब कुछ के रूप में देखता है। वह भगवान से शिकायत करता है कि आपने मुझे बुलाया, फिर छुप क्यों गए? यह शिकायत प्रेम की गहराई को दर्शाती है। भक्त कहता है कि मैं तो तेरे रंग में रंग चुका हूँ, अब तू मुझसे नज़रें मिला। यह रंगना भक्ति का प्रतीक है, जिसमें भक्त अपनी समस्त चेतना को भगवान के चरणों में समर्पित कर देता है। भक्त कहता है कि मैं तेरा पुजारी बनकर तेरी सेवा करूँगा, यह सेवा भाव भक्ति का सार है। भक्त के दिल में कई राज छुपे हैं, ये राज उसके प्रेम, उसकी पीड़ा, उसकी आशा और उसकी निराशा के हैं। वह मोहन को दिल की सारी बातें बताना चाहता है, लेकिन शब्द नहीं मिलते। भक्त कहता है कि हे मोहन, तुम तो मेरे दिल में ही रहते हो, काली कम्बल ओढ़कर, फिर यह पर्दा क्यों? यह पर्दा भगवान की लीला है, जो भक्त को और अधिक तड़पाती है। दुनिया के लोग भक्त पर हँसते हैं, क्योंकि वे इस प्रेम को नहीं समझते। भक्त कहता है कि तुमने मुझे कैसा रोग लगाया है, यह दिल का रोग तुमने बंसी की धुन सुनाकर लगाया है। यह रोग प्रेम का रोग है, जो भक्त को भगवान से जोड़ता है।

शास्त्रीय एवं पौराणिक संदर्भ

बांके बिहारी का स्वरूप श्रीकृष्ण के उस रूप को दर्शाता है, जो वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में विराजमान है। यह मंदिर वृंदावन में स्थित है और इसका इतिहास अत्यंत प्राचीन है। मान्यता है कि यह विग्रह स्वयं श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ ने स्थापित किया था। बांके बिहारी का अर्थ है — तिरछे नयन वाले, त्रिभंगी मुद्रा में खड़े, बाँसुरी धारण किए हुए श्रीकृष्ण। यह स्वरूप भक्तों को अत्यंत प्रिय है। इस भजन के रचयिता के बारे में कोई निश्चित प्रमाण नहीं है, लेकिन यह भजन भक्ति परंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है और इसे अनेक संतों और भक्तों ने गाया है। यह भजन उस भक्ति भावना का प्रतीक है, जिसमें भक्त भगवान को अपने सखा और प्रियतम के रूप में देखता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण में श्रीकृष्ण की लीलाओं का विस्तृत वर्णन है। भागवत के दशम स्कंध में श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, गोपियों के साथ प्रेम, और वृंदावन की लीलाओं का वर्णन है। इस भजन में जिस विरह और पर्दे की बात की गई है, वह भागवत की उस भक्ति परंपरा से जुड़ी है, जिसमें गोपियाँ श्रीकृष्ण के विरह में तड़पती हैं। गीता में भगवान कहते हैं — "ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्" — जो जिस भाव से मुझे भजता है, मैं उसे उसी भाव से भजता हूँ। इस भजन में भक्त उसी भाव से भगवान को पुकार रहा है। बांके बिहारी की उपासना में माधुर्य भाव की प्रधानता है, जिसमें भक्त भगवान को अपने प्रियतम के रूप में देखता है। यह भजन उसी माधुर्य भाव की अभिव्यक्ति है।

दार्शनिक एवं आध्यात्मिक महत्व

इस भजन का दार्शनिक महत्व अत्यंत गहरा है। यह भजन उस आध्यात्मिक सत्य को उजागर करता है कि आत्मा और परमात्मा के बीच का संबंध प्रेम का संबंध है। भक्त भगवान से पूछता है कि यह पर्दा क्यों किया है? यह पर्दा अज्ञान का पर्दा है, माया का पर्दा है, जो आत्मा को परमात्मा से दूर करता है। भक्त कहता है कि मैं तो तेरे रंग में रंग चुका हूँ, यह रंगना उस आत्म-समर्पण का प्रतीक है, जिसमें जीव अपनी समस्त अस्मिता को भगवान के चरणों में अर्पित कर देता है। यह भजन कर्म सिद्धांत को भी दर्शाता है — भक्त कहता है कि तुमने मुझे कैसा रोग लगाया है, यह रोग पूर्व जन्म के संस्कारों का फल है, जो भक्त को भगवान की ओर खींचता है।

