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बड़े बन ठन के निकले बिहारी (Bade Ban Than Ke Nikle Bihari) Lyrics in Hindi - Krishna Bhajan

195 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
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🙏 बड़े बन ठन के निकले बिहारी – मुरली मनोहर की शान

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(Bade Ban Than Ke Nikle Bihari) – भक्ति का अनोखा संगम

✍️ पारंपरिक लोक भजन (Traditional Bhajan)

📖 परिचय – जब कान्हा सजधज कर निकले

बड़े बन ठन के निकले बिहारी” – यह शब्द सुनते ही मन में श्याम सुंदर की एक मनमोहक छवि उभर आती है। पीताम्बर, मोरमुकुट, कमर में बंधी पीली पटका, और हाथों में मेहंदी लगाए, कान्हा जब सज-धज कर निकलते हैं, तो भक्तों का दिल धड़कने लगता है। यह भजन केवल एक गीत नहीं, बल्कि भक्त के हृदय की वह पुकार है, जो मुरली मनोहर से पूछती है – “ये बताओ, कहाँ जा रहे हो?”। हर पंक्ति में भक्त की उत्सुकता, प्रेम और जिज्ञासा झलकती है।

इस भजन की खासियत यह है कि इसमें भक्त स्वयं को राधा के स्थान पर रखकर कृष्ण से संवाद करता है। वह देखता है कि कृष्ण कैसे सज-संवर कर निकले हैं, उनके पैरों में घुंघरू बंधे हैं, अधरों पर मुरली है, और कंधे पर काली कमली। यह दृश्य इतना मादक है कि भक्त बार-बार पूछता है – “किन भक्तों के घर जा रहे हो?”। उत्तर में स्वयं कृष्ण कहते हैं – “मेरी राधे, वहाँ जा रहा हूँ”। यह संवाद भक्ति के अद्वितीय रस को दर्शाता है।

इस लेख में हम आपको इस भजन की पूरी लिरिक्स हिंदी और अंग्रेजी लिपि में, उसका अर्थ, इसके पीछे की रोचक कथा, आध्यात्मिक संदेश, और जीवन में इसकी प्रासंगिकता बताएंगे। साथ ही, अक्सर पूछे जाने वाले सवालों के जवाब भी देंगे। तो आइए, इस भक्ति-रस में डूब जाएँ और कान्हा के साथ उस अलौकिक यात्रा पर चलें।

📜 भजन लिरिक्स (हिंदी एवं लिप्यंतरण)

॥ स्थायी / टेक ॥

बड़े बन ठन के निकले बिहारी
बड़े बन ठन के निकले बिहारी
ये बताओ, कहाँ, जा रहे हो
ये बताओ, कहाँ, जा रहे हो


(Bade ban than ke nikle bihari
Bade ban than ke nikle bihari
Ye batao, kahaan, ja rahe ho
Ye batao, kahaan, ja rahe ho)

॥ अंतरा १ ॥

तेरे भक्तों ने तुम को बुलाया
किन भक्तों के घर जा रहे हो
बड़े बन ठन के निकले...


Tere bhaktone tujhe bulaya
Kin bhakton ke ghar ja rahe ho
Bade ban than ke nikle...

॥ अंतरा २ ॥

तुम हाथों में मेहंदी लगाए,
और अधरो पे मुरली सजाए
अब मुरली बजा के कन्हईया
ये बताओ कहाँ जा रहे हो
बड़े बन ठन के निकले...


Tum haathon mein mehndi lagaye,
Aur adharon pe murali sajaye
Ab murali baja ke kanhaiya
Ye batao kahaan ja rahe ho
Bade ban than ke nikle...

॥ अंतरा ३ ॥

तेरे पैरों में घुंघरू बंधाए,
और छन-छन ये घुंघरू बजाए
तुम रास रचाने कन्हईया
ये बताओ कहाँ जा रहे हो
बड़े बन ठन के निकले...


Tere pairon mein ghunghru bandhaye,
Aur chhan-chhan ye ghunghru bajaye
Tum raas rachane kanhaiya
Ye batao kahaan ja rahe ho
Bade ban than ke nikle...

