अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

सुयज्ञोऽप्यथ जाबालिः काश्यपोऽप्यथ गौतमः। मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विजः॥

हिंदी अनुवाद

सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, मार्कण्डेय, दीर्घायु, और कात्यायन – ये सभी द्विज (ब्राह्मण) थे।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में कुछ अन्य ब्राह्मण विद्वानों के नाम दिए गए हैं, जो राजसभा में हो सकते हैं या राजा के सलाहकार थे।

टिप्पणी

ये नाम विभिन्न ऋषियों के हैं जो संभवतः राजा दशरथ की सभा में विद्वान या सलाहकार के रूप में विराजमान थे। इनमें से कई का उल्लेख अन्य पुराणों में भी मिलता है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक ५ ॥

सुयज्ञोऽप्यथ जाबालिः काश्यपोऽप्यथ गौतमः। मार्कण्डेयस्तु दीर्घायुस्तथा कात्यायनो द्विजः॥
suyajño'pyatha jābāliḥ kāśyapo'pyatha gautamaḥ | mārkaṇḍeyastu dīrghāyustathā kātyāyano dvijaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, मार्कण्डेय, दीर्घायु, और कात्यायन – ये सभी द्विज (ब्राह्मण) थे।

🔹 English Translation : Suyajna, Jabali, Kashyapa, Gautama, Markandeya, Dirghayu, and Katyayana – all these were dvijas (brahmins).

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
सुयज्ञःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनसुयज्ञ (नाम)
अपिअव्ययभी
अथअव्ययतथा, और
जाबालिःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनजाबालि (नाम)
काश्यपःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनकाश्यप (नाम)
अपिअव्ययभी
अथअव्ययतथा
गौतमःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनगौतम (नाम)
मार्कण्डेयःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनमार्कण्डेय (नाम)
तुअव्ययतो
दीर्घायुःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनदीर्घायु (नाम)
तथाअव्ययतथा
कात्यायनःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनकात्यायन (नाम)
द्विजःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनद्विज (ब्राह्मण)

📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या

पाँचवें श्लोक में कुछ अन्य ब्राह्मण विद्वानों के नाम गिनाए गए हैं – सुयज्ञ, जाबालि, काश्यप, गौतम, मार्कण्डेय, दीर्घायु और कात्यायन। ये सभी द्विज (ब्राह्मण) थे। संभवतः ये सभी राजा दशरथ की सभा में उपस्थित रहते थे या विभिन्न धार्मिक एवं नीतिगत मामलों में राजा को सलाह देते थे।

इन नामों का विशेष महत्व है – सुयज्ञ (अच्छा यज्ञ करने वाला), जाबालि (एक प्रसिद्ध ऋषि, जिनका उल्लेख रामायण में बाद में आता है), काश्यप (कश्यप गोत्र के), गौतम (गौतम ऋषि), मार्कण्डेय (चिरंजीवी ऋषि), दीर्घायु (दीर्घ आयु वाला), कात्यायन (कात्यायन गोत्र के)। ये सभी ऋषि अपने-अपने क्षेत्रों में प्रसिद्ध थे।

रामायण में आगे चलकर जाबालि का एक प्रसंग आता है जब वे राम को वनवास के समय भौतिकवादी तर्क देकर वापस चलने को कहते हैं, लेकिन राम उन्हें धर्म का उपदेश देते हैं। यह दर्शाता है कि राजसभा में विभिन्न मतों के विद्वान थे।

इस श्लोक से यह भी पता चलता है कि राजा दशरथ ने केवल राजनीतिज्ञों को ही नहीं, बल्कि धार्मिक एवं आध्यात्मिक विद्वानों को भी अपने दरबार में स्थान दिया था। यह एक संपूर्ण एवं संतुलित राजसभा का लक्षण है।

📚 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ

प्राचीन भारत में राजसभा में विभिन्न विद्वानों, ऋषियों और मुनियों का होना सामान्य था। वे राजा को धर्म, नीति, यज्ञ, और समाज के विभिन्न पहलुओं पर मार्गदर्शन देते थे। यहाँ सूचीबद्ध नाम उन ऋषियों के हैं जिनका उल्लेख वेदों, उपनिषदों और पुराणों में मिलता है। उदाहरण के लिए, मार्कण्डेय ऋषि चिरंजीवी हैं और मार्कण्डेय पुराण के रचयिता माने जाते हैं। गौतम ऋषि का नाम गौतम धर्मसूत्र से जुड़ा है।

इस प्रकार दशरथ की सभा ज्ञान-विज्ञान का केंद्र थी, जहाँ विभिन्न शाखाओं के विद्वान एकत्र होते थे।

✨ विशेष: यह श्लोक हमें बताता है कि एक आदर्श राजा अपने चारों ओर विभिन्न विषयों के विद्वानों को रखता है, ताकि वह हर क्षेत्र में सही निर्णय ले सके। आज के युग में भी शासन को विभिन्न विशेषज्ञों की सलाह की आवश्यकता होती है।
॥ जय श्री राम ॥