ध्यान की दृष्टि से यह भजन अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब भक्त इस भजन को गाता है, तो वह अपनी चेतना को भगवान के चरणों में केंद्रित करता है। "मुझसे मिला के नज़रे" — यह पंक्ति ध्यान की उस अवस्था को दर्शाती है, जिसमें भक्त और भगवान के बीच कोई दूरी नहीं रहती। "दिल में मेरे तुम रहते हो" — यह पंक्ति उस आंतरिक अनुभूति को दर्शाती है, जिसमें भक्त भगवान को अपने हृदय में अनुभव करता है। यह भजन उस अद्वैत भावना को भी दर्शाता है, जिसमें जीव और ब्रह्म के बीच कोई भेद नहीं रहता। भक्त कहता है कि मैं तेरा पुजारी बनकर तेरी सेवा करूँगा, यह सेवा भाव उस समर्पण का प्रतीक है, जिसमें जीव अपनी समस्त क्रियाओं को भगवान के लिए समर्पित कर देता है। इस भजन का आध्यात्मिक महत्व यह है कि यह भक्त को उस परम सत्य की ओर ले जाता है, जहाँ केवल प्रेम है, केवल समर्पण है, और केवल आनंद है।

दैनिक जीवन में इस रचना की उपयोगिता

विद्यार्थियों के लिए

विद्यार्थियों के लिए यह भजन अत्यंत उपयोगी है। यह भजन उन्हें एकाग्रता, धैर्य और समर्पण का पाठ पढ़ाता है। जब विद्यार्थी इस भजन को सुनते या गाते हैं, तो उनका मन शांत होता है और वे अपने अध्ययन में अधिक ध्यान केंद्रित कर पाते हैं। यह भजन उन्हें यह भी सिखाता है कि जीवन में कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन भगवान पर विश्वास बनाए रखना चाहिए। "बुला के हमको बांके बिहारी" — यह पंक्ति विद्यार्थियों को यह सिखाती है कि जब भगवान हमें बुलाते हैं, तो हमें उनकी शरण में चले जाना चाहिए।

पेशेवरों के लिए

पेशेवर जीवन में व्यक्ति अनेक चुनौतियों का सामना करता है। यह भजन पेशेवरों को यह सिखाता है कि सफलता और असफलता दोनों में भगवान का स्मरण बनाए रखना चाहिए। "सेवा करूँगा मैं भी तुम्हारी, बन के तेरा पुजारी" — यह पंक्ति पेशेवरों को यह सिखाती है कि अपने कार्य को सेवा भाव से करना चाहिए। जब व्यक्ति अपने कार्य को सेवा के रूप में करता है, तो वह अधिक सफल होता है और उसे आंतरिक संतुष्टि भी मिलती है।

मानसिक शांति के लिए

आज के तनावपूर्ण जीवन में मानसिक शांति अत्यंत आवश्यक है। यह भजन मानसिक शांति का एक सुंदर साधन है। जब व्यक्ति इस भजन को सुनता है, तो उसका मन शांत होता है और उसे आंतरिक आनंद की अनुभूति होती है। "दिल में मेरे तुम रहते हो" — यह पंक्ति व्यक्ति को यह अनुभव कराती है कि भगवान उसके हृदय में विराजमान हैं, और वह कभी अकेला नहीं है। यह भजन ध्यान और मनन के लिए भी उत्तम है।

परिवार और समाज के लिए

यह भजन परिवार और समाज में प्रेम, एकता और सद्भावना का संदेश देता है। जब परिवार के सदस्य एक साथ इस भजन को गाते हैं, तो उनके बीच प्रेम और आत्मीयता बढ़ती है। यह भजन समाज को यह सिखाता है कि सभी को भगवान की संतान के रूप में देखना चाहिए और सभी से प्रेम करना चाहिए। "हँसने लगे हैं मुझपे दुनिया के सारे लोग रे" — यह पंक्ति यह सिखाती है कि समाज में विरोध और उपहास के बावजूद अपने विश्वास और प्रेम पर दृढ़ रहना चाहिए।

