अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

त्रिषु लोकेषु विख्यातस्तेजसा च बलेन च। उदारः सर्वभूतानां दशरथो महीपतिः॥

हिंदी अनुवाद

तीनों लोकों में तेज और बल से विख्यात, सब प्राणियों के प्रति उदार, दशरथ महीपति थे।

अर्थ / व्याख्या

राजा दशरथ तीनों लोकों में अपने तेज और बल के लिए प्रसिद्ध थे तथा वे सभी प्राणियों के प्रति उदार थे।

टिप्पणी

यह श्लोक दशरथ के व्यक्तित्व के दो पहलुओं को उजागर करता है – बाह्य रूप से वे तेजस्वी एवं बलशाली थे, और आंतरिक रूप से उदार एवं दयालु। उनकी ख्याति तीनों लोकों में फैली हुई थी।

श्लोक २२: दशरथ का व्यक्तित्व

त्रिषु लोकेषु विख्यातस्तेजसा च बलेन च।
उदारः सर्वभूतानां दशरथो महीपतिः॥
triṣu lokeṣu vikhyātastejasā ca balena ca | udāraḥ sarvabhūtānāṃ daśaratho mahīpatiḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : तीनों लोकों में तेज और बल से विख्यात, सब प्राणियों के प्रति उदार, दशरथ महीपति थे।

🔹 English Translation : Famous in the three worlds for his brilliance and strength, generous towards all beings, Dasharatha was the lord of the earth.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
त्रिषुविशेषण, सप्तमी बहुवचनतीनों में
लोकेषुपुल्लिंग, सप्तमी बहुवचनलोकों में
विख्यातःविशेषण, प्रथमा एकवचनप्रसिद्ध
तेजसानपुंसकलिंग, तृतीया एकवचनतेज से
अव्ययऔर
बलेननपुंसकलिंग, तृतीया एकवचनबल से
उदारःविशेषण, प्रथमा एकवचनउदार, दयालु
सर्वभूतानाम्षष्ठी बहुवचनसब प्राणियों के प्रति
दशरथःप्रथमा एकवचनदशरथ
महीपतिःप्रथमा एकवचनराजा, पृथ्वीपति

📜 व्याख्या एवं महत्त्व

इस श्लोक में राजा दशरथ के गुणों का वर्णन है। वे तेज और बल में तीनों लोकों में प्रसिद्ध थे – यह उनकी वीरता और प्रताप को दर्शाता है। तेज का अर्थ है आत्मबल, प्रभाव, और बल का अर्थ है शारीरिक सामर्थ्य। दोनों गुणों से युक्त राजा अजेय होता है। साथ ही, वे सर्वभूतानाम् उदारः थे – सभी प्राणियों के प्रति उनका हृदय दयालु था। यह एक आदर्श राजा का लक्षण है कि वह केवल मनुष्यों के प्रति ही नहीं, बल्कि सभी जीवों के प्रति करुणा रखता है।

त्रिषु लोकेषु (तीनों लोक) से तात्पर्य स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल से है। इसका अर्थ है कि उनकी कीर्ति सम्पूर्ण सृष्टि में फैली हुई थी। यह एक आलंकारिक अभिव्यक्ति है, जो दशरथ की अद्वितीय प्रतिष्ठा को दर्शाती है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक हमें सिखाता है कि सच्चा बल और तेज उदारता के साथ होना चाहिए। केवल शारीरिक बल से कोई महान नहीं बनता, जब तक कि वह दयालु और उदार न हो। दशरथ का चरित्र हमें बताता है कि हमें अपने जीवन में भी तेज (आत्मविश्वास, प्रतिभा) और बल (साहस, सामर्थ्य) के साथ-साथ उदारता (दया, परोपकार) का भाव रखना चाहिए।

॥ उदारः सर्वभूतानां दशरथो महीपतिः ॥

जय श्री राम 🙏