अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
तेजःक्षमायशःप्राप्ताः स्मितपूर्वाभिभाषिणः। क्रोधात् कामार्थहेतोर्वा न ब्रूयुरनृतं वचः॥
हिंदी अनुवाद
वे तेज, क्षमा और यश से युक्त थे, स्मितपूर्वक बात करने वाले थे। क्रोध, काम, अर्थ या किसी अन्य कारण से भी वे असत्य नहीं बोलते थे।
अर्थ / व्याख्या
इस श्लोक में मंत्रियों के सत्यवादिता और सौम्य व्यवहार का वर्णन है। वे किसी भी परिस्थिति में झूठ नहीं बोलते थे और मुस्कुराकर बात करते थे।
टिप्पणी
यह श्लोक मंत्रियों के उच्च नैतिक चरित्र को उजागर करता है। वे तेजस्वी, क्षमाशील, यशस्वी थे और सदा मुस्कुराकर बोलते थे। उनके वचन में सत्यता थी, चाहे कितना भी क्रोध, काम या लाभ का प्रलोभन क्यों न हो।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक ८ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : वे तेज, क्षमा और यश से युक्त थे, स्मितपूर्वक बात करने वाले थे। क्रोध, काम, अर्थ या किसी अन्य कारण से भी वे असत्य नहीं बोलते थे।
🔹 English Translation : They were endowed with brilliance, forgiveness, and fame; they spoke with a smile. They would not utter an untruth due to anger, lust, gain, or any other reason.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| तेजःक्षमायशःप्राप्ताः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (बहुव्रीहि समास) | तेज, क्षमा और यश को प्राप्त |
| स्मितपूर्वाभिभाषिणः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (स्मितपूर्व + अभिभाषिन्) | मुस्कान के साथ बोलने वाले |
| क्रोधात् | पुल्लिंग, पञ्चमी एकवचन (क्रोध) | क्रोध से |
| कामार्थहेतोः | पुल्लिंग, पञ्चमी एकवचन (काम + अर्थ + हेतु) | काम या अर्थ के कारण से |
| वा | अव्यय | या |
| न | अव्यय | नहीं |
| ब्रूयुः | ब्रू धातु, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष बहुवचन | बोलें |
| अनृतम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (अनृत) | झूठ, असत्य |
| वचः | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (वचस्) | वचन, बात |
📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या
आठवें श्लोक में मंत्रियों के नैतिक चरित्र की झलक मिलती है। वे तेज (प्रतिभा), क्षमा (सहनशीलता) और यश (कीर्ति) से युक्त थे। वे सदा मुस्कुराकर बात करते थे, जो उनकी सौम्यता और मधुर व्यवहार को दर्शाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे कभी भी असत्य नहीं बोलते थे, चाहे क्रोध में हों, कामवासना से प्रेरित हों, धन के लालच में हों, या किसी अन्य कारण से।
यह गुण उन्हें अत्यंत विश्वसनीय बनाता था। राजा के सलाहकारों के लिए सत्यनिष्ठा सर्वोपरि है, क्योंकि उनकी सलाह पर ही राजा निर्णय लेता है। यदि मंत्री झूठ बोलेंगे, तो राज्य का नुकसान होगा। यहाँ वाल्मीकि ने स्पष्ट किया है कि दशरथ के मंत्री किसी भी प्रलोभन या दबाव में झूठ नहीं बोलते थे।
'स्मितपूर्वाभिभाषिणः' का अर्थ है कि वे कटु वचन नहीं बोलते थे, बल्कि मुस्कुराकर, प्रिय वचन बोलते थे। यह एक राजनयिक गुण है, जो दूसरों को आकर्षित करता है और वातावरण को सौहार्दपूर्ण बनाता है।
📚 व्याकरणिक पक्ष
'तेजःक्षमायशःप्राप्ताः' में तेजस्, क्षमा, यशस् – तीनों का समाहार है, फिर प्राप्त के साथ बहुव्रीहि समास। 'स्मितपूर्वाभिभाषिणः' में स्मितपूर्व (पूर्वसदृश) और अभिभाषिन् का समास। 'कामार्थहेतोः' में काम और अर्थ के हेतु से – पञ्चमी एकवचन। 'ब्रूयुः' विधिलिङ् का रूप है, जिसका अर्थ है 'वे बोलें' (चाहिए या संभावना)। यहाँ निषेधार्थक 'न' के साथ यह कहता है कि वे ऐसा नहीं करते थे।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
सत्य ही सबसे बड़ा धर्म है। यह श्लोक हमें सिखाता है कि किसी भी परिस्थिति में सत्य न छोड़ें। क्रोध, काम या अर्थ के वशीभूत होकर झूठ बोलना पतन का कारण बनता है। सत्यवादिता और मधुर व्यवहार व्यक्ति को तेज, क्षमा और यश प्रदान करते हैं।