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संपूर्ण स्वस्ति वचन मंत्र इन संस्कृत (Sampurn Swasti Vachan Mantra in Sanskrit) - ॐ आनोभद्रा: क्रतवो यन्तु विस्वतो Swasti Vachan - Bhaktilok

2,172 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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संपूर्ण स्वस्ति वचन मंत्र की दिव्य महिमा

यह मंत्र शांति, सुरक्षा और समर्पण का प्रतीक है, जो हर कार्य में शुभता लाने का आह्वान करता है।

संपूर्ण स्वस्ति वचन मंत्र इन संस्कृत (Sampurn Swasti Vachan Mantra in Sanskrit) -|| सम्पूर्ण स्वस्तिवाचन || मंगलाचरण || ॐ आनोभद्रा: क्रतवो यन्तु विस्वतोदब्धासो अपरीतास उद्भिद:।देवानो यथा सदमिद वृधेअसन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवे दिवे।।देवानां भद्रा सुमतिर्रिजुयताम देवानाग्वंग रातिरभि नो निवार्ताताम।देवानां ग्वंग सख्यमुपसेदिमा वयमदेवान आयु: प्रतिरन्तु जीवसे।।तान पूर्वया निविदा हूमहे वयमभगं मित्र मदितिम दक्षमस्रिधम।अर्यमणं वरुण ग्वंग सोममस्विनासरस्वती न: सुभगा मयस्करत ।।तन्नोवातो मयोभूवातु भेषजंतन्नमाता पृथिवी तत्पिता द्यौ: ।तद्ग्रावान: सोमसुतो मयोभूवस्तदस्विना श्रुनुतं धिष्ण्या युवं ।।तमीशानं जगतस्तस्थुखसपतिंधियंजिन्वमवसे हूमहे वयम ।पूषा नो यथा वेद सामसद वृधेरक्षिता पायुरदब्ध: स्वस्तये ।।स्वस्ति न इन्द्रो वृद्ध श्रवा:स्वस्ति न पूषा विस्ववेदा: ।स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमि:स्वस्ति नो वृहस्पति दधातु।।पृषदश्वा मरुत: प्रिश्निमातर:शुभं यावानो विदथेषु जग्मय:।अग्निजिह्वा मनव: सूरचक्षसोविश्वे नो देवा अवसागमन्निह।।भद्रं कर्णेभि: शृणुयाम देवाभद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा ग्वंग सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायु:।।शतमिन्नु शरदो अन्ति देवायत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम् ।पुत्रासो यत्र पितरो भवन्तिमानो मध्या रीरिषतायुर्गन्तो:।।अदितिर्द्यौरदितिरन्तरिक्ष्मदितिर्माता स पिता स पुत्र:।विश्वेदेवा अदिति: पञ्चजनाअदितिर्जातमदितिर्जनित्वम् ।।द्यौ: शान्ति रन्तरिक्ष् ग्वंग शान्ति: पृथिवीशान्ति राप: शान्ति रोषधय: शान्ति:।वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्मशान्ति: सर्व ग्वंग शान्ति: शान्तिरेवशान्ति: सामा शान्तिरेधि।।यतो यत: समीहसे ततो नो अभयं कुरु ।शं न: कुरु प्रजाभ्यो भयं न: पशुभ्य: ।।सुशान्तिर्भवतुश्री मन्महागणाधिपतये नमः।लक्ष्मीनारायणाभ्यां नम:।उमामहेश्वराभ्यां नम:।वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नं:।शचिपुरन्दराभ्यां नम:।इष्टदेवताभ्यो नम:।कुलदेवताभ्यो नम:।ग्रामदेवताभ्यो नम:।वास्तुदेवताभ्यो नम:।स्थानदेवताभ्यो नम:।सर्वेभ्यो देवेभ्यो नम:।सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नम:।ॐ सिद्धिबुद्धिसहिताय श्री मन्महागणाधिपतये नम:।सुमुखश्चैकदन्तश्चकपिलो गजकर्णकः।लम्बोदरश्च विकटोविघ्ननाशो विनायक:।।धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षोभालचन्द्रो गजानन:।द्वद्शैतानि नामानियः पठे च्छ्रिणुयादपी।।विद्यारंभे विवाहे चप्रवेशे निर्गमे तथा।संग्रामे संकटे चैवविघ्नस्तस्य न जायते।।शुक्लाम्बरधरं देवंशशिवर्णं चतुर्भुजम्।प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्व्विघ्नोपशान्तये।।अभिप्सितार्थ सिद्ध्यर्थंपूजितो य: सुरासुरै:।सर्वविघ्नहरस्तस्मैगणाधिपतये नम:।।सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये !शिवे ! सर्वार्थसाधिकारी।शरण्ये त्र्यम्बिके !गौरी नारायणि नमोस्तुते।।सर्वदा सर्वकार्येषुनास्ति तेषाममङ्गलम्।येषां हृदयस्थो भगवान्मङ्गलायतनो हरि:।।तदेव लग्नं सुदिनं तदेव,ताराबलं चन्द्रबलं तदेव ।विद्याबलं दैवबलं तदेव,लक्ष्मीपते तेन्घ्रियुगं स्मरामि।।लाभस्तेषां जयस्तेषांकुतस्तेषां पराजय:।येषामिन्दीवरश्यामोहृदयस्थो जनार्दन:।।यत्र योगेश्वर: कृष्णोयत्र पार्थो धनुर्धर:।तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।अनन्यास्चिन्तयन्तो मांये जना: पर्युपासते।तेषां नित्याभियुक्तानांयोगक्षेमं वहाम्यहम्।।स्मृतेःसकल कल्याणंभाजनं यत्र जायते।पुरुषं तमजं नित्यंव्रजामि शरणं हरम्।।सर्वेष्वारंभ कार्येषुत्रय:स्त्री भुवनेश्वरा:।देवा दिशन्तु नः सिद्धिंब्रह्मेशानजनार्दना:।।विश्वेशम् माधवं दुन्धिंदण्डपाणिं च भैरवम्।वन्दे काशी गुहां गंगाभवानीं मणिकर्णिकाम्।।वक्रतुण्ड् महाकायसूर्य कोटि समप्रभ।निर्विघ्नं कुरु में देवसर्वकार्येषु सर्वदा।।ॐ श्री गणेशाम्बिका भ्यां नम: ||

