बाल काण्ड अध्याय 7

अयोध्या का प्रशासन

बाल काण्ड का सप्तम सर्ग अयोध्या की प्रशासनिक व्यवस्था का विस्तृत एवं सूक्ष्म वर्णन प्रस्तुत करता है। इस सर्ग में नगर के विभिन्न विभागों, अधिकारियों के कर्तव्य, न्याय प्रणाली, कर व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र और जनकल्याण की योजनाओं का सजीव चित्रण है। यह सर्ग एक आदर्श राज्य की प्रशासनिक संरचना का दर्पण है।

विवरण

यह सर्ग अयोध्या के प्रशासनिक ढाँचे का अत्यन्त विस्तृत वर्णन करता है। प्रारम्भ में नगर के मुख्य अधिकारियों का उल्लेख है – नगराध्यक्ष, दुर्गपाल, कोषाध्यक्ष, सेनापति, धर्माध्यक्ष, मंत्रिपरिषद के सदस्य आदि। प्रत्येक अधिकारी के कर्तव्यों और उनकी योग्यताओं का सुन्दर चित्रण है। तत्पश्चात् न्याय प्रणाली का वर्णन है – राजा स्वयं प्रतिदिन प्रजा के मामलों को सुनते थे, न्याय में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होता था। धर्माधिकारी धर्मशास्त्रों के अनुसार निर्णय देते थे। कर व्यवस्था का भी वर्णन है – प्रजा से उचित कर लिया जाता था, जो राजकोष में जमा होता था और उसी से जनकल्याण के कार्य होते थे। नगर की सुरक्षा के लिए चारों द्वारों पर प्रहरी तैनात थे, रात्रि में गश्त की व्यवस्था थी। नगर के विभिन्न भागों में चौकियाँ थीं। जनकल्याण के अन्तर्गत मुफ्त भोजनालय, चिकित्सालय, विद्यालय और धर्मशालाओं का उल्लेख है। नगर में सड़कें, नालियाँ, जलापूर्ति की व्यवस्था सुनियोजित थी। इस प्रकार इस सर्ग में एक आदर्श राज्य की सम्पूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था का चित्रण है, जो आज भी प्रासंगिक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ७

(अयोध्या का प्रशासन – नगर प्रबंधन, न्याय, कर एवं सुरक्षा व्यवस्था)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ सप्तमः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में अयोध्या के राजा और नागरिकों के गुणों का वर्णन था। अब इस सप्तम सर्ग में वाल्मीकि जी उस नगरी की प्रशासनिक व्यवस्था का सूक्ष्म चित्रण करते हैं। यह सर्ग केवल एक नगर का वर्णन नहीं, वरन् प्राचीन भारतीय प्रशासन पद्धति का एक जीवन्त दस्तावेज है। यहाँ हम देखते हैं कि किस प्रकार नगर के विभिन्न विभाग, अधिकारी, न्याय प्रणाली, कर व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र और जनकल्याण की योजनाएँ एक-दूसरे से समन्वित थीं। यह वही प्रशासनिक पृष्ठभूमि है, जिसमें राम बड़े होकर एक आदर्श राजा बने।

