अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
एतैर्ब्रह्मर्षिभिर्नित्यमृत्विजस्तस्य पौर्वकाः। विद्याविनीता हीमन्तः कुशला नियतेन्द्रियाः॥
हिंदी अनुवाद
इन ब्रह्मर्षियों के द्वारा उसके (राजा के) पौर्वक (पुराने) ऋत्विज (पुरोहित) नित्य ही विद्याविनीत, हिमंत (हिमवत? या हीमन्त: संभवतः हीमान् = उत्साही?), कुशल और नियतेन्द्रिय (जितेन्द्रिय) थे।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक राजा दशरथ के पुरोहितों के गुणों का वर्णन करता है। वे विद्वान, विनीत, उत्साही, कुशल और जितेन्द्रिय थे।
टिप्पणी
पुरोहितों के ये गुण उनकी उच्च कोटि को दर्शाते हैं। वे केवल कर्मकांडी नहीं थे, बल्कि विद्या, विनय, उत्साह, कौशल और इंद्रियनिग्रह से युक्त थे।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक ६ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : इन ब्रह्मर्षियों के द्वारा उसके (राजा के) पौर्वक (पुराने) ऋत्विज (पुरोहित) नित्य ही विद्याविनीत, हिमंत (उत्साही), कुशल और नियतेन्द्रिय (जितेन्द्रिय) थे।
🔹 English Translation : By these Brahmarshis, his (the king's) ancestral priests were always learned, humble, enthusiastic, skillful, and with controlled senses.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| एतैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन (एतद्) | इनके द्वारा |
| ब्रह्मर्षिभिः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन (ब्रह्मर्षि) | ब्रह्मर्षियों के द्वारा |
| नित्यम् | अव्यय | नित्य, सदा |
| ऋत्विजः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (ऋत्विज्) | पुरोहित |
| तस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | उसके (राजा के) |
| पौर्वकाः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (पौर्वक) | पूर्वकालीन, प्राचीन |
| विद्याविनीताः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (विद्या + विनीत) | विद्या से युक्त एवं विनीत |
| हीमन्तः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (हीमत्) | उत्साही, प्रसन्न (ही = उत्साह) |
| कुशलाः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (कुशल) | कुशल, निपुण |
| नियतेन्द्रियाः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (नियत + इन्द्रिय) | जितेन्द्रिय, संयमित इंद्रियों वाले |
📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या
छठे श्लोक में राजा दशरथ के पुरोहितों (ऋत्विज) के गुणों का वर्णन है। ये पुरोहित ब्रह्मर्षियों के मार्गदर्शन में थे और स्वयं भी अत्यंत योग्य थे। वे विद्याविनीत (विद्या और विनय से युक्त), हीमन्त (उत्साही), कुशल (निपुण) और नियतेन्द्रिय (जितेन्द्रिय) थे।
'विद्याविनीत' का अर्थ है कि उनके पास अपार विद्या थी, फिर भी वे अभिमानरहित और विनम्र थे। यह एक महान गुण है। 'हीमन्त' शब्द का अर्थ है उत्साही, जो अपने कार्यों में सदा तत्पर रहते हैं। 'कुशल' का तात्पर्य है कि वे अपने कर्मकांड और धार्मिक अनुष्ठानों में दक्ष थे। 'नियतेन्द्रिय' का अर्थ है जिन्होंने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया हो, जो संयमी हों।
ये सभी गुण एक आदर्श पुरोहित के लक्षण हैं। पुरोहित केवल यज्ञ कराने वाला नहीं, बल्कि राजा का आध्यात्मिक मार्गदर्शक भी होता है। इसलिए उसका चरित्र उच्च और संयमित होना आवश्यक है।
यहाँ 'पौर्वकाः' शब्द से ज्ञात होता है कि ये पुरोहित परंपरा से चले आ रहे थे, अर्थात् उनके कुल में यह पद पीढ़ियों से था। यह वंश परंपरा को भी दर्शाता है।
📚 व्याकरणिक एवं साहित्यिक पक्ष
इस श्लोक में 'ब्रह्मर्षिभिः' तृतीया बहुवचन है, जो करण कारक है। 'पौर्वकाः' शब्द "पूर्व" से निष्पन्न है। 'विद्याविनीताः' में विद्या और विनीत का समास है। 'नियतेन्द्रियाः' बहुव्रीहि समास है।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
ये गुण हम सभी के लिए अनुकरणीय हैं। विद्या के साथ विनय, उत्साह, कौशल और इंद्रिय संयम – ये सफल जीवन के मूल मंत्र हैं। विशेषकर धार्मिक या आध्यात्मिक पथ पर चलने वालों के लिए इनका पालन आवश्यक है।