अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
सुवाससः सुवेषाश्च ते च सर्वे शुचिव्रताः। हितार्थाश्च नरेन्द्रस्य जाग्रतो नयचक्षुषा॥
हिंदी अनुवाद
वे सब सुन्दर वस्त्र धारण करने वाले, सुन्दर वेष वाले, पवित्र व्रतों का पालन करने वाले, राजा के हित में तत्पर और नीति-चक्षु से सजग रहने वाले थे।
अर्थ / व्याख्या
मंत्रियों के व्यक्तित्व: सुवस्त्र, सुवेष, पवित्र व्रत, राजहित में तत्पर, नीतिज्ञ।
टिप्पणी
यह श्लोक मंत्रियों के बाह्य और आंतरिक गुणों का वर्णन करता है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक १६ ॥
हितार्थाश्च नरेन्द्रस्य जाग्रतो नयचक्षुषा॥
hitārthāśca narendrasya jāgratonayacakṣuṣā ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : वे सब सुन्दर वस्त्र धारण करने वाले, सुन्दर वेष वाले, पवित्र व्रतों का पालन करने वाले, राजा के हित में तत्पर और नीति-चक्षु से सजग रहने वाले थे।
🔹 English Translation : All of them wore beautiful clothes, had elegant appearance, observed pure vows, were devoted to the king's welfare, and remained alert with the eye of policy.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सुवाससः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | सुन्दर वस्त्रों वाले |
| सुवेषाः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | सुन्दर वेष वाले |
| च | अव्यय | और |
| ते | सर्वनाम, प्रथमा बहुवचन | वे |
| च | अव्यय | और |
| सर्वे | सर्वनाम, प्रथमा बहुवचन | सब |
| शुचिव्रताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (शुचि + व्रत) | पवित्र व्रतों वाले |
| हितार्थाः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (हित + अर्थ) | हित के लिए तत्पर |
| च | अव्यय | और |
| नरेन्द्रस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन (नर + इन्द्र) | राजा के |
| जाग्रतः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (जाग्रत् शब्द से) | जागरूक रहने वाले |
| नयचक्षुषा | पुल्लिंग, तृतीया एकवचन (नय + चक्षु) | नीति रूपी चक्षु से |
📜 व्याख्या
यह श्लोक मंत्रियों के व्यक्तित्व और उनके कर्तव्यपालन के तरीके को दर्शाता है। वे न केवल बाह्य रूप से सुसंस्कृत थे (सुन्दर वस्त्र और वेष), बल्कि आंतरिक रूप से भी पवित्र व्रतों का पालन करते थे। वे राजा के हित में सदा तत्पर रहते थे और नीति (राजनीति) की दृष्टि से सजग रहते थे। "नयचक्षुषा" का अर्थ है कि वे नीति को देखने वाली दृष्टि से काम करते थे, अर्थात् हर निर्णय में नीति का पालन करते थे। यहाँ "जाग्रतः" का तात्पर्य है कि वे सदा सचेत और सतर्क रहते थे, कभी प्रमाद नहीं करते थे।
॥ बाह्य शालीनता और आंतरिक सद्गुण ही सफल प्रशासक के लक्षण हैं ॥
जय श्री राम 🙏