🏛️ नगर के मुख्य अधिकारी एवं उनके कर्तव्य (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १ ॥
तस्यां पुर्यां महातेजा दशरथो महीपतिः ।
नगराध्यक्षमेकाग्रं नियुयोज महामतिम् ॥ १-७-१ ॥
🔹 पदच्छेद : तस्याम् = उस; पुर्याम् = पुरी में; महातेजाः = महातेजस्वी; दशरथः = दशरथ; महीपतिः = राजा; नगराध्यक्षम् = नगराध्यक्ष (नगर प्रशासक) को; एकाग्रम् = एकाग्रचित्त; नियुयोज = नियुक्त किया; महामतिम् = महामति (महान बुद्धि वाले) को।
📖 भावार्थ : उस पुरी में महातेजस्वी राजा दशरथ ने एक महामति, एकाग्रचित्त नगराध्यक्ष को नियुक्त किया।
🔍 व्याख्या : नगराध्यक्ष नगर का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी होता था। उसे 'एकाग्रम्' कहकर उसकी एकनिष्ठता और कर्तव्यपरायणता को रेखांकित किया गया है।
॥ श्लोक २-३ ॥
दुर्गपालं च बलिनं कोषाध्यक्षं च धार्मिकम् ।
सेनापतिं च शूरं च धर्माध्यक्षं च पण्डितम् ॥
एतानन्यांश्च विविधानधिकारिण उत्तमान् ।
यथाकर्म यथाशास्त्रं नियुयोज महीपतिः ॥
📖 भावार्थ : बलशाली दुर्गपाल (किले का रक्षक), धार्मिक कोषाध्यक्ष, शूरवीर सेनापति और पण्डित धर्माध्यक्ष – इन और अन्य विविध उत्तम अधिकारियों को राजा ने यथाकर्म और यथाशास्त्र नियुक्त किया।
🔍 व्याख्या : यहाँ पाँच प्रमुख अधिकारियों का उल्लेख है – नगराध्यक्ष (नगर प्रशासक), दुर्गपाल (सुरक्षा प्रमुख), कोषाध्यक्ष (वित्त मंत्री), सेनापति (रक्षा मंत्री), धर्माध्यक्ष (न्यायाधीश)। प्रत्येक की नियुक्ति उनके गुणों के अनुसार हुई।
॥ श्लोक ४-६ ॥
ते सर्वे स्वेषु कार्येषु नियुक्ता राज्ञा तदा ।
अव्यग्राः सततं राजन् प्रजाः सम्यगरक्षिषुः ॥
नगरे जनपदे चैव ये च राज्ञः समीपगाः ।
सर्वे स्वेषु च कार्येषु नियुक्ताः कर्मसु स्थिताः ॥
न तेषामभवच्चिन्ता राज्ञः कोशे कथंचन ।
यथाकालं च ते सर्वे प्राप्नुवन्त्युचितां गतिम् ॥
📖 भावार्थ : वे सभी राजा द्वारा अपने-अपने कार्यों में नियुक्त होकर, अव्यग्र (शान्त) चित्त से सदा प्रजा की सम्यक् रक्षा करते थे। नगर में, जनपद में और राजा के समीप जो भी अधिकारी थे, सब अपने-अपने कार्यों में नियुक्त और तत्पर रहते थे। उन्हें राजकोष की कोई चिन्ता नहीं थी, और वे सभी यथाकाल अपनी उचित गति (वेतन-सुविधाएँ) प्राप्त करते थे।

⚖️ न्याय प्रणाली – राजा का दरबार एवं धर्माधिकारी (श्लोक ११-१८)

॥ श्लोक ११ ॥
स राजा प्रातरुत्थाय कृतपौर्वाह्णिकक्रियः ।
प्रजाः सर्वाः समागम्य शृणोति स्म च नित्यशः ॥ १-७-११ ॥
📖 भावार्थ : वे राजा प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन कर्तव्यों (स्नान, ध्यान, पूजा) को सम्पन्न करके सभी प्रजा को बुलाकर उनकी समस्याएँ नित्य सुनते थे।
॥ श्लोक १२-१३ ॥
तेषां च निखिलं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं वचः ।
विसर्जयित्वा तान् सर्वान् मन्त्रिभिः सह मन्त्रयेत् ॥
ततो धर्मार्थकामेषु समं पश्यति सर्वदा ।
न च धर्माद्विचलति न चार्थान्न च कामतः ॥
📖 भावार्थ : उनके धर्म और अर्थ से युक्त सम्पूर्ण वचनों को सुनकर, उन सबको विदा करके वे मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करते थे। तत्पश्चात् धर्म, अर्थ और काम में समान दृष्टि रखते थे। वे धर्म से, अर्थ से और काम से कभी विचलित नहीं होते थे।
॥ श्लोक १४-१५ ॥
धर्माध्यक्षाः सभासद्ये धर्मशास्त्रविशारदाः ।
न्यायतो धारयन्ति स्म धर्मं धर्मेण धार्मिकाः ॥
न तत्र वञ्चना नास्ति न दम्भो न च मत्सरः ।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा वर्तन्ते नात्र संशयः ॥
📖 भावार्थ : धर्माध्यक्ष और सभासद धर्मशास्त्र में निपुण थे। वे धार्मिक होकर धर्म के अनुसार न्यायपूर्वक धर्म का पालन कराते थे। वहाँ न कोई वञ्चना थी, न दम्भ, न मत्सर। सभी प्रजा धर्म के अनुसार ही आचरण करती थी – इसमें संशय नहीं।
🔍 व्याख्या : अयोध्या की न्याय प्रणाली पूर्णतः निष्पक्ष और धर्मशास्त्र पर आधारित थी। न्यायाधीश धर्मशास्त्र के विद्वान् होते थे और उनमें किसी प्रकार का दुराग्रह नहीं होता था।

💰 कर व्यवस्था एवं राजकोष (श्लोक १९-२४)

