अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

श्रीमन्तश्च महात्मानः शस्त्रज्ञा दृढविक्रमाः। कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिणः॥

हिंदी अनुवाद

वे श्रीमान (तेजस्वी), महात्मा, शस्त्रज्ञ, दृढ़विक्रम (दृढ़ पराक्रमी), कीर्तिमान, प्रणिहित (तत्पर) और यथावचनकारी (आज्ञा का पालन करने वाले) थे।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में मंत्रियों एवं पुरोहितों के और भी गुण बताए गए हैं – वे तेजस्वी, महान, शस्त्रविद्या में निपुण, दृढ़ पराक्रमी, यशस्वी, तत्पर और आज्ञाकारी थे।

टिप्पणी

ये गुण उनकी बहुमुखी प्रतिभा को दर्शाते हैं। वे केवल विद्वान ही नहीं, बल्कि युद्धकला में भी निपुण थे, और राजा के प्रति पूर्ण निष्ठावान थे।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक ७ ॥

श्रीमन्तश्च महात्मानः शस्त्रज्ञा दृढविक्रमाः। कीर्तिमन्तः प्रणिहिता यथावचनकारिणः॥
śrīmantaśca mahātmānaḥ śastrajñā dṛḍhavikramāḥ | kīrtimantaḥ praṇihitā yathāvacanakāriṇaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : वे श्रीमान (तेजस्वी), महात्मा, शस्त्रज्ञ, दृढ़विक्रम (दृढ़ पराक्रमी), कीर्तिमान, प्रणिहित (तत्पर) और यथावचनकारी (आज्ञा का पालन करने वाले) थे।

🔹 English Translation : They were glorious, great souls, knowers of weapons, of firm valor, famous, diligent, and obedient to commands.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
श्रीमन्तःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (श्रीमत्)श्रीमान, तेजस्वी, ऐश्वर्यशाली
अव्ययऔर
महात्मानःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (महात्मन्)महात्मा, महान आत्मा वाले
शस्त्रज्ञाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (शस्त्र + ज्ञ)शस्त्रों के ज्ञाता, अस्त्र-शस्त्र में निपुण
दृढविक्रमाःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (दृढ + विक्रम)दृढ़ पराक्रम वाले, अटल साहसी
कीर्तिमन्तःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (कीर्तिमत्)कीर्तिमान, यशस्वी
प्रणिहिताःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (प्रणिहित)तत्पर, लगे हुए, नियुक्त
यथावचनकारिणःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (यथा + वचन + कारिन्)आज्ञा के अनुसार कार्य करने वाले, आज्ञाकारी

📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या

सातवें श्लोक में राजा दशरथ के मंत्रियों एवं पुरोहितों के अतिरिक्त गुणों का वर्णन है। वे 'श्रीमन्त' (तेजस्वी और ऐश्वर्यशाली) थे, 'महात्मा' (उदार और महान आत्मा वाले) थे। वे 'शस्त्रज्ञ' थे, अर्थात् अस्त्र-शस्त्र की विद्या में निपुण थे, जो उस युग के शासक वर्ग के लिए आवश्यक था। 'दृढविक्रम' का अर्थ है उनका पराक्रम अटल और अप्रतिम था। 'कीर्तिमन्त' यानी वे सुप्रसिद्ध थे। 'प्रणिहित' का भाव है कि वे अपने कर्तव्यों में सदा तत्पर रहते थे। और 'यथावचनकारिणः' बताता है कि वे राजा की आज्ञा का पालन शिरोधार्य करते थे।

ये सभी गुण एक आदर्श मंत्री के आवश्यक तत्व हैं। उनमें तेज, उदारता, युद्धकौशल, साहस, यश, तत्परता और आज्ञाकारिता होनी चाहिए। विशेष रूप से 'यथावचनकारिणः' का उल्लेख यह दर्शाता है कि वे राजा के प्रति पूर्ण निष्ठावान थे और उनकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते थे। यह एक सुव्यवस्थित प्रशासन के लिए आवश्यक है।

यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य है कि ये गुण केवल मंत्रियों के ही नहीं, बल्कि राजा के स्वयं के भी हो सकते हैं। परंतु प्रसंग से ये मंत्रियों के विशेषण प्रतीत होते हैं।

📚 व्याकरणिक पक्ष

'श्रीमन्तः' श्रीमत् शब्द से, 'महात्मानः' महात्मन् से, 'शस्त्रज्ञाः' शस्त्रज्ञ से, 'दृढविक्रमाः' दृढविक्रम से, 'कीर्तिमन्तः' कीर्तिमत् से, 'प्रणिहिताः' प्रणिहित (भूत कृदंत) से, 'यथावचनकारिणः' यथावचनकारिन् से बने हैं।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

इन गुणों को आत्मिक विकास से भी जोड़ा जा सकता है। श्री (समृद्धि), महत्त्व (उदारता), शस्त्रज्ञता (इंद्रियों को वश में करने का ज्ञान), दृढ़ पराक्रम (दृढ़ संकल्प), कीर्ति (सत्कर्मों से यश), प्रणिहित (लगन), और यथावचनकारिता (शास्त्राज्ञा का पालन) – ये सब एक साधक के गुण भी हो सकते हैं।

✨ विशेष: यह श्लोक हमें बताता है कि राजा दशरथ के मंत्री बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। वे केवल लेखनी ही नहीं, तलवार भी चलाना जानते थे। यही कारण था कि अयोध्या सुरक्षित और समृद्ध थी।
॥ जय श्री राम ॥