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

संपूर्ण स्वस्ति वचन मंत्र के माध्यम से, पुराणों में वर्णित देवताओं का आह्वान किया गया है, विभिन्न देवताओं से सुख, शांति और समृद्धि की कामना की जाती है। 'ॐ आनोभद्रा: क्रतवो यन्तु विस्वतो' से स्पष्ट है कि मनुष्य का हर कार्य, विचार और उद्देश्य ब्रह्माण्ड के सभी जीवों के भले के लिए होना चाहिए। यहाँ यह संदेश निहित है कि हमें सदैव अपने शुभ कार्यों में एकता और समर्पण की भावना रखनी चाहिए। इस मंत्र में देवताओं से प्रार्थना की गई है कि वे हमें सन्मति दें ('भद्रा सुमति:'), जिससे हम सिद्धि की ओर अग्रसर हों। यह मंत्र एकता, सहिष्णुता और सहयोग का प्रतीक है, जो सभी जीवों के कल्याण का आधारभूत संदेश देता है।

इस मंत्र का महत्व केवल वाचनतक नहीं है, बल्कि इससे जुड़ा भावार्थ गहरा और व्यापक है। यह केवल भगवान से भलाई की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह मानवता की एकता, प्रेम और सहयोग की ओर भी इंगित करता है। 'स्वस्ति न इन्द्रो वृद्ध श्रवा:' के माध्यम से, यह अवश्य चाहिए कि हमारे मन के विचार और कार्य इंद्र की कृपा से संचित हों। इस प्रकार, यह मंत्र न केवल आध्यात्मिक समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है, بلکہ यह भौतिक रूप से भी अभ्युदय प्रदान करता है। इस मंत्र को नियमित रूप से जाप करनें पर, व्यक्ति मन की शांति, धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा का भंडार प्राप्त करता है, जिससे उसका हर कार्य सफल होता है।
यहां यह प्रदर्शित किया गया है कि प्रार्थना में एकजुटता और सामूहिकता की कितनी महत्वता है।

