अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

कुशला व्यवहारेषु सौहृदेषु परीक्षिताः। प्राप्तकालं यथा दण्डं धारयेयुः सुतेष्वपि॥

हिंदी अनुवाद

वे व्यवहार (नीति) में कुशल थे, मित्रता में परखे हुए थे। वे उचित समय पर जैसा दंड देना चाहिए, वैसा दंड अपने पुत्रों पर भी धारण करते (लागू करते) थे।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में मंत्रियों के न्यायप्रियता और निष्पक्षता का वर्णन है। वे व्यवहारकुशल और मित्रता में सच्चे थे। वे न्याय के अनुसार समय पर दंड देते थे, चाहे वह अपने पुत्रों पर ही क्यों न देना पड़े।

टिप्पणी

यह गुण अत्यंत महत्वपूर्ण है – न्याय में पक्षपात न करना। मंत्री अपने पुत्रों पर भी उचित दंड लागू करते थे, यह उनकी निष्पक्षता और कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक १० ॥

कुशला व्यवहारेषु सौहृदेषु परीक्षिताः। प्राप्तकालं यथा दण्डं धारयेयुः सुतेष्वपि॥
kuśalā vyavahāreṣu sauhṛdeṣu parīkṣitāḥ | prāptakālaṃ yathā daṇḍaṃ dhārayeyuḥ suteṣvapi ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : वे व्यवहार (नीति) में कुशल थे, मित्रता में परखे हुए थे। वे उचित समय पर जैसा दंड देना चाहिए, वैसा दंड अपने पुत्रों पर भी धारण करते (लागू करते) थे।

🔹 English Translation : They were skilled in conduct (policy), tested in friendship. They would inflict appropriate punishment even on their own sons at the proper time.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
कुशलाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (कुशल)कुशल, निपुण
व्यवहारेषुपुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन (व्यवहार)व्यवहारों में, नीतियों में
सौहृदेषुनपुंसकलिंग, सप्तमी बहुवचन (सौहृद)मित्रता में, सद्भाव में
परीक्षिताःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (परीक्षित)परीक्षित, परखे हुए
प्राप्तकालम्अव्यय (प्राप्त + काल)उचित समय पर, प्राप्त काल के अनुसार
यथाअव्ययजैसे, यथोचित
दण्डम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (दण्ड)दंड को
धारयेयुःचुरादि, धारि धातु, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष बहुवचनधारण करें, लागू करें
सुतेषुपुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन (सुत)पुत्रों पर
अपिअव्ययभी

📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या

दसवें श्लोक में मंत्रियों के दो प्रमुख गुण बताए गए हैं – व्यवहार कुशलता और निष्पक्ष न्याय। वे 'व्यवहारेषु कुशलाः' थे, अर्थात् राजकाज के व्यवहार, नीति और प्रशासन में निपुण थे। वे 'सौहृदेषु परीक्षिताः' थे, अर्थात् मित्रता और सद्भाव में उनकी परीक्षा हो चुकी थी; वे सच्चे मित्र थे, छल-कपट रहित थे।

सबसे महत्वपूर्ण गुण यह है कि वे न्याय के मामले में निष्पक्ष थे। 'प्राप्तकालं यथा दण्डं धारयेयुः सुतेष्वपि' – उचित समय आने पर वे अपने पुत्रों पर भी वैसा ही दंड लागू करते थे जैसा कि नियमानुसार दिया जाना चाहिए। यह उनकी निष्पक्षता और कर्तव्यपरायणता को दर्शाता है। उनमें पक्षपात या मोह नहीं था।

यह गुण प्रशासन के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि शासक या न्यायाधीश अपने संबंधियों के प्रति नरमी बरतेंगे, तो न्याय व्यवस्था कमजोर होगी। यहाँ बताया गया है कि दशरथ के मंत्री इस मामले में अडिग थे।

📚 व्याकरणिक पक्ष

'प्राप्तकालम्' अव्यय है, 'यथा' के साथ इसका अर्थ 'यथाकाल' है। 'धारयेयुः' विधिलिङ् का रूप है, जिसका अर्थ है 'वे धारण करें' (चाहिए या संभावना)। यहाँ यह बताता है कि उनका यह स्वभाव था।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

इस श्लोक का संदेश है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन निष्पक्ष भाव से करना चाहिए, चाहे उसका प्रभाव हमारे अपनों पर ही क्यों न पड़े। न्याय और धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को मोह-माया से ऊपर उठना होता है।

✨ विशेष: यह श्लोक रामायण के मूल संदेश को भी दोहराता है – धर्म की स्थापना के लिए व्यक्तिगत स्वार्थों का त्याग आवश्यक है। राम ने भी पिता के वचन के लिए राज्य त्याग दिया, जो इसी निष्पक्षता और धर्मपरायणता का उदाहरण है।
॥ जय श्री राम ॥