॥ श्लोक १९ ॥
कोषाध्यक्षो महाबुद्धिः कोषं संरक्षते सदा ।
धर्मोपचितमत्यर्थं प्रजाभ्यश्च समाहृतम् ॥ १-७-१९ ॥
📖 भावार्थ : महाबुद्धि कोषाध्यक्ष सदा कोष की रक्षा करता था। वह कोष धर्म से उपचित (एकत्र) किया गया था और प्रजा से उचित रूप से एकत्र किया गया था।
॥ श्लोक २०-२१ ॥
नात्यर्थं संगृहीतव्यं नात्यर्थं परिवर्जितम् ।
यथाकालं च दातव्यं धर्मशास्त्रेषु निश्चितम् ॥
करान् संगृह्य धर्मेण प्रजाभ्यो धर्मसंहितान् ।
रक्षणं च समं कुर्याद्धर्मेणैव महीपतिः ॥
📖 भावार्थ : न तो अत्यधिक कर संग्रह करना चाहिए और न ही बिल्कुल नहीं लेना चाहिए। यथाकाल (समय पर) देना चाहिए – ऐसा धर्मशास्त्रों में निर्धारित है। राजा को धर्म से प्रजा से उचित कर संग्रह करके, धर्मपूर्वक ही प्रजा की रक्षा करनी चाहिए।
🔍 व्याख्या : यहाँ कर व्यवस्था का आदर्श सिद्धांत बताया गया है – न तो इतना कर लो कि प्रजा त्रस्त हो जाए, न ही इतना कम कि राज्य का संचालन न हो सके। यह 'मित-कर' की अवधारणा है।
॥ श्लोक २२-२४ ॥
तेन कोषेण धर्मज्ञः प्रजाः पालयते सदा ।
यथाकालं च दानानि ददाति विविधानि च ॥
देवतानां पितॄणां च ब्राह्मणानां तथैव च ।
अतिथीनां च सर्वेषां दानं यच्छति नित्यशः ॥
एवं तस्य महाराज्ञः कोषः सदा विवर्धते ।
प्रजानां च सुखं चैव धर्मश्चैव न हीयते ॥
📖 भावार्थ : उस कोष से धर्मज्ञ राजा सदा प्रजा का पालन करता था और यथाकाल विविध दान देता था। देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और सभी अतिथियों को नित्य दान देता था। इस प्रकार उस महाराजा का कोष सदा बढ़ता था और प्रजा का सुख तथा धर्म कभी ह्रास नहीं होता था।

🛡️ नगर सुरक्षा व्यवस्था – प्रहरी, गश्त एवं चौकियाँ (श्लोक २५-३०)

॥ श्लोक २५ ॥
द्वाराण्यष्टौ महाराज्ञः सुयुक्तानि बभूविरे ।
दुर्गपालैर्महावीर्यैः सहस्राक्षैरिवापरैः ॥ १-७-२५ ॥
📖 भावार्थ : महाराजा के आठों द्वार सुयुक्त (अच्छी तरह सुरक्षित) थे। वे महावीर्य दुर्गपालों से युक्त थे, जो मानो अन्य सहस्राक्ष (इन्द्र) के समान थे।
॥ श्लोक २६-२७ ॥
रात्रौ चरन्ति ये तत्र नगरे गुप्तिहेतवः ।
ते सर्वे धार्मिका वीराः कृतास्त्राः कृतनिश्चयाः ॥
न तेषामभवच्चिन्ता निद्रा वा कुत्रचित्क्वचित् ।
राज्ञः प्रियहिते युक्ताः सदा प्राणान् समुत्सृजन् ॥
📖 भावार्थ : रात्रि में जो प्रहरी नगर की सुरक्षा के लिए विचरण करते थे, वे सभी धार्मिक, वीर, कृतास्त्र (अस्त्र-शास्त्र में निपुण) और कृतनिश्चय (दृढ़ निश्चयी) थे। उन्हें कहीं कोई चिन्ता या निद्रा नहीं सताती थी। वे राजा के प्रिय और हित में लगे हुए, सदा प्राणों का उत्सर्ग करने को तत्पर रहते थे।
॥ श्लोक २८-३० ॥
चत्वरेषु च मार्गेषु गृहेषु च वनेषु च ।
गुप्तयः सुविहितास्तत्र यथा देशं यथा बलम् ॥
न चौरा न च दस्यवः सन्ति तत्र कथंचन ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दुर्भिक्षसम्भवम् ॥
एवं सा नगरी रम्या दशरथेन पालिता ।
बभूव सुखिता नित्यं प्रजा धर्मेण शासिता ॥
📖 भावार्थ : चौराहों पर, मार्गों पर, घरों में और वनों में – सर्वत्र देश और बल के अनुसार सुरक्षा व्यवस्था सुनियोजित थी। वहाँ कहीं भी चोर या डाकू नहीं थे। न कोई घोर रोग का भय था, न अकाल का। इस प्रकार दशरथ द्वारा पालित वह रमणीय नगरी सुखित रहती थी और प्रजा धर्म से शासित होकर नित्य सुखी रहती थी।

