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Narayana Kavacham

नारायण कवचम (Narayana Kavacham Lyrics in Hindi) - by Prem Prakesh Dubey कष्ट और संकट नाशक नारायण कवचम् - Bhaktilok

85 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

 

नारायण कवचम (Narayana Kavacham Lyrics in Hindi) -

यया गुप्तः सहस्त्राक्षः सवाहं रिपुशैनिकान्।

कृष्ण्निव विनिर्जित्य त्रैलोक्य बुभुजे श्रीयम्॥1॥


भगवन्स्तनमाख्याहि वर्मा नारायणात्मकम्।

यथासस्तयिनः शत्रुं येन गुप्तोस्जयन्मृद्धे॥2॥


श्री शुक उवाच


वृतः पुरोहितोस्तवस्त्रो महेन्द्रायणुपृच्छते।

नारायणाख्यं वरमह तदिहाइकमनाः शृणु॥3॥


विश्वरूप उवाच


धौतांग्घृपनिराचाम्य सपवित्र उदं मुखः।

कृतस्वांगकारण्यसो मन्त्रभ्यां वाग्यतः शुचिः॥4॥


नारायणमयं वर्मा सन्नहयेद भय अगतते।

पदयोर्जानुनोरोर्वोरुदारे ह्रदयथोरसि॥5॥


मुखे शिरस्यानुपूर्वव्यादोन्करादिनि विन्यासेत्।

ॐ नमो नारायणायति विपर्ययमाथापि वा॥6॥


करण्यासं ततः कुर्याद् द्वादशाक्षरविद्या।

प्रणवादियकारान्तमन्गुल्यन्गुष्ठपर्वसु॥7॥


न्यासेद् हृदय ओन्कारं विक्रमानु मूर्धनि।

षकारं तु भुर्वोर्मध्ये शंकरं सिखाय दिशेत॥8॥


वेकरं नेत्रयोर्युञ्ज्यन्नकारं सर्वसंधिषु।

मकरमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद् बुधः॥9॥


सविसर्गं फंदन्तं तत् सर्वादिक्षु विनिर्दिष्ट।

ओं विष्णवे नम इति ॥10॥


आत्मनं परमं ध्यायेदा ध्येयं शशंशक्तिभिर्युतम।

विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहारेता ॥11॥


ॐ हरिर्विद्ध्यान्म सर्वरक्षां न्यस्तंघृपद्मः पतगेन्द्रपृष्टे।

दारारिचर्मासिगादेशुचापाशां दधानोस्थगुणोस्थबाहुः ॥12॥


जलेषु माम् रक्षतु मत्स्यमूर्तिर्यादोगनेभ्यो वरुणस्य पाशात्।

स्थलेषु मयावतुवामानोस्वयत् त्रिविक्रमः खेवतु विश्वरूपः ॥13॥


दुर्गेश्वतव्याजिमुखादिषु प्रभुः पयन्नृसिंहोसूरयुथापरिः।

विमुञ्चतो यस्य महन्तहसां दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भः ॥14॥


रक्षत्वसौ माधवानि यज्ञकल्पः स्वदष्ट्रयोन्नितधारो वराहः।

रामोद्रिकुतेश्वथ विप्रवासे सलक्ष्मणोस्व्याद् भ्राताग्रजोस्स्मान् ॥15॥


मामुग्रधर्मदाखिलात् प्रमादन्नारायणः पातु नाराश्च हसत्।

दत्तस्त्वयोगादथा योगनाथः पयद् गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥16॥


सनत्कुमारो वतु कामदेवधयशीर्ष मम् पथि देवहेलनात्।

देवर्षिवर्यः पुरुषार्चानन्तरात् कूर्मो हरिरामं निरायदशेषत् ॥17॥


धन्वन्तरिर्भगवान् पट्वपथ्याद् द्वंदवाद भयादर्षभो निर्जितात्मा।

यज्ञश्च लोकादवत्ज्जनन्ताद बालो गणात क्रोधवशादहिन्द्रः ॥18॥


द्वैपायनो भगवानप्रबोधाद बुद्धस्तु पाखंडगानात प्रमादात्।

कल्किः काले कालमलात प्राप्ततु धर्मावनायोर्कृतावतारः ॥19॥


मम केशवो गदया प्रतारव्याद् गोविंद असंगवमत्तवेणु:।

नारायण प्राण उदत्तशक्तिमध्यन्दिन विष्णुरिन्द्रपणिः ॥20॥


देवोस्परहणे मधुहोग्रधन्वा सयं त्रिधामावतु माधवो माम।

दोषे हृषीकेश उत्तरधरात्रे निशीथ इकोस्वतु पद्मनाभः ॥21॥


श्रीवत्सधामपरात्र ईशाः प्रत्युषः ईशोसिधरो जनार्दनः।

दामोदरोवद्यदानुसंध्यां प्रभाते विश्वेश्वरो भगवान कलामूर्तिः ॥22॥


चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि भ्रमत् समन्ताद भगवत्प्रयुक्तम्।

