अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

एतैरमात्यैः सहितो धर्मज्ञैरात्मसम्मितैः। स राजा पृथिवीं पाल्य सुखमासीदरिंदमः॥

हिंदी अनुवाद

इन धर्मज्ञ और अपने समान (योग्य) मंत्रियों से सहित वह राजा (दशरथ) शत्रुओं का दमन करने वाला, पृथ्वी का पालन करके सुखपूर्वक रहता था।

अर्थ / व्याख्या

ऐसे योग्य मंत्रियों के साथ राजा दशरथ ने पृथ्वी का पालन किया और सुखपूर्वक रहे।

टिप्पणी

यह श्लोक इस खंड का सार है, जो राजा और मंत्रियों के आदर्श संबंध को दर्शाता है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक २० ॥

एतैरमात्यैः सहितो धर्मज्ञैरात्मसम्मितैः।
स राजा पृथिवीं पाल्य सुखमासीदरिंदमः॥
etairamātyaiḥ sahito dharmajñairātmasammitaiḥ |
sa rājā pṛthivīṃ pālya sukhamāsīdarimdamaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : इन धर्मज्ञ और अपने समान (योग्य) मंत्रियों से सहित वह राजा (दशरथ) शत्रुओं का दमन करने वाला, पृथ्वी का पालन करके सुखपूर्वक रहता था।

🔹 English Translation : Accompanied by these ministers who were knowers of dharma and equal to himself, that king (Dasharatha), the subduer of enemies, protected the earth and lived happily.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
एतैःसर्वनाम, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचनइन
अमात्यैःपुल्लिंग, तृतीया बहुवचनमंत्रियों से
सहितःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनसहित
धर्मज्ञैःविशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचनधर्म के ज्ञाता
आत्मसम्मितैःविशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन (आत्म + सम्मित)अपने समान (योग्य)
सःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवह
राजापुल्लिंग, प्रथमा एकवचनराजा
पृथिवीम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनपृथ्वी को
पाल्यल्यबंत अव्यय (पाल् + ल्यप्)पालन करके
सुखम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन या अव्ययसुखपूर्वक
आसीत्क्रिया, लङ् लकार, प्रथमपुरुष एकवचनरहता था
अरिंदमःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (अरि + दम्)शत्रुओं का दमन करने वाला

📜 व्याख्या

यह श्लोक अयोध्या के प्रशासन के वर्णन का समापन करता है। राजा दशरथ ऐसे मंत्रियों से सहित थे जो धर्मज्ञ और उनके समान ही योग्य थे। "आत्मसम्मितैः" का अर्थ है कि मंत्री राजा के समान ही गुणसंपन्न थे। इससे राजा को शत्रुओं का दमन करने और पृथ्वी का पालन करने में सहायता मिली, और वे सुखपूर्वक रहे। यहाँ "पाल्य" (पालन करके) भूतकालिक कृदंत है, जो कार्य की समाप्ति को दर्शाता है। राजा के सुखी जीवन का कारण योग्य मंत्री थे। यह श्लोक बताता है कि राजा की सफलता में मंत्रियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है।

॥ योग्य मंत्री ही राजा की सफलता के मूल हैं ॥

जय श्री राम 🙏