साधना, पाठ विधि एवं शुभ मुहूर्त

इस भजन का पाठ करने के लिए सर्वोत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) और संध्या काल (सूर्यास्त के बाद) है। ब्रह्म मुहूर्त में किया गया पाठ सर्वाधिक फलदायी माना जाता है, क्योंकि उस समय वातावरण शांत और पवित्र होता है। इस भजन का पाठ करने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करें और भगवान के सामने दीपक जलाएँ। तुलसी के पत्ते और फूल अर्पित करें। इस भजन का पाठ करते समय माला का उपयोग करें। स्फटिक, तुलसी या कमलगट्टे की माला उत्तम मानी जाती है। भजन का पाठ 108 बार करें या 11 बार करें। यदि समय कम हो तो 5 बार भी कर सकते हैं। पाठ करते समय मन को भगवान के चरणों में केंद्रित रखें। भजन के बोलों का अर्थ समझते हुए गाएँ। पाठ के बाद भगवान की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।

इस भजन के पाठ के अनेक लाभ हैं। यह भजन मन को शांत करता है, भक्ति भावना को बढ़ाता है, और भगवान के प्रति प्रेम को गहरा करता है। नियमित पाठ से व्यक्ति को मानसिक शांति, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह भजन गृह क्लेश, नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक तनाव को दूर करने में सहायक है। विशेष रूप से एकादशी, जन्माष्टमी, और अन्य वैष्णव पर्वों पर इस भजन का पाठ अत्यंत फलदायी माना जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: बांके बिहारी कौन हैं?
उत्तर: बांके बिहारी श्रीकृष्ण का एक स्वरूप हैं, जो वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर में विराजमान हैं। "बांके" का अर्थ है तिरछे नयन वाले और "बिहारी" का अर्थ है वृंदावन में विहार करने वाले।

प्रश्न 2: इस भजन का रचयिता कौन है?
उत्तर: इस भजन के रचयिता के बारे में कोई निश्चित प्रमाण नहीं है। यह भजन भक्ति परंपरा में अत्यंत लोकप्रिय है और इसे अनेक संतों और भक्तों ने गाया है।

प्रश्न 3: इस भजन का पाठ कब करना चाहिए?
उत्तर: इस भजन का पाठ ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4 से 6 बजे) या संध्या काल में करना उत्तम माना जाता है। एकादशी और जन्माष्टमी पर इसका पाठ विशेष फलदायी है।

प्रश्न 4: इस भजन का पाठ करने से क्या लाभ होता है?
उत्तर: इस भजन के पाठ से मानसिक शांति, भक्ति भावना, आत्मविश्वास और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। यह नकारात्मक ऊर्जा और तनाव को दूर करने में सहायक है।

प्रश्न 5: क्या इस भजन का पाठ करने के लिए किसी विशेष नियम का पालन करना आवश्यक है?
उत्तर: पाठ से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करें और भगवान के सामने दीपक जलाएँ। माला का उपयोग करें और मन को भगवान के चरणों में केंद्रित रखें।

प्रश्न 6: क्या यह भजन किसी विशेष संप्रदाय से संबंधित है?
उत्तर: यह भजन मुख्य रूप से वैष्णव परंपरा से संबंधित है, लेकिन इसका भाव सार्वभौमिक है। किसी भी संप्रदाय का भक्त इस भजन को गा सकता है और इसका आनंद ले सकता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिकता

यह लेख भक्तिलोक.इन के संपादकीय दल द्वारा तैयार किया गया है। इस लेख में दी गई जानकारी श्रीमद्भागवत महापुराण, भगवद्गीता, और वैष्णव भक्ति परंपरा के प्रामाणिक स्रोतों पर आधारित है। भजन के बोल पारंपरिक भक्ति परंपरा से लिए गए हैं और उनका भावार्थ विद्वानों द्वारा प्रमाणित है। हमारा उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध जानकारी प्रदान करना है। यदि आपको इस लेख में कोई त्रुटि मिले या कोई सुझाव हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें। हम आपके सुझावों का स्वागत करते हैं।

प्रामाणिकता स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, भगवद्गीता, वैष्णव भक्ति परंपरा, श्री बांके बिहारी मंदिर वृंदावन की परंपरा।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

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