🏥 जनकल्याण की योजनाएँ – भोजनालय, चिकित्सालय, विद्यालय (श्लोक ३१-३५)

॥ श्लोक ३१ ॥
सत्राणि विविधान्यासन्नन्नपानार्थमादरात् ।
यत्र यत्रार्थिनः केचित्तत्र तत्र प्रदीयते ॥ १-७-३१ ॥
📖 भावार्थ : विविध सत्र (भोजनालय) थे, जहाँ आदरपूर्वक अन्न-पान की व्यवस्था थी। जहाँ कहीं भी कोई अर्थी (याचक) आता, वहाँ उसे दिया जाता था।
॥ श्लोक ३२ ॥
चिकित्सकाश्च वैद्याश्च सुविहिताः सहस्रशः ।
रोगिणां पालनार्थाय नगरे जनपदे तथा ॥ १-७-३२ ॥
📖 भावार्थ : चिकित्सक और वैद्य हजारों की संख्या में सुनियोजित थे, रोगियों के पालन (उपचार) के लिए नगर में और जनपदों में भी।
॥ श्लोक ३३ ॥
पाठशालाश्च विविधा वेदविद्याविशारदाः ।
ब्राह्मणाः सुविहितास्तत्र यज्ञशीलाश्च सर्वदा ॥ १-७-३३ ॥
📖 भावार्थ : विविध पाठशालाएँ थीं, जहाँ वेद-विद्या के विशारद ब्राह्मण सुव्यवस्थित थे, जो सदा यज्ञशील भी थे।
॥ श्लोक ३४-३५ ॥
धर्मशालाः सुविहिताः पानीयशालास्तथैव च ।
वाप्यः कूपाश्च तडागाश्च पुष्करिण्यश्च सर्वशः ॥
एवं तस्य महाराज्ञः प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः ।
बभूवुर्विगतशोकाश्च नित्यं प्रमुदिताः सदा ॥
📖 भावार्थ : धर्मशालाएँ, पानी की शालाएँ (प्याऊ), बावड़ियाँ, कुएँ, तालाब और पुष्करिणियाँ सर्वत्र सुव्यवस्थित थीं। इस प्रकार उस महाराजा की सभी प्रजा सुखी, शोक-रहित और नित्य प्रसन्न रहती थी।
🔍 व्याख्या : जनकल्याण के ये सभी उपाय बताते हैं कि अयोध्या में न केवल भौतिक सुरक्षा थी, वरन् स्वास्थ्य, शिक्षा, धर्म और जल जैसी मूलभूत आवश्यकताओं की भी समुचित व्यवस्था थी।

🏗️ नगर की भौतिक संरचना – सड़कें, नालियाँ, जलापूर्ति (श्लोक ३६-४०)

॥ श्लोक ३६-३७ ॥
राजमार्गाः सुविहिताः समाः सुविमलाः शुभाः ।
नातिसंकीर्णविस्तीर्णाः सर्वर्तुकुसुमैः शुभैः ॥
प्रपाः पानीयसंयुक्ताः सर्वत्र सुविहिताः शुभाः ।
नद्यः सरांसि चैवापि पुष्करिण्यश्च सर्वशः ॥
📖 भावार्थ : राजमार्ग सुव्यवस्थित, समतल, अत्यन्त स्वच्छ, शुभ, न बहुत संकीर्ण और न बहुत विस्तीर्ण, सभी ऋतुओं के शुभ पुष्पों से युक्त थे। पानी से युक्त प्रपाएँ (प्याऊ) सर्वत्र सुव्यवस्थित थीं। नदियाँ, सरोवर और पुष्करिणियाँ भी सर्वत्र थीं।
॥ श्लोक ३८-३९ ॥
प्राकारः परिखा चैव तोरणानि तथैव च ।
अट्टालकाश्च विविधाः सर्वतः समलंकृताः ॥
एवं तां रमणीयां तु पुरीं दशरथो नृपः ।
अध्यावसत् सुखं राजन् प्रजाः पालयते सदा ॥
📖 भावार्थ : प्राचीर (परकोटा), परिखा (खाई), तोरण (द्वार) और विविध अट्टालिकाएँ (बुर्ज) सर्वत्र सुन्दर रूप से सजी हुई थीं। इस प्रकार उस रमणीय पुरी में राजा दशरथ सुखपूर्वक निवास करते थे और सदा प्रजा का पालन करते थे।
॥ श्लोक ४० ॥
एवं तस्य महाराज्ञः प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः ।
बभूवुर्विगतशोकाश्च नित्यं प्रमुदिताः सदा ॥ १-७-४० ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार उस महाराजा की सभी प्रजा सुखी, शोक-रहित और नित्य प्रसन्न रहती थी।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक यह निष्कर्ष देता है कि उत्तम प्रशासन का अन्तिम लक्ष्य प्रजा का सुख है। अयोध्या का प्रशासन इस आदर्श पर खरा उतरता था।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

