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Rang Panchami

राजस्थान और छत्तीसगढ़ में रंग पंचमी के अनोखे रंग-रिवाज (Unique Traditions of Rang Panchami in Rajasthan and Chhattisgarh)

200 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
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🎨 राजस्थान और छत्तीसगढ़ में रंग पंचमी

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

पराक्रम, आस्था और अनोखी परंपराओं का संगम

बारूद की होली से लेकर लट्ठमार होली तक

🏵️ दो राज्य, दो अलग अंदाज

रंग पंचमी का पर्व पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है, लेकिन राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इसकी परंपराएं सबसे अनूठी और रोमांचक हैं । जहां राजस्थान में यह पर्व राजपूती शौर्य और वीरता के रंग में रंगा है, वहीं छत्तीसगढ़ में यह आदिवासी संस्कृति और देवी-देवताओं की आस्था से जुड़ा हुआ है ।

आइए जानते हैं इन दोनों राज्यों की उन अनोखी परंपराओं के बारे में जो रंग पंचमी को एक अलग ही आयाम देती हैं - चाहे वह राजस्थान के मेनार गांव की बारूद की होली हो या छत्तीसगढ़ के पंतोरा गांव की लट्ठमार होली।

🏜️ राजस्थान : शौर्य और भक्ति के अनोखे रंग

राजस्थान में होली केवल अबीर-गुलाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रदेश की सतरंगी लोक-संस्कृति, ऐतिहासिक मान्यताओं और अनूठी परंपराओं का जीवंत उदाहरण है । यहां रंग पंचमी पर कई ऐसी परंपराएं निभाई जाती हैं जो सदियों पुरानी हैं और आज भी उसी उत्साह के साथ जीवित हैं।

🔫 मेनार गांव की बारूद की होली

राजस्थान के मेनार गांव में रंग पंचमी पर "बारूद की होली" खेली जाती है, जो पिछले सवा 400 वर्षों से चली आ रही है । यह परंपरा मुगलों पर विजय के जश्न के रूप में शुरू हुई थी।

मेनार ब्राह्मणों का गांव है, लेकिन यहां के मेनारिया ब्राह्मणों को "ब्रह्मा क्षत्रिय" कहा जाता है। होलिका दहन के बाद दूसरे दिन यानी रंग पंचमी के आसपास यहां बारूद की होली खेली जाती है ।

इस दिन पूरे गांव में युद्ध जैसा माहौल बन जाता है। लोग हाथों में तलवारें और बंदूकें लेकर सड़कों पर उतरते हैं। तोप से गोले दागे जाते हैं और हवाई फायर किए जाते हैं। पटाखों की गर्जना के बीच तलवारों की खनखनाहट से ओंकारेश्वर चौक का माहौल युद्ध के मैदान जैसा बन जाता है ।

क्षत्रिय योद्धाओं की तरह सजे-धजे पुरुष ढोल की थाप पर एक हाथ में खांडा और दूसरे में तलवार लेकर "गेर" नृत्य करते हैं। रात करीब 10 बजे से पांचों रास्तों से गांव के मध्य पहाड़ी पर ओंकारेश्वर चौराहे की तरफ बंदूकें दागते हुए मशालों के साथ आगे बढ़ते हैं ।

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बारूद की होली
मेनार, राजस्थान

सवा 400 वर्ष पुरानी परंपरा

🌴 ओबरी कस्बे का फूतरा उत्सव

डूंगरपुर जिले के ओबरी कस्बे में रंग पंचमी पर एक अनोखी और साहसिक परंपरा निभाई जाती है - "फूतरा उतारने" का खेल ।

इस परंपरा के तहत गांव के युवा दो दलों - रक्षक और आक्रमण - में बंटकर फूतरा उतारने के खेल में हिस्सा लेते हैं। 25 फीट ऊंचे खजूर के पेड़ पर सफेद कपड़े (फूतरा) को बांधा जाता है ।

रक्षक दल का काम फूतरे को बचाना होता है और आक्रमण दल को किसी भी हालत में इसे उतारना होता है। खेल के दौरान दोनों दलों के बीच जोरदार संघर्ष होता है। आक्रमण दल के युवा बार-बार पेड़ पर चढ़ने की कोशिश करते हैं, लेकिन रक्षक दल उन्हें नीचे खींच लेता है ।