वेदों और उपनिषदों के संदर्भ में, यह मंत्र मानवता के कल्याण के लिए एक स्पष्ट मार्गदर्शक है। यहाँ 'देवानां ग्वंग सख्यमुपसेदिमा' का अर्थ है कि हम सभी को एक देवता के रूप में एकसाथ रहना चाहिए, जिससे हमें मित्रता और सुरक्षा मिलती है। यह एक महत्वपूर्ण इस्लाह भी है कि हमें अपने जीवन में प्रेम और मित्रता को अपनाना चाहिए। संकट के समय, यह मंत्र हमें विकल्प मानते हुए एकात्मता की ओर ले जाता है। भक्ति मार्ग की यह विशेषता है कि हम सब एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ रहें। यह केवल धर्म का पालन नहीं है, बल्कि मानव के लिए एक उत्कृष्ट जीवन की बनाने के लिए किया जाता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

पौराणिक संदर्भ में यह मंत्र अत्यंत महत्वपूर्ण है, जैसे कि उपनिषदों में शांति और समृद्धि की प्राप्ति के लिए किए गए आव्हानों में बहुत ध्यान दिया गया है। अग्नि पुराण, साम वेद तथा ऋग्वेद भी इस शांति मंत्र का उल्लेख करते हैं, जिसमें सर्वदेवता को समर्पित प्रार्थनाएं होती हैं। यह वचन मंत्र सम्पूर्ण मानवता का शांति एवं समृद्धि के लिए एक आधारभूत स्रोत है। इसके माध्यम से, व्यक्ति अपने निजी जीवन में ही नहीं, बल्कि समाज में भी एकता का प्रचार कर सकता है। कथा सम्राट ने कहा है कि 'यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:' यही परम-शांति का सूचक है और यही इस मंत्र का मुख्य लक्ष्य भी है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस मंत्र का जाप करने से मानसिक शांति, शरीर में स्वास्थ, एवं आध्यात्मिक उन्नति होती है। व्यक्ति नकारात्मक ऊर्जा से दूर रहता है और सकारात्मक मानसिकता प्राप्त करता है। इसके दैनिक जाप से अनेक प्रकार की विघ्न-बाधाएँ दूर होती हैं और जीवन में समर्पण एवं अनुशासन की भावना विकसित होती है। इसके अलावा, विभिन्न प्रकार की लक्ष्मियों एवं सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस मंत्र का जाप सुबह सूर्योदय के समय या शाम को करें। पूजा करते समय एक दीपक जलाना चाहिए और सफेद फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। उच्च मनोबल एवं सकारात्मक ऊर्जा के साथ बैठकर इस मंत्र का जप करना चाहिए। सही आसन पर बैठकर चित्त को स्थिर करना अत्यंत आवश्यक है। ध्यान करते समय विचारों को सकारात्मक रखने से पूर्णता का अनुभव होता है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

इस मंत्र का सही समय क्या है?

यह मंत्र सुबह सूर्योदय या कृत्य के समय पाठ करना अत्यंत फलदायी होता है। यह समय ऊर्जा से भरा और बलवान होता है, जिससे साधक की प्रार्थना जल्दी स्वीकार होती है।

क्या यह मंत्र केवल किसी विशेष देवता के लिए है?

नहीं, यह मंत्र सभी देवताओं के लिए है और इसकी शुभता सभी प्रकार के कार्यों में होती है। यह समग्र कल्याण के लिए है।

क्या इस मंत्र का पाठ करने से कोई विशेष लाभ होता है?

जी हां, इस मंत्र का पाठ करने से मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक लाभ होते हैं। यह व्यक्ति को स्थिरता और शांति प्रदान करता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 05 Sep 2026

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