॥ अंतरा ४ ॥

पीला पटका कमर पे बंधाए,
मोर मुकुट को सिर पे सजाए
काली कम्बली को कांधे पे सजा के
ये बताओ कहाँ जा रहे हो
बड़े बन ठन के निकले...


Peela patka kamar pe bandhaye,
Mor mukut ko sir pe sajaye
Kaali kambli ko kaandhe pe saja ke
Ye batao kahaan ja rahe ho
Bade ban than ke nikle...

॥ अंतरा ५ (समापन) ॥

शिव मन्दिर मे कीर्तन रचाया,
नाम ले ले के तुझको बुलाया
अपने भक्तों संग रास रचाने
मेरी राधे, वहाँ जा रहा हूँ
बड़े बन ठन के निकले...


Shiv mandir mein kirtan rachaya,
Naam le le ke tujhko bulaya
Apne bhaktom sang raas rachane
Meri Radhe, vahaan ja raha hoon
Bade ban than ke nikle...

✍️ रचनाकार :- परम्परागत, लोक संगीत

🔍 भजन का अर्थ (लाइन-बाय-लाइन व्याख्या)

  • बड़े बन ठन के निकले बिहारी: कृष्ण (बिहारी) बड़े सज-धज कर, पूरी शान से निकले हैं। "बन ठन" का अर्थ है सज-संवरकर, आकर्षक पोशाक और श्रृंगार में।
  • ये बताओ, कहाँ जा रहे हो: भक्त बार-बार पूछता है कि इतनी सजधज कर आप कहाँ जा रहे हैं? यह प्रश्न उत्सुकता और प्रेम का प्रतीक है।
  • तेरे भक्तों ने तुम को बुलाया, किन भक्तों के घर जा रहे हो: भक्त जानना चाहता है कि कौन से भक्त इतने सौभाग्यशाली हैं कि उन्होंने स्वयं कृष्ण को आमंत्रित किया है।
  • तुम हाथों में मेहंदी लगाए, और अधरो पे मुरली सजाए: कृष्ण के हाथों में मेहंदी (जैसे कोई दुल्हन लगाती है) – यह अद्भुत संकेत है कि वह किसी महोत्सव में जा रहे हैं। मुरली उनके अधरों पर सुशोभित है।
  • अब मुरली बजा के कन्हईया, ये बताओ कहाँ जा रहे हो: भक्त कहता है कि आपने मुरली बजा दी, अब बताइए कहाँ चल रहे हैं? मुरली की ध्वनि ही भक्तों को बुलाने का संकेत है।
  • तेरे पैरों में घुंघरू बंधाए, और छन-छन ये घुंघरू बजाए: कृष्ण के पैरों में घुंघरू बंधे हैं, जो नृत्य का संकेत देते हैं। "छन-छन" उनकी आवाज़ है।
  • तुम रास रचाने कन्हईया: भक्त समझ जाता है कि कृष्ण रास रचाने जा रहे हैं – प्रेम का दिव्य नृत्य।
  • पीला पटका कमर पे बंधाए, मोर मुकुट सिर पे सजाए, काली कम्बली कांधे पे: यह कृष्ण की पूरी पोशाक का वर्णन है – पीताम्बर (पीला पटका), मोरपंख का मुकुट, और कंधे पर काली कमली (चादर या दुपट्टा)।
  • शिव मन्दिर में कीर्तन रचाया, नाम ले ले के तुझको बुलाया: भक्तों ने शिव मंदिर में कीर्तन का आयोजन किया है और बार-बार कृष्ण का नाम लेकर उन्हें आमंत्रित किया है।
  • अपने भक्तों संग रास रचाने, मेरी राधे, वहाँ जा रहा हूँ: यह उत्तर स्वयं कृष्ण का है – वह कहते हैं, "मेरी प्रिय राधे, मैं अपने भक्तों के साथ रास रचाने वहाँ जा रहा हूँ।" यह रेखा भजन का केंद्र है, जहाँ कृष्ण स्वयं राधा को संबोधित करते हैं।