दण्डग्धि दण्डग्ध्यरीसैन्यमसु कक्षं यथा वत्सखौ हुताशः ॥23॥


गदेशनिस्पर्शनविस्फुलिंगे निश्पिन्धि निश्पिन्ध्यजितप्रियसि।

कुष्माण्डवैनायकायक्षरक्षोभूतग्रहाणश्चुर्णाय चूर्णयारिन् ॥24॥


त्वं यातुधानप्रमथप्रेतामातृपिशचविप्राग्रहघोरदृष्टीं।

दरेन्द्र विद्रवय कृष्णपूरितो भीमस्वनोरेर्हृदयनि कम्पायण ॥25॥


त्वं तिग्मधाराशिवरारिसैन्यमीषप्रयुक्तो मम चिन्धि चिन्धि।

चर्मन्चत्चन्द्र चदय द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ॥26॥


यन्नो भयं गृहेभ्यो भूत केतुभ्यो नृभ्य एव च।

सरिसर्पेभ्यो दंस्ट्रिभ्यो भूतेभ्योहोभ्य इव वा ॥27॥


सर्वान्येतानि भगन्नामारूपास्त्रकीर्तनात्।

प्रयांतु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयः प्रतिपकः ॥28॥


गरुण्डक्षो भगवान स्तोत्रस्तोभासचंदोमयः प्रभुः।

रक्षत्वशेषश्चचरेभ्यो विश्वक्सेनः स्वनामभिः ॥29॥


सर्वपदभ्यो हरेर्नमारूपायणायुधनि न:।

बुद्धिन्द्रियमनः प्राणान् पन्तु पार्षदाभूषणः ॥30॥


यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत्।

सत्यानानेन नः सर्वे यन्तु नाशमुपद्रवः ॥31॥


यथैकात्म्यानुभावानां विकलपराहितः स्वयम्।

भूषणायुद्धलिंगाख्य धत्ते शक्तिः स्वमायाया ॥32॥


तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान हरिः।

पातु सर्वैः स्वरूपैर्नाः सदा सर्वत्र सर्वागः ॥33


विदिकु दीक्षुर्ध्वमधः समन्तदन्तरबहिरभगवान् नरसिम्हः।

प्रहापायल्ललोकभयं स्वनेन ग्रस्तासमस्ततेजाः ॥34॥


मघवन्निदमाख्यातं वर्मा नारायणात्मकम्।

विजेश्यस्यञ्जसा येन दंशितोसूरयुथापन ॥35॥


एतद् धारयमनस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा।

पदा वा संस्पृष्टे सद्यः साधवसात् स विमुच्यते ॥36॥


न कुतश्चित भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत्।

राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च करहिचित् ॥37॥


इमं विद्यां पुरा कश्चित् कौशिको धारयण द्विजः।

योगधारणाय स्वंगं जहौ स मरुधन्वानि ॥38॥


तस्योपरि विमानेन गंधर्वपतिरेकदा।

यायौ चित्ररथः स्त्रीर्भिवृत्तो यत्र द्विजक्षयः ॥39॥


गगनन्यापतात् सद्यः सविमानो ह्यवाक् शिराः।

सा वलाखिल्यवचनादस्थिनयादय विस्मितः।

प्रस्य प्राचीसरस्वत्यं स्नात्व धाम स्वमन्वगत ॥40॥


श्री शुक उवाच


य इदं शृणुयात् काले यो धारयति चद्रतः।

तं नमस्यान्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ॥41॥


एताम् विद्यामधिगतो विश्वरूपचचत्क्रतुः।

त्रिलोक्यलक्ष्मिं बुभुजे विनिर्जित्यमृधेसुरं ॥42॥


॥इति श्री नारायण कवचं सम्पूर्णम्॥

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "नारायण कवचम (Narayana Kavacham Lyrics in Hindi) - by Prem Prakesh Dubey कष्ट और संकट नाशक नारायण कवचम् - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 01 Sep 2026

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