अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
गुरोर्गुणगृहीताश्च प्रख्याताश्च पराक्रमैः। विदेशेष्वपि विज्ञाताः सर्व एव मनीषिणः॥
हिंदी अनुवाद
वे गुरु (मंत्री या आचार्य) से गुण ग्रहण करने वाले, पराक्रम से प्रसिद्ध, और विदेशों में भी जाने जाने वाले सभी बुद्धिमान थे।
अर्थ / व्याख्या
मंत्री गुरु से गुण सीखने वाले, पराक्रमी, विदेशों में प्रसिद्ध और बुद्धिमान थे।
टिप्पणी
यह श्लोक मंत्रियों की विद्वत्ता और ख्याति का वर्णन करता है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक १७ ॥
विदेशेष्वपि विज्ञाताः सर्व एव मनीषिणः॥
videśeṣvapi vijñātāḥ sarva eva manīṣiṇaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : वे गुरु (मंत्री या आचार्य) से गुण ग्रहण करने वाले, पराक्रम से प्रसिद्ध, और विदेशों में भी जाने जाने वाले सभी बुद्धिमान थे।
🔹 English Translation : They were imbued with virtues from their preceptor, renowned for their prowess, and all those wise men were known even in foreign lands.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| गुरोः | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | गुरु से |
| गुणगृहीताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | गुणों को ग्रहण करने वाले |
| च | अव्यय | और |
| प्रख्याताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | प्रसिद्ध |
| च | अव्यय | और |
| पराक्रमैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | पराक्रम से |
| विदेशेषु | पुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन | विदेशों में |
| अपि | अव्यय | भी |
| विज्ञाताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | जाने जाने वाले |
| सर्वे | सर्वनाम, प्रथमा बहुवचन | सब |
| एव | अव्यय | ही |
| मनीषिणः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | बुद्धिमान |
📜 व्याख्या
इस श्लोक में मंत्रियों की विद्वत्ता और ख्याति का वर्णन है। वे गुरु (अपने आचार्य या वरिष्ठ मंत्री) से सद्गुण ग्रहण करते थे, अतः वे निरंतर सीखने वाले थे। अपने पराक्रम के कारण वे प्रसिद्ध थे और उनकी ख्याति विदेशों तक फैली हुई थी। सभी मनीषी (बुद्धिमान) थे। यह दर्शाता है कि अयोध्या के मंत्री न केवल देश में बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मानित थे। उनके ज्ञान और पराक्रम ने राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ाई।
॥ विद्या और वीरता ही यश का मूल है ॥
जय श्री राम 🙏