सभी अध्याय अध्याय 18 | 78 श्लोक

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)

अठारहवाँ अध्याय गीता का निचोड़ है। इसमें संन्यास और त्याग का विवेचन है, कर्मों के फल का विश्लेषण है, और अंत में कृष्ण अर्जुन को सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आने का आदेश देते हैं। यह अध्याय मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

परिचय / Introduction

अठारहवाँ अध्याय गीता का समापन और सार है। यहाँ कृष्ण सभी पूर्व अध्यायों के ज्ञान को संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं और अर्जुन को अंतिम उपदेश देते हैं – "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। यह अध्याय मोक्ष (मुक्ति) और संन्यास (त्याग) का योग है।

मुख्य विषय / Key Themes

  • संन्यास और त्याग (Sannyasa and Tyaga): संन्यास का अर्थ है कर्मों का पूर्ण परित्याग, जबकि त्याग का अर्थ है कर्मफल का त्याग। कृष्ण त्याग को ही श्रेष्ठ बताते हैं।
  • त्याग के तीन प्रकार (Three Kinds of Renunciation):
    • सात्विक त्याग: कर्तव्य-बुद्धि से कर्म करना, परिणाम की चिंता किए बिना, बिना आसक्ति के।
    • राजसिक त्याग: दुःख के भय से या शरीर-कष्ट के कारण कर्म छोड़ देना – यह त्याग नहीं है।
    • तामसिक त्याग: कर्तव्य समझकर भी मोहवश या हानि के भय से कर्म न करना।
  • कर्म के पाँच कारण (Five Causes of Action): आधार (शरीर), कर्ता, विविध इंद्रियाँ, विविध चेष्टाएँ, और दैव (अदृष्ट) – ये पाँच कारण कर्म की सिद्धि में सहायक होते हैं।
  • तीन प्रकार के कर्ता (Three Kinds of Doers): सात्विक कर्ता (निरासक्त, धैर्यवान, उत्साही), राजसिक कर्ता (आसक्त, फल की इच्छा वाला, लोभी), तामसिक कर्ता (अनियंत्रित, हठी, कपटी, आलसी)।
  • बुद्धि और धृति के तीन भेद (Three Kinds of Intellect and Determination): सात्विक (प्रवृत्ति-निवृत्ति का ज्ञान), राजसिक (अधर्म-धर्म का अविवेक), तामसिक (अज्ञान से उल्टा समझना)। धृति (धैर्य) भी तीन प्रकार की होती है।
  • सुख के तीन प्रकार (Three Kinds of Happiness): सात्विक (जो विष की तरह शुरू में कठिन पर अंत में अमृत समान), राजसिक (शुरू में सुखद, अंत में विष समान), तामसिक (शुरू और अंत में मोहकारक, निद्रा-आलस्य से उत्पन्न)।
  • वर्णाश्रम धर्म का सार (Essence of Varna-Ashrama Dharma): ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के स्वाभाविक कर्मों का वर्णन।
  • सर्वधर्म परित्याग (Complete Surrender): अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण उपदेश – "सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ, मैं तुम्हें सब पापों से मुक्त कर दूँगा।"

यह अध्याय गीता का सार है – यह हमें सिखाता है कि सच्चा त्याग आसक्ति का त्याग है, कर्मों का नहीं। और अंततः, सभी धर्मों, मार्गों और उपायों से परे, केवल भगवान की शरणागति ही परम मुक्ति का एकमात्र सीधा मार्ग है। अर्जुन इस उपदेश को ग्रहण करते हैं और युद्ध करने को तत्पर हो जाते हैं। This final chapter summarizes the entire Gita, concluding that the ultimate path to liberation is to surrender completely to the Supreme Lord, letting go of all other dharmas.

अध्याय के सभी श्लोक

श्लोक 61

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ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥६१॥

“हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों के हृदय में ईश्वर स्थित है, जो माया द्वारा सब प्राणियों को यन्त्र पर बैठे हुए की भाँति घुमा रहा है।”

English: The Lord dwells in the heart of all beings, O Arjuna, causing them to revolve by His Maya as if mounted on a machine.

श्लोक 62

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तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्॥६२॥

“हे भारत! तू सब प्रकार से उस एक परमेश्वर की ही शरण में जा। उसकी कृपा से तू परम शान्ति और शाश्वत स्थान को प्राप्त होगा।”

English: O Bharata, go to Him alone for refuge with all your being. By His grace you will attain supreme peace and the eternal abode.

श्लोक 63

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इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥६३॥

“इस प्रकार मैंने तुझसे इस ज्ञान को कहा जो रहस्यों में भी अति रहस्य है। इसका सम्पूर्ण विचार करके, जैसा तू चाहे वैसा कर।”

English: Thus I have taught you this knowledge, more secret than all secrets. Reflect on it fully, and then do as you wish.

श्लोक 64

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सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्॥६४॥

“सबसे अति गोपनीय मेरे इस परम वचन को फिर से सुन। तू मुझे अत्यन्त प्रिय है, इसलिए मैं तेरे हित के लिए कहूँगा।”

English: Hear again My supreme word, the most confidential of all. You are very dear to Me, therefore I shall speak this for your benefit.