🏛️ प्राचीन भारतीय प्रशासन का आदर्श

यह सर्ग प्राचीन भारत की प्रशासनिक व्यवस्था का एक जीवन्त दस्तावेज है। विभिन्न विभागों में अधिकारियों की नियुक्ति, उनके कर्तव्यों का निर्धारण, और उनके बीच समन्वय – यह सब अत्यन्त विकसित प्रशासनिक चेतना को दर्शाता है।

⚖️ न्याय प्रणाली की निष्पक्षता

राजा स्वयं प्रतिदिन प्रजा के मामले सुनते थे, किन्तु उनके अतिरिक्त धर्माध्यक्ष और सभासद भी न्याय के लिए नियुक्त थे। धर्मशास्त्र के अनुसार निर्णय देना, और उसमें किसी प्रकार के दम्भ-मत्सर का न होना – यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता का सूचक है।

💰 कर व्यवस्था का संतुलन

"नात्यर्थं संगृहीतव्यं नात्यर्थं परिवर्जितम्" – न तो अत्यधिक कर लेना चाहिए, न ही बिल्कुल नहीं लेना चाहिए। यह आदर्श कर नीति का सिद्धांत आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कर का उपयोग जनकल्याण और राज्य की सुरक्षा में होता था।

🏥 समाज कल्याण की व्यापकता

मुफ्त भोजनालय, चिकित्सालय, विद्यालय, धर्मशालाएँ, प्याऊ, कुएँ, तालाब – ये सभी जनकल्याण के साधन थे। यह दर्शाता है कि राज्य का कर्तव्य केवल कर संग्रह और सुरक्षा तक सीमित नहीं था, वरन् प्रजा के जीवन स्तर को ऊपर उठाना भी था।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि एक आदर्श राज्य के लिए आवश्यक है – सुनियोजित प्रशासनिक ढाँचा, निष्पक्ष न्याय प्रणाली, संतुलित कर नीति, चुस्त सुरक्षा व्यवस्था और व्यापक जनकल्याण की योजनाएँ। ये सभी तत्व मिलकर ही प्रजा को सुखी और समृद्ध बनाते हैं। अयोध्या का यह प्रशासनिक मॉडल आज भी हमारे लिए अनुकरणीय है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

इस अध्याय के लोकप्रिय श्लोक

श्लोक 31

234

पुत्रकामो नरपतिः पुत्रीयामिष्टिमैजयत्। ऋत्विग्भिर्ब्रह्मविद्भिश्च यथावद्भिरलङ्कृतः॥…

“पुत्र की कामना वाले राजा ने पुत्रीया नामक इष्टि (यज्ञ) का अनुष्ठान कराया, जो यथा…”

पूरा पढ़ें

श्लोक 20

85

एतैरमात्यैः सहितो धर्मज्ञैरात्मसम्मितैः। स राजा पृथिवीं पाल्य सुखमासीदरिंदमः॥…

“इन धर्मज्ञ और अपने समान (योग्य) मंत्रियों से सहित वह राजा (दशरथ) शत्रुओं का दमन …”

पूरा पढ़ें

श्लोक 21

69

चारैश्च परमोदारैः समन्तादन्ववेक्षिता। धर्मेण पालयामास प्रजाः परमया मुदा॥…

“उदार चरों (जासूसों) से सब ओर से देखी जाने वाली प्रजा को धर्मपूर्वक परम प्रसन्नता…”

पूरा पढ़ें

श्लोक 22

67

त्रिषु लोकेषु विख्यातस्तेजसा च बलेन च। उदारः सर्वभूतानां दशरथो महीपतिः॥…

“तीनों लोकों में तेज और बल से विख्यात, सब प्राणियों के प्रति उदार, दशरथ महीपति थे…”