करीब डेढ़ घंटे तक चलने वाले इस संघर्ष में जो भी युवा अंततः फूतरा उतारने में सफल हो जाता है, उसे "साहसी पुरुष" की उपाधि से सम्मानित किया जाता है और उसके सिर पर विजय का प्रतीक साफा बांधा जाता है । इस साल 150 से अधिक युवाओं ने इस खेल में भाग लिया ।

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फूतरा उत्सव
ओबरी, डूंगरपुर

🕉️ मेवाड़ की धार्मिक परंपराएं

मेवाड़ के प्रसिद्ध कृष्णधाम चारभुजानाथ मंदिर में रंग पंचमी पर ठाकुरजी को चांदी की पिचकारी से स्वर्ण-रजत के कलश में रंग भरकर होली खेलते हुए सजाया जाता है। इस दिन ठाकुरजी को 56 भोग अर्पित किए जाते हैं और मंदिर के शिखर पर नी ध्वजा चढ़ाई जाती है ।

🤝 टोंक में साम्प्रदायिक सौहार्द

टोंक जिले के नासिरदा गांव में रंग पंचमी पर हिंदू और मुस्लिम एक साथ होली खेलते हैं। यहां मुस्लिम भाई भी रंग-गुलाल उड़ाते हैं और दोनों समुदाय के लोग एक-दूसरे को गले लगाकर त्योहार मनाते हैं ।

यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है। रंग पंचमी के दिन सुबह से ही युवा ढोल-चंग की थाप पर कस्बे के माणक चौक और जलेबी चौक पर नाचते हैं और सभी एक साथ मिलकर उत्सव मनाते हैं ।

🗓️ 250 साल पुरानी परंपरा : मित्रपुरा

सवाई माधोपुर जिले के मित्रपुरा गांव में पिछले 250 सालों से रंग पंचमी पर ही धुलंडी खेलने की अनूठी परंपरा है। यहां होली के दूसरे दिन के बजाय रंग पंचमी के दिन राम द्वारा में धुलंडी खेली जाती है ।

🌳 छत्तीसगढ़ : देवी-देवताओं के रंग

छत्तीसगढ़ में रंग पंचमी का त्योहार पारंपरिक उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यहां के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में इसे एक सांस्कृतिक पर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसमें फाग गाने और रंग खेलने की परंपरा है ।

🪄 पंतोरा की डंगाही होली (लट्ठमार होली)

जांजगीर-चांपा जिले के पंतोरा गांव में रंग पंचमी पर "डंगाही होली" या लट्ठमार होली खेली जाती है, जो उत्तर प्रदेश के बरसाने की लट्ठमार होली की तर्ज पर मनाई जाती है । यह परंपरा कई सालों से चली आ रही है।

रंग पंचमी के एक दिन पूर्व गांव के लोग मड़वारानी देवी के जंगल से विशेष प्रकार की बांस की छड़ी लाते हैं। इस छड़ी को केवल एक ही कुल्हाड़ी से काटा जाता है और इसे बेहद पवित्र माना जाता है ।

अगले दिन रंग पंचमी के अवसर पर गांव के बैगा समाज के पुजारी इस छड़ी की विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं। पूजा के उपरांत कुंवारी कन्याएं इस छड़ी को मां भवानी की प्रतिमा से पांच बार स्पर्श कराती हैं, जिससे यह देवी का आशीर्वाद प्राप्त कर लेती है ।

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डंगाही होली
पंतोरा, छत्तीसगढ़

इसके बाद मंदिर परिसर में उपस्थित ग्रामीणों पर कुंवारी कन्याएं इस छड़ी से प्रहार करती हैं, जिसे लोग सहर्ष स्वीकार करते हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि इस छड़ी की मार खाने से व्यक्ति के रोग और बीमारियां दूर हो जाती हैं और वह स्वस्थ रहता है ।

स्थानीय नागरिक रामनाथ के अनुसार, "हम कन्याओं से छड़ी खाकर रोग मुक्त होने का आशीष लेते हैं" । ग्रामीण महिला महेश्वरी देवांगन कहती हैं, "भवानी मां के आशीर्वाद रुपी छड़ी खाने से गांव में कभी रोग नहीं आता है" ।

बैगा पुजारी विपत राम बताते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत कब हुई यह ज्ञात नहीं है, लेकिन काफी अरसे से इसे निभाया जा रहा है। माता भवानी और मड़वा रानी मां की पूजा से गांव में किसी तरह की बीमारी नहीं आती है ।