श्लोक 65

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मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥६५॥

“मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझको नमस्कार कर। इस प्रकार तू मुझको ही प्राप्त होगा। मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ, क्योंकि तू मुझे प्रिय है।”

English: Fix your mind on Me, be My devotee, worship Me, and bow down to Me. Thus you will come to Me alone. I truly promise you, for you are dear to Me.

श्लोक 66

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सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥६६॥

“सब धर्मों (कर्तव्यों) को छोड़कर केवल मेरी शरण में आ। मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा; शोक मत कर।”

English: Abandon all duties and take refuge in Me alone. I will liberate you from all sins; do not grieve.

श्लोक 67

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इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥६७॥

“यह (ज्ञान) तपस्वी को छोड़कर, अभक्त को, अशुश्रूषु (सेवा न करने वाले) को और मुझसे द्वेष करने वाले को कभी नहीं कहना चाहिए।”

English: This should never be spoken by you to one who is not austere, or to one who is not a devotee, or to one who does not serve, or to one who cavils at Me.

श्लोक 68

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य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥६८॥

“जो इस परम गोपनीय ज्ञान को मेरे भक्तों में कहेगा, तथा मुझमें परम भक्ति करेगा, वह निःसन्देह मुझको ही प्राप्त होगा।”

English: He who will teach this supreme secret to My devotees, showing supreme devotion to Me, will come to Me alone, without doubt.

श्लोक 69

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न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥६९॥

“उससे बढ़कर मनुष्यों में मेरा प्रिय कार्य करने वाला दूसरा नहीं है और न ही पृथ्वी पर उससे अधिक मुझे प्रिय दूसरा कोई होगा।”

English: There is no one among men who does more dear service to Me than he; nor shall anyone be dearer to Me on earth than he.

श्लोक 70

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अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥७०॥

“तथा जो हम दोनों के इस धर्मयुक्त संवाद का अध्ययन करेगा, उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा – ऐसा मेरा मत है।”

English: And he who will study this sacred dialogue of ours, by him I would be worshipped through the sacrifice of knowledge. Such is My conviction.

श्लोक 71

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श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥७१॥

“जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक और द्वेष रहित होकर इस (गीता) को सुनेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर पुण्यात्माओं के शुभ लोकों को प्राप्त होगा।”

English: Even the man who hears this (Gita) with faith and without envy becomes liberated and attains the auspicious worlds of the virtuous.

श्लोक 72

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कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥७२॥

“हे पार्थ! क्या यह (गीता) तूने एकाग्र चित्त से सुना? हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?”

English: O Partha, have you heard this with a one-pointed mind? O Dhananjaya, has your delusion born of ignorance been destroyed?

श्लोक 73

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अर्जुन उवाच नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव॥७३॥

“अर्जुन बोले: हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और स्मृति (ज्ञान) प्राप्त हो गई। मैं संशयरहित होकर स्थित हूँ; आपके वचन का पालन करूँगा।”

English: Arjuna said: O infallible one, my delusion is destroyed and I have regained memory by Your grace. I am standing freed from doubt; I will act according to Your word.

श्लोक 74

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सञ्जय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्॥७४॥

“सञ्जय बोले: इस प्रकार मैंने वासुदेव और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत और रोमांचक संवाद को सुना।”

English: Sanjaya said: Thus I have heard this wonderful dialogue between Vasudeva and the great-souled Partha, which causes the hair to stand on end.

श्लोक 75

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व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम्। योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्॥७५॥

“व्यास की कृपा से मैंने इस परम गोपनीय योग को साक्षात् योगेश्वर श्रीकृष्ण से, जो स्वयं कह रहे थे, सुना।”

English: By the grace of Vyasa, I have heard this supreme secret yoga directly from Krishna, the Lord of Yoga, Himself speaking.

श्लोक 76

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राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्। केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः॥७६॥

“हे राजन्! केशव और अर्जुन के इस अद्भुत एवं पुण्यमय संवाद को बार-बार स्मरण करके मैं बारम्बार हर्षित होता हूँ।”

English: O King, repeatedly remembering this wonderful and holy dialogue between Keshava and Arjuna, I rejoice again and again.

श्लोक 77

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तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः। विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः॥७७॥

“और हरि के उस अत्यद्भुत रूप को बार-बार स्मरण करके, हे राजन्, मुझे बड़ा विस्मय होता है और मैं बार-बार हर्षित होता हूँ।”

English: And remembering again and again that most wonderful form of Hari, great is my wonder, O King, and I rejoice again and again.

श्लोक 78

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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥७८॥

“जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ श्री (लक्ष्मी), विजय, भूति (ऐश्वर्य) और ध्रुव नीति (निश्चित नीति) है – ऐसा मेरा मत है।”

English: Wherever there is Krishna, the Lord of Yoga, and wherever there is Partha, the archer, there are prosperity, victory, opulence, and sound policy. Such is my conviction.