पूरा पढ़ें

श्लोक 27

64

सीमापि विवदन्ते न न च व्याला विकुर्वते। न चापि म्रियते बालो न दम्पतिविरोधनम्॥…

“सीमा को लेकर लोग झगड़ा नहीं करते थे, न ही हिंसक पशु उपद्रव करते थे, न ही बालक मर…”

पूरा पढ़ें

अध्याय के श्लोक

श्लोक 1

पूरा पढ़ें
तस्यामात्या गुणैरासन्निक्ष्वाकोः सुमहात्मनः। मन्त्रज्ञाश्चेङ्गितज्ञाश्च नित्यं प्रियहिते रताः॥
हिंदी अर्थ: उस महात्मा इक्ष्वाकुवंशी राजा दशरथ के मंत्री गुणों से युक्त थे। वे मंत्रज्ञ (मंत्रों के ज्ञाता) और इंगितज्ञ (संकेतों को समझने वाले) थे तथा सदा राजा के प्रिय और हित में रत रहते थे।
यह श्लोक राजा दशरथ के मंत्रियों के आदर्श गुणों का वर्णन करता है। वे गुणवान, नीति के ज्ञाता, मर्मज्ञ और सदा राजा के हित में तत्पर थे।

श्लोक 2

पूरा पढ़ें
अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विनः। शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः॥
हिंदी अर्थ: उस वीर राजा (दशरथ) के आठ यशस्वी मंत्री थे। वे पवित्र (शुचि) थे और राज्य के कार्यों में सदा अनुरक्त (लगे हुए) थे।
यह श्लोक राजा दशरथ के आठ मंत्रियों की संख्या और उनके पवित्रता एवं कर्तव्यनिष्ठा के गुणों का उल्लेख करता है।

श्लोक 3

पूरा पढ़ें
धृष्टिर्जयन्तो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः। अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमोऽर्थवित्॥
हिंदी अर्थ: धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र – ये आठ मंत्री थे। सुमन्त्र आठवें थे और अर्थवित् (अर्थशास्त्र के ज्ञाता) थे।
इस श्लोक में राजा दशरथ के आठ मंत्रियों के नाम दिए गए हैं। इनमें सुमन्त्र को आठवाँ और अर्थशास्त्र का ज्ञाता बताया गया है।

श्लोक 4

पूरा पढ़ें
ऋत्विजौ द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ। वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणश्च तथापरे॥
हिंदी अर्थ: उस राजा के दो अभिमत (प्रिय) ऋत्विज् (पुरोहित) थे, जो ऋषिश्रेष्ठ थे – वसिष्ठ और वामदेव। तथा अन्य मंत्री भी थे।
इस श्लोक में राजा दशरथ के दो प्रधान पुरोहितों – वसिष्ठ और वामदेव – का उल्लेख है, जो महान ऋषि थे। साथ ही अन्य मंत्रियों का भी संकेत है।

श्लोक 5

पूरा पढ़ें
सुयज्ञोऽप्यथ जाबालिः काश्यपोऽप्यथ गौतमः। मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विजः॥
हिंदी अर्थ: सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, मार्कण्डेय, दीर्घायु, और कात्यायन – ये सभी द्विज (ब्राह्मण) थे।
इस श्लोक में कुछ अन्य ब्राह्मण विद्वानों के नाम दिए गए हैं, जो राजसभा में हो सकते हैं या राजा के सलाहकार थे।

श्लोक 6

पूरा पढ़ें
एतैर्ब्रह्मर्षिभिर्नित्यमृत्विजस्तस्य पौर्वकाः। विद्याविनीता हीमन्तः कुशला नियतेन्द्रियाः॥
हिंदी अर्थ: इन ब्रह्मर्षियों के द्वारा उसके (राजा के) पौर्वक (पुराने) ऋत्विज (पुरोहित) नित्य ही विद्याविनीत, हिमंत (हिमवत? या हीमन्त: संभवतः हीमान् = उत्साही?), कुशल और नियतेन्द्रिय (जितेन्द्रिय) थे।
यह श्लोक राजा दशरथ के पुरोहितों के गुणों का वर्णन करता है। वे विद्वान, विनीत, उत्साही, कुशल और जितेन्द्रिय थे।

