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भक्ति रस काव्य व भजन

भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में लिरिक्स || bhole damaru baja do ek baar hamaare haree keertan me lyrics in hindi || Bhaktilok

57 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भोले डमरु: हरि कीर्तन का आनंद

इस भजन के माध्यम से भोलेनाथ की कृपा प्राप्त करने का अनूठा सार प्रस्तुत किया गया है।

भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में,कीर्तन में हरी कीर्तन में...शीश भोले के जटा विराजे,भोले गंगा बहा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में,हो भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में...संग भोले के गोरा विराजे,ओ भोले गणपति बुला दो आज हमारे हरी कीर्तन में,हो भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में...कान भोले के कुंडल सोहे,भोले चंदा चमका दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में,हो भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में...गले भोले के सर्पो की माला,भोले फुल बरसादो एक बार हमारे हरी कीर्तन में,हो भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में...अंग भोले के मृगछाला सोहे,भोले भस्मी उड़ा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में,हो भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में...चरणों में भोले के नंदी विराजे,भोले घुघरू बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में,हो भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में...ब्रह्मा को ले लाओ विष्णु को ले लाओ,भोले दर्श दिखा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में,हो भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में...भोले डमरु बजा दो एक बार हमारे हरी कीर्तन में,कीर्तन में हरी कीर्तन में...

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस भजन में प्रमुख रूप से भोलेनाथ के प्रति श्रद्धा और भक्ति दर्शायी गई है। 'भोले डमरु बजा दो' का अर्थ यह है कि भक्त प्रभु से डमरू का ध्वनि सुनाने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, जो भक्तों के हृदय में भक्ति जागृत करने का कार्य करता है। डमरू की ध्वनि का संबंध विश्व की सृष्टि और समापन से है, इसे साधना का प्रतीक माना जाता है। आगे 'भोले गंगा बहा दो' पंक्ति में गंगा नदी का उल्लेख किया गया है, जो शुद्धि, अनुग्रह और मोक्ष का प्रतीक है। 'इसी प्रकार संपूर्ण पंक्तियाँ, जैसे 'कान भोले के कुंडल सोहे' और 'गले भोले के सर्पो की माला', यह सभी भोलेनाथ की दिव्य रूपों और उनके गुणों का गुणगान करती हैं। भक्त कीर्ति और श्रद्धा के साथ भोलेनाथ से प्रार्थना कर रहे हैं कि वे अपनी दिव्य उपस्थिति से इस भक्ति संध्या को पवित्र करें।

इस भजन में भावार्थ की गहराई में जाकर देखें तो भक्त का हृदय ईश्वर के प्रति असीम प्रेम से भरा हुआ है। हर पंक्ति एक नए अनुरोध की ओर संकेत करती है, जिससे भक्त की भावनाओं का प्रवाह स्पष्टता से महसूस किया जा सकता है। जैसे-जैसे भक्ति आगे बढ़ती है, भक्त के मन में ईश्वर के प्रति एक अनियंत्रित श्रद्धा उत्पन्न होती है। 'ब्रह्मा को ले लाओ विष्णु को ले लाओ' जैसी पंक्तियाँ यह प्रदर्शित करती हैं कि भक्त की आत्मा सभी देवताओं के एकत्व का अनुभव करना चाहती है और सर्वशक्तिमान की उपस्थिति को अपने जीवन में महसूस करना चाहती है। यहां पर समर्पण की गहराई और स्थायी प्रेम का तत्व मौजूद है, जिसमे भक्त अपने हृदय की गहराई से प्रार्थना कर रहा है।

भक्ति मार्ग का यह प्रार्थना स्वरूप दर्शाता है कि कैसे प्रेम और श्रद्धा के माध्यम से भक्त शिव की अनुकंपा को प्राप्त कर सकते हैं। ध्यान में रखते हुए भक्ति और प्रेम के समर्पण के तत्वों को समझते हुए, हम यह देख सकते हैं कि भगवान शिव को अर्पित यह भजन आत्मा और परमात्मा के बीच की अद्वितीय संपूर्णता को प्रकट करता है। इस भक्ति के माध्यम से भक्त अपने सभी आंतरिक बन्धनों और दुखों से मुक्ति की प्रार्थना करता है। भक्ति मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति के लिए यह भजन एक साधारण सा साधन है, जो उसे भगवान के करीब लाने का कार्य करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

यह भजन शिव और उनकी भक्ति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहाँ महादेव की महिमा को गाने और उनकी कृपा को अर्जित करने का प्रयास किया जा रहा है। पुराणों में बताया गया है कि शिव का डमरू सृष्टि की विस्तार से जुड़ा हुआ है, और ऐसा माना जाता है कि जब शिव डमरू बजाते हैं, तब ब्रह्माण्ड की सृष्टि और संहार की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। इस प्रकार, यह भजन भक्तों के बीच शिव की महानता को प्रदर्शित करने के साथ-साथ उन्हें अपने दिव्य गुणों की ओर आकर्षित करने का कार्य करता है। यहां तक कि भक्त भक्ति की शक्ति का अनुभव करते हैं और उसे जीवन के हर पहलू में समाहित करने का प्रयास करते हैं।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भजन का नियमित जाप करने से मन की शांति, आंतरिक शक्ति और उत्साह का अनुभव होता है। भक्तों को मानसिक स्थिरता और सकारात्मकता मिलती है। इसके अलावा, शिव की कृपा से शरीर और मन की अस्वस्थता दूर होती है और व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ता है। भक्त की आत्मिक ऊर्जा को बढ़ाने में भी यह भजन सहायक होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भजन का पाठ सुबह के समय करना सबसे उत्तम होता है, जब चित्त शुद्ध और शांत होता है। भजन के दौरान दीपक जलाना और पुष्प अर्पित करना विशेष रूप से लाभदायक माना जाता है। भक्ति भाव से पूर्ण ध्यानपूर्वक बैठकर इस भजन को गाने से मन में एक अनोखा शांति और ऊर्जा का संचार होता है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस भजन के विशेष लाभ क्या हैं?

इस भजन के माध्यम से भक्त मानसिक शांति, सकारात्मकता और शिव की कृपा का अनुभव करते हैं। यह तनाव को कम करने और आत्मा को शुद्ध करने में सहायक होता है।

इस भजन को किस समय करना चाहिए?

इस भजन का गायन सुबह या संध्या के समय करना चाहिए, जब एकाग्रता अधिक होती है और मन स्वच्छ होता है।

क्यों यह भजन विशेष भक्ति का प्रतीक है?

यह भजन शिव की महिमा और उनके प्रति गहरे प्रेम और श्रद्धा का प्रतिनिधित्व करता है, जिससे भक्त शिव की कृपा को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 22 Aug 2026

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