अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मक्षत्रमहिंसन्तस्ते कोशं समपूरयन्। सुतीक्ष्णदण्डाः सम्प्रेक्ष्य पुरुषस्य बलाबलम्॥

हिंदी अनुवाद

वे ब्राह्मण और क्षत्रियों को न सताते हुए राजकोश को भरते थे। पुरुष के बल-अबल का विचार करके अत्यंत तीक्ष्ण दंड देने वाले थे।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक बताता है कि मंत्री कर वसूली में अहिंसक थे और दंड नीति में न्यायसंगत थे।

टिप्पणी

यह श्लोक राज्य की आर्थिक और न्यायिक नीति का वर्णन करता है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक १३ ॥

ब्रह्मक्षत्रमहिंसन्तस्ते कोशं समपूरयन्।
सुतीक्ष्णदण्डाः सम्प्रेक्ष्य पुरुषस्य बलाबलम्॥
brahmakṣatramahiṃsantas te kośaṃ samapūrayan |
sutīkṣṇadaṇḍāḥ samprekṣya puruṣasya balābalam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : वे ब्राह्मण और क्षत्रियों को न सताते हुए राजकोश को भरते थे। पुरुष के बल-अबल का विचार करके अत्यंत तीक्ष्ण दंड देने वाले थे।

🔹 English Translation : They filled the treasury without oppressing the Brahmins and Kshatriyas. They administered very severe punishment after assessing the strength and weakness of a person.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
ब्रह्मक्षत्रम्द्वन्द्व समास, द्वितीया एकवचनब्राह्मण और क्षत्रियों को
अहिंसन्तःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनन सताते हुए, अहिंसा करते हुए
तेसर्वनाम, प्रथमा बहुवचनवे (मंत्री)
कोशम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनराजकोश को
समपूरयन्क्रिया, लङ् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचनभरते थे
सुतीक्ष्णदण्डाःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनअत्यंत तीक्ष्ण दंड देने वाले
सम्प्रेक्ष्यल्यबंत अव्ययदेखकर, विचार करके
पुरुषस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचनपुरुष के, व्यक्ति के
बलाबलम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनबल और अबल (शक्ति और कमजोरी)

📜 व्याख्या

यह श्लोक अयोध्या के मंत्रियों की कर नीति और दंड नीति पर प्रकाश डालता है। वे कर वसूली में ब्राह्मणों और क्षत्रियों पर अत्याचार नहीं करते थे, फिर भी राजकोश भरा रहता था। यह सूचित करता है कि कर उचित और संतुलित था। साथ ही, दंड देते समय वे अपराधी की शक्ति और परिस्थितियों का मूल्यांकन करते थे और तदनुसार कठोर दंड देते थे। "सुतीक्ष्णदण्डाः" का अर्थ है कि वे दंड देने में कठोर थे, परंतु "सम्प्रेक्ष्य बलाबलम्" से न्यायपूर्णता भी झलकती है। यही आदर्श शासन का लक्षण है: कर प्रजा पर बोझ नहीं, और दंड अपराध के अनुरूप।

📖 साहित्यिक विशेष

"ब्रह्मक्षत्रम्" द्वन्द्व समास का उदाहरण है। "अहिंसन्तः" वर्तमान कृदंत, "समपूरयन्" लङ् लकार, "सुतीक्ष्णदण्डाः" बहुव्रीहि समास।

॥ न्यायपूर्ण कर और दंड ही राज्य की सफलता की कुंजी है ॥

जय श्री राम 🙏