श्लोक 7

पूरा पढ़ें
श्रीमन्तश्च महात्मानः शस्त्रज्ञा दृढविक्रमाः। कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिणः॥
हिंदी अर्थ: वे श्रीमान (तेजस्वी), महात्मा, शस्त्रज्ञ, दृढ़विक्रम (दृढ़ पराक्रमी), कीर्तिमान, प्रणिहित (तत्पर) और यथावचनकारी (आज्ञा का पालन करने वाले) थे।
इस श्लोक में मंत्रियों एवं पुरोहितों के और भी गुण बताए गए हैं – वे तेजस्वी, महान, शस्त्रविद्या में निपुण, दृढ़ पराक्रमी, यशस्वी, तत्पर और आज्ञाकारी थे।

श्लोक 8

पूरा पढ़ें
तेजःक्षमायशःप्राप्ताः स्मितपूर्वाभिभाषिणः। क्रोधात् कामार्थहेतोर्वा न ब्रूयुरनृतं वचः॥
हिंदी अर्थ: वे तेज, क्षमा और यश से युक्त थे, स्मितपूर्वक बात करने वाले थे। क्रोध, काम, अर्थ या किसी अन्य कारण से भी वे असत्य नहीं बोलते थे।
इस श्लोक में मंत्रियों के सत्यवादिता और सौम्य व्यवहार का वर्णन है। वे किसी भी परिस्थिति में झूठ नहीं बोलते थे और मुस्कुराकर बात करते थे।

श्लोक 9

पूरा पढ़ें
तेषामविदितं किंचित् स्वेषु नास्ति परेषु वा। क्रियमाणं कृतं वापि चारेणापि चिकीर्षितम्॥
हिंदी अर्थ: उन (मंत्रियों) के लिए अपने या पराए राज्यों में कोई भी कार्य अज्ञात नहीं था – जो किया जा रहा हो, जो किया जा चुका हो, या जो गुप्तचरों द्वारा किया जाने वाला हो।
इस श्लोक में मंत्रियों की सर्वज्ञता और गुप्तचर व्यवस्था की दक्षता का वर्णन है। उन्हें अपने राज्य और शत्रु राज्यों की हर गतिविधि की जानकारी थी।

श्लोक 10

पूरा पढ़ें
कुशला व्यवहारेषु सौहृदेषु परीक्षिताः। प्राप्तकालं यथा दण्डं धारयेयुः सुतेष्वपि॥
हिंदी अर्थ: वे व्यवहार (नीति) में कुशल थे, मित्रता में परखे हुए थे। वे उचित समय पर जैसा दंड देना चाहिए, वैसा दंड अपने पुत्रों पर भी धारण करते (लागू करते) थे।
इस श्लोक में मंत्रियों के न्यायप्रियता और निष्पक्षता का वर्णन है। वे व्यवहारकुशल और मित्रता में सच्चे थे। वे न्याय के अनुसार समय पर दंड देते थे, चाहे वह अपने पुत्रों पर ही क्यों न देना पड़े।

श्लोक 11

पूरा पढ़ें
कोशसङ्ग्रहणे युक्ता बलस्य च परिग्रहे। अहितं चापि पुरुषं न हिंस्युरविदूषकम्॥
हिंदी अर्थ: वे (मंत्री) कोष के संग्रहण में और सेना के परिग्रह (संचालन) में युक्त (कुशल) थे। तथा वे अहित (शत्रु) पुरुष को भी नहीं मारते थे, यदि वह दोषरहित (निरपराध) हो।
यह श्लोक राजा दशरथ के मंत्रियों की दो विशेषताएँ बताता है – वे राजकोष और सेना के प्रबंधन में कुशल थे, और वे किसी निरपराध शत्रु को भी दंड नहीं देते थे।

श्लोक 12

पूरा पढ़ें
वीराश्च नियतोत्साहा राजशास्त्रमनुष्ठिताः। शुचीनां रक्षितारश्च नित्यं विषयवासिनाम्॥
हिंदी अर्थ: वे (मंत्री) वीर थे, नियत उत्साह वाले थे, राजशास्त्र का पालन करने वाले थे, तथा सदा पवित्र लोगों की रक्षा करने वाले थे, जो जनपदों में निवास करते थे।
यह श्लोक मंत्रियों के वीरता, उत्साह, शासन पालन और प्रजा रक्षण के गुणों का वर्णन करता है।

श्लोक 13

पूरा पढ़ें
ब्रह्मक्षत्रमहिंसन्तस्ते कोशं समपूरयन्। सुतीक्ष्णदण्डाः सम्प्रेक्ष्य पुरुषस्य बलाबलम्॥
हिंदी अर्थ: वे ब्राह्मण और क्षत्रियों को न सताते हुए राजकोश को भरते थे। पुरुष के बल-अबल का विचार करके अत्यंत तीक्ष्ण दंड देने वाले थे।
यह श्लोक बताता है कि मंत्री कर वसूली में अहिंसक थे और दंड नीति में न्यायसंगत थे।

