अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

तेषामविदितं किंचित् स्वेषु नास्ति परेषु वा। क्रियमाणं कृतं वापि चारेणापि चिकीर्षितम्॥

हिंदी अनुवाद

उन (मंत्रियों) के लिए अपने या पराए राज्यों में कोई भी कार्य अज्ञात नहीं था – जो किया जा रहा हो, जो किया जा चुका हो, या जो गुप्तचरों द्वारा किया जाने वाला हो।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में मंत्रियों की सर्वज्ञता और गुप्तचर व्यवस्था की दक्षता का वर्णन है। उन्हें अपने राज्य और शत्रु राज्यों की हर गतिविधि की जानकारी थी।

टिप्पणी

प्राचीन भारतीय राजनीति में गुप्तचरों का बड़ा महत्व था। यह श्लोक बताता है कि दशरथ के मंत्री अपने और पराए राज्यों में होने वाली प्रत्येक घटना से अवगत रहते थे – चाहे वह वर्तमान हो, भूतकालीन हो या भविष्य की योजना हो।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक ९ ॥

तेषामविदितं किंचित् स्वेषु नास्ति परेषु वा। क्रियमाणं कृतं वापि चारेणापि चिकीर्षितम्॥
teṣāmaviditaṃ kiṃcit sveṣu nāsti pareṣu vā | kriyamāṇaṃ kṛtaṃ vāpi cāreṇāpi cikīrṣitam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उन (मंत्रियों) के लिए अपने या पराए राज्यों में कोई भी कार्य अज्ञात नहीं था – जो किया जा रहा हो, जो किया जा चुका हो, या जो गुप्तचरों द्वारा किया जाने वाला हो।

🔹 English Translation : Nothing was unknown to them (the ministers) in their own or in foreign kingdoms – whether it was being done, had been done, or was intended to be done by spies.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
तेषाम्पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचन (तत्)उनके (मंत्रियों के)
अविदितम्नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन (अविदित)अज्ञात
किंचित्अव्ययकुछ भी
स्वेषुपुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन (स्व)अपने (राज्यों) में
नास्तिअस्ति का निषेध रूपनहीं है
परेषुपुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन (पर)दूसरों (राज्यों) में
वाअव्ययया
क्रियमाणम्नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन (कृ धातु, कर्मणि वर्तमान कृदंत)किया जा रहा है (वर्तमान)
कृतम्नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन (कृ धातु, भूत कृदंत)किया हुआ (भूत)
वाअव्ययया
अपिअव्ययभी
चारेणपुल्लिंग, तृतीया एकवचन (चार)गुप्तचर के द्वारा
अपिअव्ययभी
चिकीर्षितम्नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन (चिकीर्षा से, करने की इच्छा)करने की इच्छा रखा गया, योजना बनाई गई

📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या

नौवें श्लोक में राजा दशरथ के मंत्रियों की अद्भुत जानकारी और गुप्तचर तंत्र की कुशलता का वर्णन है। उनके लिए अपने राज्य या शत्रु राज्यों में कोई भी बात अज्ञात नहीं थी। वे हर उस कार्य को जानते थे जो वर्तमान में हो रहा है, जो अतीत में हो चुका है, और जो भविष्य में गुप्तचरों द्वारा किए जाने की योजना है।

प्राचीन भारतीय राजनीति (जैसे कौटिल्य अर्थशास्त्र) में गुप्तचरों का अत्यधिक महत्व था। राजा अपने गुप्तचरों के माध्यम से देश-विदेश की गतिविधियों पर नज़र रखता था। यहाँ बताया गया है कि दशरथ के मंत्री इस कार्य में इतने दक्ष थे कि उनसे कुछ भी छिपा नहीं रहता था।

'चारेणापि चिकीर्षितम्' – अर्थात् गुप्तचरों द्वारा जो कुछ भी करने की इच्छा या योजना बनाई जाती थी, वह भी उन्हें ज्ञात हो जाता था। इससे पता चलता है कि उनकी खुफिया तंत्र अत्यंत प्रभावी थी और वे शत्रुओं की हर चाल को पहले ही भाँप लेते थे।

यह गुण एक सशक्त और सुरक्षित राज्य के लिए आवश्यक है। इसी कारण अयोध्या में कोई आकस्मिक संकट नहीं आता था, क्योंकि मंत्री हर स्थिति के लिए तैयार रहते थे।

📚 व्याकरणिक पक्ष

'क्रियमाणम्' कर्मणि वर्तमान कृदंत (लट्) है, 'कृतम्' कर्मणि भूत कृदंत (क्त) है, और 'चिकीर्षितम्' सन्नंत धातु से कर्मणि भूत कृदंत (क्त) है। 'चारेण' तृतीया का प्रयोग करण कारक में है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

इस श्लोक का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि एक योगी को भी अपने अंतःकरण की वृत्तियों के प्रति सजग रहना चाहिए। उसे अपने मन के भीतर चल रहे विचारों (क्रियमाण), संस्कारों (कृत) और भविष्य की वासनाओं (चिकीर्षित) का ज्ञान होना चाहिए।

✨ विशेष: यह श्लोक बताता है कि दशरथ के मंत्री केवल नीतिज्ञ ही नहीं, बल्कि कुशल खुफिया अधिकारी भी थे। उनकी सतर्कता और जानकारी के कारण ही अयोध्या में शांति और सुरक्षा बनी रहती थी।
॥ जय श्री राम ॥