अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

कोशसङ्ग्रहणे युक्ता बलस्य च परिग्रहे। अहितं चापि पुरुषं न हिंस्युरविदूषकम्॥

हिंदी अनुवाद

वे (मंत्री) कोष के संग्रहण में और सेना के परिग्रह (संचालन) में युक्त (कुशल) थे। तथा वे अहित (शत्रु) पुरुष को भी नहीं मारते थे, यदि वह दोषरहित (निरपराध) हो।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक राजा दशरथ के मंत्रियों की दो विशेषताएँ बताता है – वे राजकोष और सेना के प्रबंधन में कुशल थे, और वे किसी निरपराध शत्रु को भी दंड नहीं देते थे।

टिप्पणी

प्राचीन भारतीय राजनीति में कोष और सेना राज्य के दो महत्वपूर्ण अंग थे। इनके सुचारु प्रबंधन की जिम्मेदारी मंत्रियों पर थी। साथ ही, युद्धनीति में भी धर्म का पालन करते हुए निरपराध शत्रु को क्षमा करना उनका कर्तव्य था।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक ११ ॥

कोशसङ्ग्रहणे युक्ता बलस्य च परिग्रहे। अहितं चापि पुरुषं न हिंस्युरविदूषकम्॥
kośasaṅgrahaṇe yuktā balasya ca parigrahe | ahitaṃ cāpi puruṣaṃ na hiṃsyuravidūṣakam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : वे (मंत्री) कोष के संग्रहण में और सेना के परिग्रह (संचालन) में युक्त (कुशल) थे। तथा वे अहित (शत्रु) पुरुष को भी नहीं मारते थे, यदि वह दोषरहित (निरपराध) हो।

🔹 English Translation : They (the ministers) were skilled in accumulating the treasury and in maintaining the army. And they would not kill even an inimical person if he was without fault (innocent).

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
कोशसङ्ग्रहणेपुल्लिंग, सप्तमी एकवचन (कोश + सङ्ग्रहण)कोष के संग्रह करने में
युक्ताःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (युक्त)लगे हुए, कुशल, निपुण
बलस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचन (बल)सेना के
अव्ययऔर
परिग्रहेपुल्लिंग, सप्तमी एकवचन (परिग्रह)परिग्रह में (संचालन, रख-रखाव, प्रबंधन)
अहितम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (अहित)अहितकारी, शत्रु, विरोधी
अव्ययऔर
अपिअव्ययभी
पुरुषम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (पुरुष)पुरुष को, व्यक्ति को
अव्ययनहीं
हिंस्युःहिस् धातु (हिंसा), विधिलिङ्, प्रथमपुरुष बहुवचनमारें, हत्या करें
अविदूषकम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (अविदूषक)जो दूषित न हो, दोषरहित, निरपराध

📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या

ग्यारहवें श्लोक में राजा दशरथ के मंत्रियों के दो महत्वपूर्ण गुणों का वर्णन है – प्रशासनिक कुशलता और युद्धनीति में धर्म का पालन।

पहले भाग में कहा गया है कि वे 'कोशसङ्ग्रहणे' (कोष के संग्रहण) और 'बलस्य परिग्रहे' (सेना के संचालन) में 'युक्ताः' (कुशल) थे। प्राचीन भारतीय राजनीति में राज्य के सात अंग होते थे – स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड (सेना), और मित्र। इनमें कोष और सेना (दण्ड) अत्यंत महत्वपूर्ण थे। कोष के बिना राज्य का संचालन असंभव था, और सेना के बिना राज्य की रक्षा असंभव थी। दशरथ के मंत्री इन दोनों के प्रबंधन में निपुण थे। 'कोशसङ्ग्रहण' का अर्थ केवल कर एकत्र करना नहीं, बल्कि उचित तरीके से राजस्व का संग्रह, उसका संरक्षण और आवश्यकता के अनुसार व्यय करना भी था। 'बलस्य परिग्रह' का अर्थ सेना की भर्ती, उसका प्रशिक्षण, उसके आयुध-सामग्री की व्यवस्था, और उसका नेतृत्व करना था।

दूसरे भाग में एक नैतिक सिद्धांत बताया गया है – 'अहितं चापि पुरुषं न हिंस्युरविदूषकम्' – वे किसी अहितकारी (शत्रु) व्यक्ति को भी नहीं मारते थे, यदि वह 'अविदूषक' (निरपराध, दोषरहित) हो। यह धर्मयुद्ध की अवधारणा को दर्शाता है। प्राचीन भारत में युद्ध के नियम थे – निहत्थे, पलायन करते, या शरण में आए शत्रु को नहीं मारना चाहिए। यहाँ यह भी जोड़ा गया है कि यदि शत्रु ने कोई अपराध नहीं किया है (अर्थात् वह केवल विरोधी है, परंतु दुष्ट नहीं), तो उसे मृत्युदंड नहीं देना चाहिए। यह मंत्रियों की धर्मपरायणता और न्यायप्रियता को दर्शाता है।

इस प्रकार मंत्री केवल कुशल प्रशासक ही नहीं, बल्कि धर्म के पालनकर्ता भी थे। वे राज्य के हित और धर्म के बीच संतुलन बनाए रखते थे।

📚 व्याकरणिक एवं साहित्यिक पक्ष

'कोशसङ्ग्रहणे' में कोश और सङ्ग्रहण का तत्पुरुष समास है, सप्तमी एकवचन। 'बलस्य परिग्रहे' में षष्ठी और सप्तमी। 'युक्ताः' भूतकालिक कृदंत है, जो कुशलता या तत्परता को दर्शाता है। 'हिंस्युः' विधिलिङ् का रूप है (हिस् धातु, कर्तरि प्रयोग), जिसका अर्थ है 'वे हिंसा न करें'। यह उनके स्वभाव का वर्णन करता है। 'अविदूषकम्' में 'अ' निषेध उपसर्ग और विदूषक (दोषी) – निरपराध।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

इस श्लोक का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि हमें अपने भौतिक कर्तव्यों (कोष और बल के समान) में कुशल होना चाहिए, लेकिन साथ ही नैतिकता का पालन भी करना चाहिए। हमें किसी भी प्राणी की अकारण हिंसा नहीं करनी चाहिए, चाहे वह हमारा विरोधी ही क्यों न हो। यह अहिंसा और करुणा का सिद्धांत है।

✨ विशेष तथ्य: यह श्लोक प्राचीन भारतीय राजनीति के उच्च आदर्शों को दर्शाता है। युद्ध में भी धर्म का पालन किया जाता था। यही कारण था कि रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में धर्मयुद्ध की अवधारणा मिलती है। आज भी युद्ध के अंतर्राष्ट्रीय नियमों (जिनेवा कन्वेंशन) में निरपराध नागरिकों और युद्धबंदियों की रक्षा का प्रावधान है, जो इस प्राचीन भारतीय सिद्धांत से मेल खाता है।

॥ धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ॥

जय श्री राम 🙏