📖 भजन की प्रेरणा और पृष्ठभूमि

इस भजन की रचना किसी एक कवि द्वारा नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश और ब्रज क्षेत्र की लोक परंपराओं से हुई है। कहा जाता है कि एक बार वृंदावन के एक गरीब भक्त को स्वप्न में कृष्ण दर्शन देते हैं। वह भक्त प्रतिदिन मंदिर जाता था और कृष्ण से प्रार्थना करता था – "प्रभु, आप एक बार मेरे घर पधारो, मैं आपको अपनी आँखों से देखना चाहता हूँ।" कृष्ण ने उसकी भक्ति देखी और एक दिन वास्तव में सज-धज कर उसके घर आ पहुँचे। भक्त ने उन्हें देखा तो अवाक् रह गया। उसने पूछा – "बड़े बन ठन के निकले हो, कहाँ जा रहे हो?" कृष्ण ने मुस्कुराकर उत्तर दिया – "तेरे बुलावे पर, तेरे ही घर आया हूँ।" तब से यह भजन भक्तों के बीच गाया जाने लगा। धीरे-धीरे इसमें और पंक्तियाँ जुड़ती गईं, और यह एक लोकप्रिय कीर्तन बन गया।

🌟 एक प्राचीन कथा: सज-धज कर आए कान्हा

एक बार ब्रज में बड़ा भयंकर सूखा पड़ा। सबके घर अनाज समाप्त हो गए। एक वृद्ध ग्वालिन ने ठान लिया कि वह कृष्ण को अपने घर भोजन पर आमंत्रित करेगी। उसके पास कुछ नहीं था, सिर्फ श्रद्धा। उसने अपने झोंपड़े को झाड़ा, फूल बिछाए, और मन ही मन कृष्ण को पुकारा। कुछ ही देर में सज-धज कर कृष्ण वहाँ आ पहुँचे। उनके पीताम्बर, मोरमुकुट, मेहंदी लगे हाथ, और कमर में बंधी पटका देख वह बुढ़िया दंग रह गई। उसने पूछा – "कन्हई, इतना सजकर कहाँ चले हो?" कृष्ण ने कहा – "मैया, तुम्हारे बुलावे पर तुम्हारे घर आया हूँ।" बुढ़िया रो पड़ी। उसने मन ही मन सोचा – "धन्य हैं वे भक्त, जिनके घर ऐसे सज-धज कर कान्हा आते हैं।"

नैतिक शिक्षा: सच्ची भक्ति और प्रेम के आगे सभी बाधाएँ समाप्त हो जाती हैं। कृष्ण को किसी वैभव की आवश्यकता नहीं, बस हृदय की पुकार चाहिए। जब भक्त सच्चे मन से बुलाता है, तो कृष्ण सज-धज कर स्वयं आते हैं।

🤝 इस भजन का वास्तविक जीवन में महत्व

हम सभी के जीवन में कभी न कभी ऐसा अवसर आता है जब हम किसी प्रिय व्यक्ति (माता-पिता, गुरु, या ईश्वर) के आगमन के लिए पूरी तैयारी करते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि जिस प्रकार भक्त ने कृष्ण के आगमन के लिए अपने मन को सजाया, उसी प्रकार हमें भी जीवन में सकारात्मक ऊर्जा के आगमन के लिए तैयार रहना चाहिए। हमारे घरों में जब कोई शुभ कार्य होता है, तो हम सजावट करते हैं, फूल बिछाते हैं – ठीक उसी प्रकार जैसे इस भजन में कृष्ण के रास्ते में फूल बिछाए गए हैं। यह भजन यह भी बताता है कि हमें हर पल यह पूछते रहना चाहिए कि "हे कान्हा, तू कहाँ जा रहा है?" – अर्थात हमें अपने लक्ष्य और अपने ईश्वर के प्रति सजग रहना चाहिए।

🕉️ कृष्ण श्लोक एवं सज-धज का महत्व

॥ श्रीकृष्ण स्तुति ॥

वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम् ।
देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥

अर्थ: वसुदेव के पुत्र, कंस और चाणूर का वध करने वाले, देवकी के परमानंद, जगद्गुरु श्रीकृष्ण को मैं नमस्कार करता हूँ।