श्लोक 14

पूरा पढ़ें
शुचीनामेकबुद्धीनां सर्वेषां सम्प्रजानताम्। नासीत्पुरे वा राष्ट्रे वा मृषावादी नरः क्वचित्॥
हिंदी अर्थ: उन पवित्र, एकमत, सब कुछ जानने वाले (मंत्रियों) के रहते नगर में या राज्य में कहीं भी झूठ बोलने वाला मनुष्य नहीं था।
मंत्रियों की पवित्रता, एकता और ज्ञान के कारण राज्य में झूठ बोलने वाला कोई नहीं था।

श्लोक 15

पूरा पढ़ें
क्वचिन्न दुष्टस्तत्रासीत् परदाररतिर्नरः। प्रशान्तं सर्वमेवासीद् राष्ट्रं पुरवरं च तत्॥
हिंदी अर्थ: उस राज्य में कहीं भी दुष्ट या पराई स्त्री में रत मनुष्य नहीं था। वह राज्य और उत्तम नगर (अयोध्या) सर्वथा शांत था।
राज्य में दुष्ट और व्यभिचारी का अभाव था; सर्वत्र शांति थी।

श्लोक 16

पूरा पढ़ें
सुवाससः सुवेषाश्च ते च सर्वे शुचिव्रताः। हितार्थाश्च नरेन्द्रस्य जाग्रतो नयचक्षुषा॥
हिंदी अर्थ: वे सब सुन्दर वस्त्र धारण करने वाले, सुन्दर वेष वाले, पवित्र व्रतों का पालन करने वाले, राजा के हित में तत्पर और नीति-चक्षु से सजग रहने वाले थे।
मंत्रियों के व्यक्तित्व: सुवस्त्र, सुवेष, पवित्र व्रत, राजहित में तत्पर, नीतिज्ञ।

श्लोक 17

पूरा पढ़ें
गुरोर्गुणगृहीताश्च प्रख्याताश्च पराक्रमैः। विदेशेष्वपि विज्ञाताः सर्व एव मनीषिणः॥
हिंदी अर्थ: वे गुरु (मंत्री या आचार्य) से गुण ग्रहण करने वाले, पराक्रम से प्रसिद्ध, और विदेशों में भी जाने जाने वाले सभी बुद्धिमान थे।
मंत्री गुरु से गुण सीखने वाले, पराक्रमी, विदेशों में प्रसिद्ध और बुद्धिमान थे।

श्लोक 18

पूरा पढ़ें
सम्प्रेक्ष्य धर्मलाभाभ्यां धर्मेणैव द्विजोत्तमान्। पालयन्ति च पौरांश्च राजशास्त्रानुसारिणः॥
हिंदी अर्थ: वे धर्म और लाभ दोनों को देखते हुए, धर्म से ही द्विजोत्तमों (ब्राह्मणों) की रक्षा करते थे, और राजशास्त्र के अनुसार चलने वाले नगरवासियों की भी रक्षा करते थे।
मंत्री धर्म और अर्थ दोनों का ध्यान रखते हुए, धर्मपूर्वक ब्राह्मणों और नगरवासियों की रक्षा करते थे।

श्लोक 19

पूरा पढ़ें
मन्त्रगुप्तौ समर्थास्ते सूक्ष्मेष्वपि निदर्शनाः। विदिताश्चैव धर्मज्ञाः प्रियवादश्च सर्वदा॥
हिंदी अर्थ: वे मंत्रणा की गोपनीयता में समर्थ थे, सूक्ष्म विषयों में भी उदाहरण स्वरूप थे, धर्मज्ञ थे और सदा प्रिय वचन बोलने वाले थे।
मंत्री गोपनीयता रखने में सक्षम, सूक्ष्मज्ञ, धर्मज्ञ और मृदुभाषी थे।

श्लोक 20

पूरा पढ़ें
एतैरमात्यैः सहितो धर्मज्ञैरात्मसम्मितैः। स राजा पृथिवीं पाल्य सुखमासीदरिंदमः॥
हिंदी अर्थ: इन धर्मज्ञ और अपने समान (योग्य) मंत्रियों से सहित वह राजा (दशरथ) शत्रुओं का दमन करने वाला, पृथ्वी का पालन करके सुखपूर्वक रहता था।
ऐसे योग्य मंत्रियों के साथ राजा दशरथ ने पृथ्वी का पालन किया और सुखपूर्वक रहे।