अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

वीराश्च नियतोत्साहा राजशास्त्रमनुष्ठिताः। शुचीनां रक्षितारश्च नित्यं विषयवासिनाम्॥

हिंदी अनुवाद

वे (मंत्री) वीर थे, नियत उत्साह वाले थे, राजशास्त्र का पालन करने वाले थे, तथा सदा पवित्र लोगों की रक्षा करने वाले थे, जो जनपदों में निवास करते थे।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक मंत्रियों के वीरता, उत्साह, शासन पालन और प्रजा रक्षण के गुणों का वर्णन करता है।

टिप्पणी

यह श्लोक अयोध्या के प्रशासन में मंत्रियों की भूमिका को दर्शाता है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक १२ ॥

वीराश्च नियतोत्साहा राजशास्त्रमनुष्ठिताः।
शुचीनां रक्षितारश्च नित्यं विषयवासिनाम्॥
vīrāśca niyatotsāhā rājaśāstramanuṣṭhitāḥ |
śucīnāṃ rakṣitāraśca nityaṃ viṣayavāsinām ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : वे (मंत्री) वीर थे, नियत उत्साह वाले थे, राजशास्त्र का पालन करने वाले थे, तथा सदा पवित्र लोगों की रक्षा करने वाले थे, जो जनपदों में निवास करते थे।

🔹 English Translation : They (the ministers) were valiant, constantly enthusiastic, followed the royal edicts, and always protected the pure-hearted people residing in the provinces.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
वीराःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनवीर पुरुष
अव्ययऔर
नियतोत्साहाःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (नियत + उत्साह)स्थिर उत्साह वाले
राजशास्त्रम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (राज + शास्त्र)राजा के शासन (नीति) को
अनुष्ठिताःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनपालन करने वाले
शुचीनाम्विशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचनपवित्र (निष्पाप) लोगों के
रक्षितारःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनरक्षक
अव्ययऔर
नित्यम्अव्ययसदा, हमेशा
विषयवासिनाम्विशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचन (विषय + वासिन्)प्रदेशों (जनपदों) में रहने वालों के

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक अयोध्या के प्रशासन में मंत्रियों (अमात्यों) के आदर्श गुणों का वर्णन करता है। राजा दशरथ के मंत्री न केवल वीर थे, बल्कि उनमें निरंतर उत्साह और कर्तव्यपरायणता भी थी। वे राजशास्त्र (राज्य की नीतियों) का कठोरता से पालन करते थे और पवित्र जीवन जीने वाली प्रजा की रक्षा करते थे। यहाँ "शुचीनाम्" शब्द से तात्पर्य उन लोगों से है जो धर्मपरायण और सत्यनिष्ठ थे। इससे पता चलता है कि प्रशासन का झुकाव सज्जनों के संरक्षण की ओर था। "विषयवासिनाम्" का अर्थ है जनपदों में रहने वाले सामान्य नागरिक। इस प्रकार मंत्रीगण नगर और ग्राम सभी क्षेत्रों की देखभाल करते थे।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि एक कुशल प्रशासक में वीरता, उत्साह, नीति-निष्ठा और जनसेवा की भावना होनी चाहिए। महर्षि वाल्मीकि ने यहाँ आदर्श शासन का चित्रण किया है, जहाँ अधिकारीगण जनता के हितैषी और रक्षक होते हैं।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

इस श्लोक में अनुष्टुप् छंद का प्रयोग हुआ है। "वीराश्च" में "वीराः + च" का संधि है (विसर्ग लोप और "श्" का आगम)। "नियतोत्साहाः" में "नियत + उत्साह" का दीर्घ संधि। "राजशास्त्रम्" में "राज + शास्त्र" का सवर्णदीर्घ। "अनुष्ठिताः" भूतकालिक कृदंत है, जो पालन करने के भाव को दर्शाता है। "शुचीनाम्" षष्ठी बहुवचन रूप है, जिसका संबंध "रक्षितारः" से है। यहाँ बहुवचन का प्रयोग मंत्रियों के समूह के लिए है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक हमें बताता है कि जो लोग समाज की सेवा में लगे हैं, उन्हें सदा उत्साही और धर्मनिष्ठ रहना चाहिए। पवित्र आत्माओं की रक्षा करना उनका कर्तव्य है। यही धर्म की स्थापना का मार्ग है। राजा के मंत्री उसके सहायक होते हैं और उनके गुण ही राज्य की समृद्धि के आधार होते हैं।

॥ आदर्श प्रशासन के लक्षण: वीरता, उत्साह, नीति-पालन, प्रजा-रक्षण ॥

जय श्री राम 🙏