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होली खेले रे कन्हैया – होली भजन (Holi Khele Re Kanhaiya) | Gokul Ki Holi

158 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Chandan Sah | 2 मिनट पठन समय
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सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

🙏 होली खेले रे कन्हैया – होली भजन

(Holi Khele Re Kanhaiya) – Gokul Ki Holi

हिल मिल गाये गोपी गोपाला, रंग लगा के हुआ मतवाला ॥

📝 भजन विवरण

🎤 गायक/लेखक: पारम्परिक
🏷️ श्रेणी: होली भजन, कृष्ण भजन
📍 स्थान: गोकुल, ब्रज

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

॥ स्थायी ॥

होली खेले गोकुल में कन्हीया होली खेले रे कन्हीया,
हिल मिल गाये गोपी गोपाला
रंग लगा के हुआ मतवाला
होली खेले गोकुल में कन्हीया होली खेले रे कन्हीया,

॥ अंतरा १ ॥

राधा संग रास रचाए बड़ा रंगीला कन्हिया,
रंग लगाये गुलाल उडाये सब गोपियाँ को पास बुलाये,
राधा संग रास रचाए बड़ा रंगीला कन्हिया,
होली खेले गोकुल में कन्हीया होली खेले रे कन्हीया,

॥ अंतरा २ ॥

कान्हा मेरा रंगीला सुनो गोकुल के गोपाला
बरस बरस के होली आवे सब के मन को कान्हा रिजावे
रंगों में डूबा कन्हिया सब पर रंग डाले कन्हिया
हिल मिल गए गोपी गोपाला रंग लगा के हुआ मतवाला
होली खेले गोकुल में कन्हीया होली खेले रे कन्हीया,

🎵 गोकुल की होली भजन

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह सरल और भावपूर्ण होली भजन गोकुल में कन्हैया (कृष्ण) द्वारा खेली जा रही होली का वर्णन करता है। "होली खेले गोकुल में कन्हीया" – कन्हैया गोकुल में होली खेल रहे हैं।

"हिल मिल गाये गोपी गोपाला, रंग लगा के हुआ मतवाला" – गोपी-ग्वाले सब मिलकर गा रहे हैं, और रंग लगाकर वे मतवाले (मस्त) हो गए हैं।

"राधा संग रास रचाए बड़ा रंगीला कन्हिया" – कन्हैया राधा के साथ रास रचा रहे हैं, वे बड़े रंगीले हैं। वे रंग लगाते हैं, गुलाल उड़ाते हैं, और सब गोपियों को पास बुलाते हैं।

"कान्हा मेरा रंगीला सुनो गोकुल के गोपाला" – मेरे कान्हा रंगीले हैं, हे गोकुल के गोपाल सुनो। हर साल होली आती है और कान्हा सबके मन को रिझाते हैं।

"रंगों में डूबा कन्हिया सब पर रंग डाले कन्हिया" – कन्हैया रंगों में डूबे हुए हैं और सब पर रंग डाल रहे हैं। गोपी-ग्वाले हिल-मिल गए हैं, रंग लगाकर मतवाले हो गए हैं।

यह भजन गोकुल की होली के सरल और उल्लासपूर्ण वातावरण को दर्शाता है, जहाँ कृष्ण राधा और गोपियों-ग्वालों के साथ रंगों में सराबोर होकर होली का आनंद ले रहे हैं।

📍 गोकुल की होली

गोकुल वह स्थान है जहाँ कृष्ण ने अपना बचपन बिताया। यह मथुरा के निकट स्थित है। गोकुल की होली की अपनी विशेष परंपरा है, जहाँ कृष्ण और ग्वाल-बाल मिलकर होली खेलते थे।

इस भजन में वर्णित "राधा संग रास रचाए" उस दिव्य रासलीला की ओर संकेत करता है जो कृष्ण ने राधा और गोपियों के साथ की थी। हालाँकि गोकुल मुख्यतः बाल कृष्ण की लीलाओं का स्थान है, यहाँ भी राधा-कृष्ण के मिलन के प्रसंग आते हैं।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

🎭 मतवाला कन्हिया

"रंग लगा के हुआ मतवाला" – रंग लगाकर कन्हैया मस्त हो गए। यह उस दिव्य मस्ती को दर्शाता है जो कृष्ण के सान्निध्य में होती है।

💞 सबको रिझाने वाला

"बरस बरस के होली आवे सब के मन को कान्हा रिजावे" – हर साल होली आती है और कान्हा सबके मन को रिझाते हैं। यह कृष्ण के सर्व-प्रिय स्वरूप को दर्शाता है।

🎯 संदेश : गोकुल में कन्हैया की होली देखते ही बनती है। राधा संग रास, गोपियों संग रंग-गुलाल, और सबका मतवाला हो जाना – यही तो होली का असली आनंद है। हर साल आने वाली होली में कान्हा सबके मन को रिझाते हैं और सब पर रंग डालते हैं।

॥ होली खेले गोकुल में कन्हीया ॥
॥ हिल मिल गाये गोपी गोपाला, रंग लगा के हुआ मतवाला ॥

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 17 Aug 2026

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