अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विनः। शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः॥

हिंदी अनुवाद

उस वीर राजा (दशरथ) के आठ यशस्वी मंत्री थे। वे पवित्र (शुचि) थे और राज्य के कार्यों में सदा अनुरक्त (लगे हुए) थे।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक राजा दशरथ के आठ मंत्रियों की संख्या और उनके पवित्रता एवं कर्तव्यनिष्ठा के गुणों का उल्लेख करता है।

टिप्पणी

आठ मंत्रियों का होना प्राचीन भारतीय मंत्रिपरिषद का आदर्श माना जाता था। यहाँ शुचि और अनुरक्त शब्द उनकी ईमानदारी और समर्पण को दर्शाते हैं।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड अध्याय ७ श्लोक २ ॥

अष्टौ बभूवुर्वीरस्य तस्यामात्या यशस्विनः। शुचयश्चानुरक्ताश्च राजकृत्येषु नित्यशः॥
aṣṭau babhūvur vīrasya tasyāmātyā yaśasvinaḥ | śucayaścānuraktāśca rājakṛtyeṣu nityaśaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस वीर राजा (दशरथ) के आठ यशस्वी मंत्री थे। वे पवित्र (शुचि) थे और राज्य के कार्यों में सदा अनुरक्त (लगे हुए) थे।

🔹 English Translation : That heroic king (Dasharatha) had eight glorious ministers. They were pure (virtuous) and always devoted to the duties of the kingdom.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
अष्टौसंख्या (अव्यय)आठ
बभूवुःभ्वादि गण, परस्मैपद, लिट्लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (भू धातु)हुए, थे
वीरस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचन (वीर)वीर (राजा) के
तस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचन (तत्)उसके
अमात्याःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनमंत्री
यशस्विनःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (यशस्विन्)यशस्वी, कीर्तिमान
शुचयःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (शुचि)पवित्र, सात्त्विक
अव्ययऔर
अनुरक्ताःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (अनुरक्त)अनुरक्त, आसक्त, लगे हुए
अव्ययऔर
राजकृत्येषुनपुंसकलिंग, सप्तमी बहुवचन (राजकृत्य)राज्य के कार्यों में
नित्यशःअव्ययसदा, निरन्तर

📖 श्लोक का विस्तृत अर्थ एवं व्याख्या

दूसरे श्लोक में राजा दशरथ के मंत्रियों की संख्या एवं उनके मूल गुणों का उल्लेख है। उनके आठ मंत्री थे, जो यशस्वी, शुचि एवं राजकाज में सदा तत्पर थे। 'यशस्विनः' का तात्पर्य है कि वे अपनी योग्यता और चरित्र के कारण प्रसिद्ध थे। 'शुचयः' उनकी आंतरिक पवित्रता और नैतिकता को दर्शाता है, जो शासन में अत्यंत आवश्यक है। 'अनुरक्ताः' बताता है कि उनका हृदय राज्य के कार्यों में लगा था, वे कर्तव्यनिष्ठ थे। 'राजकृत्येषु नित्यशः' से स्पष्ट है कि उनकी नियुक्ति केवल पद के लिए नहीं थी, बल्कि वे निरंतर राज्य के हित में कार्यरत रहते थे।

इस श्लोक में वीर राजा के लिए 'वीरस्य' शब्द का प्रयोग किया गया है, जो दशरथ की शौर्यता को इंगित करता है। योग्य राजा को योग्य मंत्री मिलते हैं, यह एक सिद्धांत है। आठ मंत्रियों का होना एक संतुलित मंत्रिपरिषद का प्रतीक है। प्राचीन भारतीय राजनीति में मंत्रिपरिषद में आठ मंत्री आदर्श माने जाते थे (जैसे कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी उल्लेख है)।

यहाँ 'शुचि' का अर्थ केवल बाहरी शुद्धता नहीं, बल्कि मन की पवित्रता, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा है। 'अनुरक्त' का भाव है कि वे राजा और राज्य के प्रति पूर्ण समर्पित थे। ये सभी गुण एक आदर्श प्रशासक के लक्षण हैं।

📚 व्याकरणिक पक्ष

इस श्लोक में 'बभूवुः' लिट्लकार (परोक्षभूत) का रूप है, जो भूतकाल में हुए कार्य को दर्शाता है। 'यशस्विनः' यशस्विन् शब्द से, 'शुचयः' शुचि से, 'अनुरक्ताः' अनुरक्त से बना है। 'राजकृत्येषु' में राजन् + कृत्य, तत्पुरुष समास है। 'नित्यशः' में 'शस्' प्रत्यय से भाववाचक क्रियाविशेषण।

🕉️ आध्यात्मिक दृष्टि

आठ मंत्री आठ इंद्रियों (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार) के प्रतीक हो सकते हैं। यदि ये सभी पवित्र (शुचि) हों और आत्मा (राजा) के कार्यों में निरंतर लगे रहें, तो जीवन सफल होता है। यहाँ यशस्वी होने का अर्थ है कि इंद्रियों की सफलता उनके सदुपयोग में है।

✨ विशेष: इस श्लोक में बताए गए गुण आधुनिक प्रशासन के लिए भी मार्गदर्शक हैं। एक अधिकारी में यश (प्रतिष्ठा), पवित्रता (ईमानदारी) और कर्तव्यनिष्ठा होनी चाहिए। यही सुशासन की कुंजी है।
॥ जय श्री राम ॥