इस अनोखी परंपरा के चलते पंतोरा गांव की होली पूरे छत्तीसगढ़ में प्रसिद्ध है और इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं ।

🙏 पीथमपुर का बाबा कलेश्वरनाथ मेला

जांजगीर-चांपा जिले के पीथमपुर गांव में हंसदेव नदी के किनारे स्थित बाबा कलेश्वरनाथ मंदिर में रंग पंचमी के अवसर पर सात दिवसीय मेले का आयोजन होता है । यह परंपरा काफी पुरानी है, हालांकि यह कितनी पुरानी है इसका जवाब किसी को नहीं मिला ।

रंग पंचमी के दिन बाबा कलेश्वरनाथ की चांदी की पालकी में शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसे "बाबा की बारात" के रूप में जाना जाता है । इस बारात में देशभर के नागा और वैष्णव संप्रदाय के साधु विशेष रूप से शामिल होते हैं। साधु लोग तलवारबाजी, लट्ठबाजी और तमाम तरह के करतब दिखाते हैं, जिसे देख लोग रोमांचित हो उठते हैं ।

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बाबा की बारात
पीथमपुर, छत्तीसगढ़

इस अवसर पर बाबा कलेश्वरनाथ पंचमुखी स्वरूप में भक्तों को दर्शन देते हैं । मान्यता है कि इस दिन बाबा के दर्शन मात्र से निसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है और पेट संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है । यही कारण है कि दूर-दूर से श्रद्धालु यहां बड़ी संख्या में आते हैं ।

बारात निकालने के साथ ही यहां से 15 दिन के मेले की शुरुआत हो जाती है ।

🎋 छड़ीमार होली की अन्य परंपराएं

छत्तीसगढ़ में रंग पंचमी को "धूल पंचमी" भी कहा जाता है। इस दिन कुंवारी लड़कियां पारंपरिक मांदल (स्थानीय ढोल) और नगाड़ों के साथ गांव में टोली बनाकर निकलती हैं और सभी पुरुषों को छड़ी से मारती हुई होली खेलती हैं। इसके उत्तर में पुरुष उन पर रंग-गुलाल की वर्षा करते हैं ।

📊 एक नजर : दो राज्यों की अनोखी परंपराएं

राज्य स्थान परंपरा विशेषता
राजस्थान मेनार बारूद की होली सवा 400 साल पुरानी परंपरा, तलवारें और बंदूकें, गेर नृत्य
ओबरी (डूंगरपुर) फूतरा उत्सव 25 फीट ऊंचे खजूर के पेड़ से सफेद कपड़ा उतारने की प्रतियोगिता
मित्रपुरा (सवाई माधोपुर) रंग पंचमी पर धुलंडी 250 साल पुरानी परंपरा, होली के दूसरे दिन के बजाय रंग पंचमी पर खेली जाती है
चारभुजानाथ मंदिर (मेवाड़) चांदी की पिचकारी से होली ठाकुरजी को चांदी की पिचकारी से रंग डाला जाता है, 56 भोग अर्पित
पुष्कर राजा की सवारी किसी एक व्यक्ति को राजा का रूप देकर सवारी निकाली जाती है
नासिरदा (टोंक) साम्प्रदायिक सौहार्द हिंदू-मुस्लिम एक साथ होली खेलते हैं
छत्तीसगढ़ पंतोरा (जांजगीर-चांपा) डंगाही होली / लट्ठमार होली कुंवारी कन्याएं अभिमंत्रित बांस की छड़ी से प्रहार करती हैं, रोग दूर होने की मान्यता
पीथमपुर (जांजगीर-चांपा) बाबा कलेश्वरनाथ की बारात चांदी की पालकी में शोभायात्रा, नागा साधुओं का शौर्य प्रदर्शन, निसंतान दंपतियों के लिए विशेष मान्यता
पंतोरा छड़ीमार होली कुंवारी कन्याएं देवी-देवताओं पर भी छड़ी बरसाती हैं

✨ इन परंपराओं के पीछे की मान्यताएं

🏜️ राजस्थान की मान्यताएं

  • मेनार की बारूद होली : यह मुगलों पर विजय के जश्न का प्रतीक है और राजपूती शौर्य की याद दिलाती है ।
  • फूतरा उत्सव : इस खेल को जीतने वाले को "साहसी पुरुष" की उपाधि दी जाती है, जो वीरता का प्रतीक है ।
  • मित्रपुरा परंपरा : 250 साल पहले गांव के बुजुर्गों ने यह परंपरा शुरू की थी, जो आज भी निभाई जा रही है ।