श्रीकृष्ण की वेशभूषा – पीताम्बर, मोरमुकुट, वैजयंती माला, कमर में पीला पटका, और कंधे पर काली कमली – का गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है। पीला रंग ज्ञान और शांति का, मोरमुकुट सृजन और नृत्य का, घुंघरू आनंद की ध्वनि का प्रतीक है। इस भजन में जब भक्त इन सबका वर्णन करता है, तो वह केवल बाहरी साज-सज्जा का नहीं, बल्कि आंतरिक दिव्यता का आह्वान कर रहा होता है। कृष्ण जब सज-धज कर निकलते हैं, तो यह संकेत है कि वह अपने भक्तों को विशेष कृपा प्रदान करने जा रहे हैं।

✨ इस भजन का आध्यात्मिक संदेश

इस भजन के माध्यम से हमें अनेक आध्यात्मिक शिक्षाएँ मिलती हैं:

  • सौंदर्य की उपासना: कृष्ण सज-धज कर निकलते हैं – इसका अर्थ है कि ईश्वर सौंदर्य और कला से परिपूर्ण है। भक्ति में आकर्षण और शृंगार का स्थान है।
  • जिज्ञासा और प्रेम: भक्त का बार-बार पूछना "कहाँ जा रहे हो" यह दर्शाता है कि प्रेम में जिज्ञासा होती है, रुकावट होती है, लेकिन वही प्रेम को और गहरा बनाती है।
  • समर्पण: अंत में कृष्ण स्वयं उत्तर देते हैं – "मेरी राधे, वहाँ जा रहा हूँ।" यह बताता है कि जब भक्त पूरी तरह समर्पित हो जाता है, तो ईश्वर अपने रहस्य खोल देते हैं।
  • सामूहिक कीर्तन का महत्व: कीर्तन और संगीत के माध्यम से भगवान को बुलाना सबसे प्रभावी साधन है। शिव मंदिर में कीर्तन का उल्लेख इसी ओर संकेत करता है।

🙏 हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे । हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ॥

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: इस भजन के रचयिता कौन हैं?

उत्तर: यह भजन पारंपरिक लोक भजन है, जो ब्रज क्षेत्र में सदियों से गाया जाता रहा है। इसका कोई एकल रचयिता नहीं है, बल्कि यह सामूहिक लोक धरोहर है।

प्रश्न 2: इस भजन को कब और कैसे गाया जाता है?

उत्तर: यह भजन प्रायः जन्माष्टमी, होली, और अन्य कृष्ण भक्ति अवसरों पर कीर्तन मंडलियों द्वारा गाया जाता है। इसे भजन संध्या, रासलीला, और मंदिरों में भी गाया जाता है।

प्रश्न 3: "बड़े बन ठन के" का क्या अर्थ है?

उत्तर: "बन ठन के" का अर्थ है सज-धज कर, श्रृंगार करके, पूरी तैयारी के साथ। यह कृष्ण के आकर्षक वेशभूषा और दिव्य स्वरूप को दर्शाता है।

प्रश्न 4: क्या इस भजन का कोई गहरा दार्शनिक अर्थ है?

उत्तर: हाँ, यह भजन आत्मा (राधा/भक्त) और परमात्मा (कृष्ण) के मिलन की उत्कंठा को दर्शाता है। कृष्ण का सजकर निकलना यह बताता है कि ईश्वर स्वयं भक्त के बुलावे पर दौड़ा चला आता है।

प्रश्न 5: क्या मैं इस भजन को अपने घर पर गा सकता हूँ?

उत्तर: बिल्कुल। यह भजन किसी भी समय, किसी भी स्थान पर गाया जा सकता है। विशेषकर जब आप कृष्ण की पूजा कर रहे हों या कोई भक्ति सभा आयोजित कर रहे हों, यह भजन वातावरण को भक्तिमय बना देता है।

🔗 संबंधित भजन (Related Bhajans)

॥ इति श्रीकृष्ण भजनम् ॥
॥ राधे राधे, जय श्री कृष्ण ।। आप सब पर श्रीकृष्ण की कृपा बनी रहे ।।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 10 Aug 2026

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