अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

एवं गुणगणैर्युक्तो धर्मेण प्रजपालनः। रेमे राजा सुखं तत्र नान्दीमिव पुरंदरः॥

हिंदी अनुवाद

इस प्रकार गुणसमूह से युक्त, धर्मपूर्वक प्रजापालन करने वाला राजा वहाँ सुखपूर्वक रमण करता था, जैसे पुरंदर (इन्द्र) स्वर्ग में।

अर्थ / व्याख्या

दशरथ सभी गुणों से युक्त थे, धर्मपूर्वक प्रजापालन करते थे, और वे अयोध्या में सुखपूर्वक रहते थे, जैसे इन्द्र स्वर्ग में।

टिप्पणी

यह श्लोक दशरथ के जीवन की तुलना इन्द्र से करता है। जैसे इन्द्र स्वर्ग में आनन्दपूर्वक रहते हैं, वैसे ही दशरथ अयोध्या में सुखी थे।

श्लोक २४: दशरथ का सुखमय जीवन

एवं गुणगणैर्युक्तो धर्मेण प्रजपालनः।
रेमे राजा सुखं तत्र नान्दीमिव पुरंदरः॥
evaṃ guṇagaṇairyukto dharmeṇa prajapālanaḥ | reme rājā sukhaṃ tatra nāndīmiva puraṃdaraḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : इस प्रकार गुणसमूह से युक्त, धर्मपूर्वक प्रजापालन करने वाला राजा वहाँ सुखपूर्वक रमण करता था, जैसे पुरंदर (इन्द्र) स्वर्ग में।

🔹 English Translation : Thus endowed with multitude of virtues, protecting his people righteously, the king delighted there happily, like Purandara (Indra) in heaven.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
एवम्अव्ययइस प्रकार
गुणगणैःपुल्लिंग, तृतीया बहुवचनगुणों के समूह से
युक्तःविशेषण, प्रथमा एकवचनयुक्त, सहित
धर्मेणपुल्लिंग, तृतीया एकवचनधर्म से
प्रजपालनःविशेषण, प्रथमा एकवचनप्रजा का पालन करने वाला
रेमेआत्मनेपद, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचनरमण किया, आनन्दित हुआ
राजाप्रथमा एकवचनराजा
सुखम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (क्रियाविशेषण)सुखपूर्वक
तत्रअव्ययवहाँ (अयोध्या में)
नान्दीम्?? पाठ भेद – "नाके" या "नान्दीम्"? यहाँ "नाके" हो सकता है। व्याख्या में "नाके" (स्वर्ग) लिया गया है।स्वर्ग में (नाके)
इवअव्ययजैसे
पुरंदरःप्रथमा एकवचनइन्द्र (पुरों का भंजक)

📜 व्याख्या एवं महत्त्व

यहाँ दशरथ के जीवन की तुलना इन्द्र से की गई है। इन्द्र देवताओं के राजा हैं और स्वर्ग में निवास करते हैं। वैसे ही दशरथ, जो सभी गुणों से सम्पन्न हैं, धर्मपूर्वक प्रजापालन करते हुए अयोध्या में सुखपूर्वक निवास करते हैं। यह तुलना अयोध्या को स्वर्ग के समान बताती है।

गुणगणैर्युक्तः – यहाँ गुणों में पूर्व श्लोकों में वर्णित तेज, बल, उदारता, प्रजापालन आदि सभी सम्मिलित हैं। धर्मेण प्रजपालनः – राजा का मुख्य कर्तव्य धर्म के अनुसार प्रजा की रक्षा करना है। जब राजा ऐसा करता है, तो वह स्वयं भी सुखी रहता है। यह एक आदर्श राजा का लक्षण है कि वह प्रजा के सुख में अपना सुख मानता है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक बताता है कि सच्चा सुख धर्मपूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करने में है। दशरथ की तरह यदि हम अपने दायित्वों का निर्वाह निष्ठा और धर्म से करें, तो हम भी आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत कर सकते हैं। तुलना इन्द्र से यह भी दर्शाती है कि पृथ्वी पर धर्मपूर्वक शासन करने वाला राजा स्वर्ग के सुखों का भागी होता है।

॥ रेमे राजा सुखं तत्र नाके इव पुरंदरः ॥

जय श्री राम 🙏