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सखी बांके बिहारी दे नाल आंख मेरी लड़ गई - Sakhi Banke Bihari De Naal Akh Meri Lad Gayi Lyrics (Bhajan)

139 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind | 2 मिनट पठन समय
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🙏 सखी बांके बिहारी दे नाल आंख मेरी लड़ गई

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(Sakhi Banke Bihari De Naal Akh Meri Lad Gayi) – भजन

लोक भजन / श्री बांके बिहारी

📝 भजन विवरण

🎤 गायक/लेखक: लोक भजन / परम्परागत
🏷️ श्रेणी: कृष्ण भजन / बांके बिहारी भजन
📍 भाव: आकर्षण, मोह, प्रेम, समर्पण

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी-पंजाबी मिश्रित)

॥ स्थायी ॥

सखी बांके बिहारी दे नाल आंख मेरी लड़ गई
सखी वांके बिहारी दे नाल अख मेरी लड़ गई
इदे नैना दा नशा है कमाल
खुमारी मैनु चढ़ गई, खुमारी मैनु चढ़ गई।।

॥ अंतरा १ ॥

इस जादुगर ऐसा जादु पाया है
इक तकनी च अपना बनाया है
इस बांके दा करके दीदार
सखी मैं तर गई, सखी मैं तर गई।।

॥ अंतरा २ ॥

इदे रूप सदाई मैनु किता है
इदे नैना दा प्याला ऐसा पीता है
इदे नैना नाल नैन हो गए चार
सखी मैं मर गई, सखी मैं मर गई।।

॥ अंतरा ३ ॥

बांके बिहारी दे नाल...
इंदे नैना दा नशा है कमाल
खुमारी मैनु चढ़ गई, खुमारी मैनु चढ़ गई।।

॥ अंतरा ४ ॥

इस बांके विन न गुजारा है
जग देखया मधुप ने सारा है
जग छुट्दा छुटेलख बार
बांके ने बाह फड़ लई, बांके ने बाह फड़ लई।।

सखी बांके बिहारी दे नाल
अख मेरी लड़ गई, अख मेरी लड़ गई
इंदे नैना दा नशा है कमाल
खुमारी मैनु चढ़ गई, खुमारी मैनु चढ़ गई।।

इस बांके दा करके दीदार
सखी मैं तर गई, सखी मैं तर गई
इदे नैना नाल नैन हो गए चार
सखी मैं मर गई, सखी मैं मर गई।।

जग छुट्दा छुटेलख बार
सोहने बाह फड़ लई, सोहने ने बाह फड़ लई।।

✍️ रचनाकार :- लोक भजन, सभी भक्तों को समर्पित

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह भजन श्री बांके बिहारी (कृष्ण) के प्रति भक्त के मन में उठने वाले आकर्षण और मोह का सुंदर वर्णन करता है। “सखी बांके बिहारी दे नाल आंख मेरी लड़ गई” – सखी से कहती है कि बांके बिहारी से मेरी आंख लड़ गई, यानी उनके दर्शन ने मुझे मोह लिया। उनके नैनों का नशा इतना कमाल का है कि खुमारी चढ़ गई।

भक्त उन्हें “जादुगर” कहती है – जिन्होंने एक तकनी (दृष्टि) से ही अपना बना लिया। बांके बिहारी का दीदार पाते ही वह “तर गई” (पार हो गई) – मानो भवसागर से तर गई। उनके रूप ने सदा के लिए मोह लिया, उनकी आँखों का प्याला पीकर वह मदहोश हो गई। नैनों के नैनों से चार होते ही वह “मर गई” – यह मृत्यु नहीं, बल्कि स्वयं को भूल जाने की अवस्था है, प्रेम में समर्पण।

अंत में भक्त कहती है कि बांके बिहारी के बिना गुजारा नहीं होता। सारा संसार छूट सकता है, लेकिन बांके ने उसकी बाह पकड़ ली – यह भगवान की कृपा और रक्षा का प्रतीक है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

आँखों की लड़ाई और खुमारी: यह भजन प्रेम की वह अवस्था दिखाता है जहाँ भक्त भगवान के रूप-सौंदर्य में इतना रम जाता है कि सब कुछ भूल जाता है। “आंख लड़ना” प्रेम के आरंभ का प्रतीक है, और “खुमारी” उस प्रेम की गहराई को दर्शाती है।

दीदार ही मुक्ति: “दीदार” (दर्शन) मात्र से भक्त “तर गई” – यह बताता है कि सच्चे हृदय से किए गए दर्शन ही जीवन को सार्थक कर देते हैं।

बाह पकड़ने का भाव: अंतिम पंक्ति “बांके ने बाह फड़ लई” – भगवान स्वयं भक्त की रक्षा करते हैं। यह शरणागति का भाव है – जब भक्त सब कुछ छोड़ देता है, तो भगवान उसका हाथ पकड़ लेते हैं।

💖 प्रेम और समर्पण का संगम

🎯 संदेश

सच्चा प्रेम आँखों से शुरू होता है और हृदय में समा जाता है। बांके बिहारी के दर्शन मात्र से भक्त परमानंद को प्राप्त हो जाता है।

✨ आस्था का प्रतीक

यह भजन हमें सिखाता है कि भगवान के प्रति समर्पण में ही सच्ची मुक्ति है। जब हम सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वे हमारा हाथ पकड़ लेते हैं।

🙏 ॐ श्री बांके बिहाराय नमः ।। जय श्री कृष्ण ।।

॥ इति लोकभजनम् ॥
॥ बांके बिहारी की आँखों का नशा सब पर छाया रहे ।।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 20 Aug 2026

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