🌳 छत्तीसगढ़ की मान्यताएं

  • डंगाही होली : मान्यता है कि इस छड़ी की मार खाने से बीमारियां दूर होती हैं और गांव में कभी कोई गंभीर बीमारी नहीं आती ।
  • बाबा कलेश्वरनाथ दर्शन : निसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है और पेट के रोग दूर होते हैं ।
  • पूजा विधि : एक ही कुल्हाड़ी में कटी बांस की छड़ी को पवित्र माना जाता है और उसकी विधिवत पूजा की जाती है ।

❓ राजस्थान और छत्तीसगढ़ की रंग पंचमी से जुड़े सवाल

प्रश्न : राजस्थान के मेनार गांव में बारूद की होली क्यों खेली जाती है?

उत्तर : मेनार गांव में बारूद की होली मुगलों पर विजय के जश्न के रूप में शुरू हुई थी। यह परंपरा सवा 400 वर्षों से चली आ रही है और राजपूती शौर्य का प्रतीक है ।

प्रश्न : छत्तीसगढ़ के पंतोरा गांव की डंगाही होली में छड़ी क्यों मारी जाती है?

उत्तर : मान्यता है कि अभिमंत्रित बांस की छड़ी की मार खाने से व्यक्ति के रोग और बीमारियां दूर हो जाती हैं। ग्रामीण इसे मां भवानी का आशीर्वाद मानते हैं ।

प्रश्न : राजस्थान के ओबरी कस्बे का फूतरा उत्सव क्या है?

उत्तर : यह रंग पंचमी पर आयोजित होने वाला एक साहसिक खेल है, जिसमें युवा दो दलों में बंटकर 25 फीट ऊंचे खजूर के पेड़ पर बंधे सफेद कपड़े (फूतरा) को उतारने की प्रतिस्पर्धा करते हैं। जीतने वाले को "साहसी पुरुष" की उपाधि मिलती है ।

प्रश्न : पीथमपुर के बाबा कलेश्वरनाथ मंदिर की क्या मान्यता है?

उत्तर : रंग पंचमी के दिन बाबा कलेश्वरनाथ के दर्शन मात्र से निसंतान दंपतियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है और पेट संबंधी रोगों से मुक्ति मिलती है ।

प्रश्न : राजस्थान के मित्रपुरा गांव की विशेष परंपरा क्या है?

उत्तर : यहां पिछले 250 सालों से होली के दूसरे दिन के बजाय रंग पंचमी पर धुलंडी खेली जाती है। यह एक अनूठी परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है ।

🌈 दो राज्य, अनेक रंग

राजस्थान और छत्तीसगढ़ की ये अनूठी परंपराएं बताती हैं कि रंग पंचमी केवल रंग खेलने का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की विविधता और गहराई का जीवंत प्रमाण है।

जहां राजस्थान में यह पर्व शौर्य और वीरता के रंग में रंगा है, वहीं छत्तीसगढ़ में यह आस्था और विश्वास का प्रतीक है। चाहे वह मेनार की बारूद की होली हो, ओबरी का फूतरा उत्सव हो, पंतोरा की डंगाही होली हो या पीथमपुर की बाबा की बारात - ये सभी परंपराएं हमारी सांस्कृतिक धरोहर का अमूल्य हिस्सा हैं।

सबसे सुखद बात यह है कि आधुनिकता के इस दौर में भी ये परंपराएं पूरी शिद्दत से निभाई जा रही हैं और आने वाली पीढ़ियों को भारतीय संस्कृति की जड़ों से जोड़े हुए हैं ।

🙏 रंग पंचमी की हार्दिक शुभकामनाएं ।। राजस्थान और छत्तीसगढ़ की अनूठी परंपराओं का उत्सव जारी रहे ।।

🏜️ राजस्थान 🌳 छत्तीसगढ़
रंग पंचमी के अनोखे रंग-रिवाज
श्रेणियां: Rang Panchami

सनातन संस्कृति एवं प्रामाणिक संपादन

यह भजन/आरती लिरिक्स भक्तिलोक संपादकीय मंडल द्वारा उपलब्ध प्रामाणिक स्रोतों के संदर्भ में समीक्षा एवं संपादन के बाद प्रकाशित किया गया है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 10 Aug 2026

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