अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

न तस्य विद्यते तुल्यो राज्ञः कश्चिन्नराधिपः। राजानो यस्य राजेन्द्राः प्रह्वाः सर्वे महीक्षितः॥

हिंदी अनुवाद

उस राजा दशरथ के समान कोई दूसरा नरेश नहीं था, जिसके सामने सभी राजा, राजेन्द्र और महीक्षित (भूमिपाल) नतमस्तक रहते थे।

अर्थ / व्याख्या

राजा दशरथ के समान कोई दूसरा राजा नहीं था, क्योंकि सभी राजा, राजेन्द्र और भूमिपाल उनके सामने नतमस्तक थे।

टिप्पणी

यह श्लोक दशरथ की सार्वभौम सत्ता को दर्शाता है। वे इतने महान थे कि अन्य राजा, जो स्वयं राजेन्द्र कहलाते थे, उनके आगे सिर झुकाते थे।

श्लोक २३: दशरथ की सर्वोच्च सत्ता

न तस्य विद्यते तुल्यो राज्ञः कश्चिन्नराधिपः।
राजानो यस्य राजेन्द्राः प्रह्वाः सर्वे महीक्षितः॥
na tasya vidyate tulyo rājñaḥ kaścinnarādhipaḥ | rājāno yasya rājendrāḥ prahvāḥ sarve mahīkṣitaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस राजा दशरथ के समान कोई दूसरा नरेश नहीं था, जिसके सामने सभी राजा, राजेन्द्र और महीक्षित (भूमिपाल) नतमस्तक रहते थे।

🔹 English Translation : There was no other king equal to that king Dasharatha, before whom all kings, lord of kings and rulers of the earth remained bowed.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
अव्ययनहीं
तस्यसर्वनाम, षष्ठी एकवचनउसके
विद्यतेआत्मनेपद, लट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचनहै, विद्यमान है
तुल्यःविशेषण, प्रथमा एकवचनसमान, बराबर
राज्ञःपुल्लिंग, षष्ठी एकवचनराजा के
कश्चित्सर्वनाम, प्रथमा एकवचनकोई भी
नराधिपःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचननरेश, राजा
राजानःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनराजा लोग
यस्यसर्वनाम, षष्ठी एकवचनजिसके
राजेन्द्राःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनराजाओं के राजा (महान राजा)
प्रह्वाःविशेषण, प्रथमा बहुवचननत, झुके हुए, विनम्र
सर्वेसर्वनाम, प्रथमा बहुवचनसभी
महीक्षितःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनभूमिपाल, राजा

📜 व्याख्या एवं महत्त्व

यह श्लोक दशरथ की अद्वितीय स्थिति को स्पष्ट करता है। वे केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि सम्राट थे, जिनके अधीन अनेक राजा थे। "राजेन्द्राः" और "महीक्षितः" पदों का प्रयोग यह दर्शाता है कि जो स्वयं बड़े-बड़े राजा थे, वे भी दशरथ के सामने झुकते थे। यह एक चक्रवर्ती सम्राट का लक्षण है।

प्राचीन भारत में राजाओं की श्रेणियाँ होती थीं – राजा, महाराजा, राजेन्द्र, चक्रवर्ती। दशरथ चक्रवर्ती सम्राट थे, जिनकी सत्ता सभी राजाओं पर स्थापित थी। वाल्मीकि जी ने यहाँ "न तस्य विद्यते तुल्यः" कहकर उनकी अपराजेयता और विशिष्टता को रेखांकित किया है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक हमें सिखाता है कि सच्ची महानता विनम्रता में है। दशरथ के सामने राजा झुकते थे, परन्तु वे स्वयं अहंकार से रहित थे। आध्यात्मिक दृष्टि से, जब हम अपने अहंकार को ईश्वर या गुरु के समक्ष समर्पित कर देते हैं, तो हम वास्तविक विनम्रता प्राप्त करते हैं। दशरथ का चरित्र हमें प्रेरित करता है कि हम अपनी उपलब्धियों पर गर्व न करें, बल्कि सभी के प्रति सम्मान भाव रखें।

॥ राजानो यस्य राजेन्द्राः प्रह्वाः सर्वे महीक्षितः ॥

जय श्री राम 🙏