अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
ऋत्विजौ द्वावभिमतौ तस्यास्तामृषिसत्तमौ। वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणश्च तथापरे॥
हिंदी अनुवाद
उस राजा के दो अभिमत (प्रिय) ऋत्विज् (पुरोहित) थे, जो ऋषिश्रेष्ठ थे – वसिष्ठ और वामदेव। तथा अन्य मंत्री भी थे।
अर्थ / व्याख्या
इस श्लोक में राजा दशरथ के दो प्रधान पुरोहितों – वसिष्ठ और वामदेव – का उल्लेख है, जो महान ऋषि थे। साथ ही अन्य मंत्रियों का भी संकेत है।
टिप्पणी
वसिष्ठ और वामदेव का नाम रामायण में बार-बार आता है। वसिष्ठ राजकुल के गुरु थे और उन्होंने राम-लक्ष्मण के संस्कारों से लेकर विवाह तक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक ४ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस राजा के दो अभिमत (प्रिय) ऋत्विज् (पुरोहित) थे, जो ऋषिश्रेष्ठ थे – वसिष्ठ और वामदेव। तथा अन्य मंत्री भी थे।
🔹 English Translation : That king had two esteemed priests, who were best among sages – Vasishtha and Vamadeva. And there were other ministers as well.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| ऋत्विजौ | पुल्लिंग, प्रथमा द्विवचन (ऋत्विज्) | दो ऋत्विज (यज्ञ कराने वाले पुरोहित) |
| द्वौ | संख्या, प्रथमा द्विवचन | दो |
| अभिमतौ | पुल्लिंग, प्रथमा द्विवचन (अभिमत) | प्रिय, मान्य |
| तस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | उसके |
| आस्ताम् | अदादि गण, परस्मैपद, लङ्लकार, प्रथमपुरुष द्विवचन (अस् धातु) | थे (दोनों) |
| ऋषिसत्तमौ | पुल्लिंग, प्रथमा द्विवचन (ऋषि + सत्तम) | ऋषियों में श्रेष्ठ |
| वसिष्ठः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वसिष्ठ |
| वामदेवः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वामदेव |
| च | अव्यय | और |
| मन्त्रिणः | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (मन्त्रिन्) | मंत्रीगण |
| च | अव्यय | और |
| तथा | अव्यय | उसी प्रकार, तथा |
| अपरे | पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (अपर) | अन्य, दूसरे |
📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या
चौथे श्लोक में राजा दशरथ के दो प्रधान पुरोहितों (ऋत्विज) का उल्लेख है – महर्षि वसिष्ठ और वामदेव। ये दोनों ऋषिश्रेष्ठ थे और राजा के अत्यंत प्रिय थे। इसके अतिरिक्त अन्य मंत्री भी थे, जिनका संकेत मात्र है।
वसिष्ठ रामायण के सबसे महत्वपूर्ण पात्रों में से एक हैं। वे इक्ष्वाकु कुल के कुलगुरु थे और उन्होंने राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के जन्म से लेकर उनके विवाह तक सभी संस्कारों का संचालन किया। वे एक ब्रह्मर्षि थे, जिनके पास अपार ज्ञान और तप था। वामदेव भी एक महान ऋषि थे, जिनका उल्लेख विभिन्न संदर्भों में मिलता है।
यहाँ 'ऋत्विज्' शब्द का प्रयोग विशेष रूप से यज्ञ कराने वाले पुरोहित के लिए हुआ है। राजा के लिए यज्ञीय कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण थे, और उनके लिए योग्य पुरोहितों का होना आवश्यक था। वसिष्ठ और वामदेव जैसे ऋषियों का राजसभा में होना अयोध्या की धार्मिक एवं आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक है।
'मन्त्रिणश्च तथापरे' कहकर यह भी स्पष्ट किया गया कि पुरोहितों के अतिरिक्त और भी मंत्री थे, जिनका उल्लेख आगे के श्लोकों में होगा। यह दर्शाता है कि राज्य प्रशासन में धार्मिक और राजनीतिक दोनों प्रकार के सलाहकारों का समावेश था।
📚 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ
प्राचीन भारतीय राजव्यवस्था में राजा के दो प्रकार के सलाहकार होते थे – पुरोहित (धार्मिक मामलों के) और मंत्री (प्रशासनिक मामलों के)। पुरोहित राजा को धर्म, यज्ञ, संस्कार आदि में मार्गदर्शन देते थे। वसिष्ठ और वामदेव जैसे ऋषियों का होना राजा के धार्मिक कर्तव्यों के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
वसिष्ठ का चरित्र रामायण में अत्यंत उदात्त है। उन्होंने राम के वनवास के समय भी उन्हें सांत्वना दी और बाद में राम के राज्याभिषेक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।