भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

होली(Holi Khele Re Kanhaiya)

होली खेले रे कन्हैया भजन के लिरिक्स हिंदी में पढ़ें। ब्रज की होली और कृष्ण भक्ति से जुड़े इस लोकप्रिय भजन का आनंद लें Bhaktilok पर।

प्रस्तावना एवं परिचय

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें
सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा शुभ मुहूर्त">दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।
🙏 होली खेले रे कन्हैया – होली भजन

(Holi Khele Re Kanhaiya) – Gokul Ki Holi

हिल मिल गाये गोपी गोपाला, रंग लगा के हुआ मतवाला ॥

📝 भजन विवरण

🎤 गायक/लेखक: पारम्परिक
🏷️ श्रेणी: होली भजन, कृष्ण भजन
📍 स्थान: गोकुल, ब्रज

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

॥ स्थायी ॥

होली खेले गोकुल में कन्हीया होली खेले रे कन्हीया,
हिल मिल गाये गोपी गोपाला
रंग लगा के हुआ मतवाला
होली खेले गोकुल में कन्हीया होली खेले रे कन्हीया,

॥ अंतरा १ ॥

राधा संग रास रचाए बड़ा रंगीला कन्हिया,
रंग लगाये गुलाल उडाये सब गोपियाँ को पास बुलाये,
राधा संग रास रचाए बड़ा रंगीला कन्हिया,
होली खेले गोकुल में कन्हीया होली खेले रे कन्हीया,

॥ अंतरा २ ॥

कान्हा मेरा रंगीला सुनो गोकुल के गोपाला
बरस बरस के होली आवे सब के मन को कान्हा रिजावे
रंगों में डूबा कन्हिया सब पर रंग डाले कन्हिया
हिल मिल गए गोपी गोपाला रंग लगा के हुआ मतवाला
होली खेले गोकुल में कन्हीया होली खेले रे कन्हीया,

🎵 गोकुल की होली भजन

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह सरल और भावपूर्ण होली भजन गोकुल में कन्हैया (कृष्ण) द्वारा खेली जा रही होली का वर्णन करता है। "होली खेले गोकुल में कन्हीया" – कन्हैया गोकुल में होली खेल रहे हैं।

"हिल मिल गाये गोपी गोपाला, रंग लगा के हुआ मतवाला" – गोपी-ग्वाले सब मिलकर गा रहे हैं, और रंग लगाकर वे मतवाले (मस्त) हो गए हैं।

"राधा संग रास रचाए बड़ा रंगीला कन्हिया" – कन्हैया राधा के साथ रास रचा रहे हैं, वे बड़े रंगीले हैं। वे रंग लगाते हैं, गुलाल उड़ाते हैं, और सब गोपियों को पास बुलाते हैं।

"कान्हा मेरा रंगीला सुनो गोकुल के गोपाला" – मेरे कान्हा रंगीले हैं, हे गोकुल के गोपाल सुनो। हर साल होली आती है और कान्हा सबके मन को रिझाते हैं।

"रंगों में डूबा कन्हिया सब पर रंग डाले कन्हिया" – कन्हैया रंगों में डूबे हुए हैं और सब पर रंग डाल रहे हैं। गोपी-ग्वाले हिल-मिल गए हैं, रंग लगाकर मतवाले हो गए हैं।

यह भजन गोकुल की होली के सरल और उल्लासपूर्ण वातावरण को दर्शाता है, जहाँ कृष्ण राधा और गोपियों-ग्वालों के साथ रंगों में सराबोर होकर होली का आनंद ले रहे हैं।

📍 गोकुल की होली

गोकुल वह स्थान है जहाँ कृष्ण ने अपना बचपन बिताया। यह मथुरा के निकट स्थित है। गोकुल की होली की अपनी विशेष परंपरा है, जहाँ कृष्ण और ग्वाल-बाल मिलकर होली खेलते थे।

इस भजन में वर्णित "राधा संग रास रचाए" उस दिव्य रासलीला की ओर संकेत करता है जो कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ की थी। हालाँकि गोकुल मुख्यतः बाल कृष्ण की लीलाओं का स्थान है, यहाँ भी राधा-कृष्ण के मिलन के प्रसंग आते हैं।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

🎭 मतवाला कन्हिया

"रंग लगा के हुआ मतवाला" – रंग लगाकर कन्हैया मस्त हो गए। यह उस दिव्य मस्ती को दर्शाता है जो कृष्ण के सान्निध्य में होती है।

💞 सबको रिझाने वाला

"बरस बरस के होली आवे सब के मन को कान्हा रिजावे" – हर साल होली आती है और कान्हा सबके मन को रिझाते हैं। यह कृष्ण के सर्व-प्रिय स्वरूप को दर्शाता है।

🎯 संदेश : गोकुल में कन्हैया की होली देखते ही बनती है। राधा संग रास, गोपियों संग रंग-गुलाल, और सबका मतवाला हो जाना – यही तो होली का असली आनंद है। हर साल आने वाली होली में कान्हा सबके मन को रिझाते हैं और सब पर रंग डालते हैं।

॥ होली खेले गोकुल में कन्हीया ॥
॥ हिल मिल गाये गोपी गोपाला, रंग लगा के हुआ मतवाला ॥
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "होली खेले रे कन्हैया – होली भजन (Holi Khele Re Kanhaiya) | Gokul Ki Holi" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 11 Oct 2026

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