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बधईया बाज रही ( देवउठनी एकादशी )(badhaiya baaj rahi ( devuttni ekadashi lyrics in hindi))

देवउठनी एकादशी पर गाए जाने वाले लोकप्रिय भजन बधईया बाज रही के संपूर्ण लिरिक्स, हिंदी अर्थ और भावार्थ पढ़ें। तुलसी विवाह विशेष संकीर्तन।

भक्ति रस | देवउठनी एकादशी संकीर्तन

बधईया बाज रही (देवउठनी एकादशी) - Badhaiya Baaj Rahi Devuttni Ekadashi Lyrics

प्रस्तुत है देवउठनी एकादशी के पावन अवसर पर गाए जाने वाला अत्यंत लोकप्रिय और भक्तिमय संकीर्तन बधईया बाज रही। इस लेख में आपको इस मधुर भजन के संपूर्ण लिरिक्स, सरल हिंदी अर्थ, भावार्थ और पर्व से जुड़ी विस्तृत जानकारी प्राप्त होगी।

सनातन धर्म में देवउठनी एकादशी (प्रबोधिनी एकादशी) का दिन चातुर्मास की समाप्ति और भगवान विष्णु के योगनिद्रा से जागने का महाउत्सव माना जाता है। इस पावन तिथि पर जगत के पालनहार श्री हरि विष्णु और माता तुलसा का विवाह (तुलसी विवाह) संपन्न होता है, जो कि आध्यात्मिक दृष्टि से जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। 'बधईया बाज रही' भजन इसी मांगलिक और अलौकिक प्रसंग पर आधारित एक सुंदर अभिव्यक्ति है। इस संकीर्तन के प्रत्येक शब्द में उस ब्रह्मांडीय उत्सव का सजीव चित्रण मिलता है जहाँ समस्त देवी-देवता, ऋषि-मुनि और चराचर जगत इस पवित्र विवाह और प्रभु के जागने पर आनंदित होकर बधाइयाँ गा रहे हैं। पारंपरिक धुनों पर आधारित यह भजन सुनने वाले के मन में भक्ति, उल्लास और वैराग्य का एक अद्भुत संगम जगा देता है।

भजन की एक झलक (Mukhda):

"धुनः मथे ते चमकन बाल अज मेरे बनड़े दे
हो रहा मंगलाचार, बधईया बाज रही।
बाज रही बधईया बाज रही-हो रहा मंगलाचार॥"


सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

|| मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन ||

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

धुनः मथे ते चमकन बाल अज मेरे बनड़े दे
हो रहा मंगलाचार, बधईया बाज रही।
बाज रही बधईया बाज रही-हो रहा मंगलाचार॥

देवउठनी एकादशी आई,
कार्तिक-शुक्ल सुकाल-बधईया..

बनी दुल्हनियां तुलसां रानी,
दुल्हा हरि सरकार- बधईया..

देवी देव बने बाराती,
नाच रहा संसार-बधईयां..

बाज रहे बाजे शहिनाईयां,
हो रही जय जयकार-बधईया

घुंगट में वृंदा शरमावे,
हरि को हर्ष आपार-बधईया

कहै ‘‘मधुप’’ यह पावन गाथा,
देती है फल चार-बधईया..

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह अत्यंत पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "बधईया बाज रही" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम, समर्पण और ब्रह्मांडीय आनंद का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन के आरंभ में रचनाकार 'मधुप' जी कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की उस पावन एकादशी का वर्णन करते हैं जब चार महीने की योगनिद्रा के पश्चात भगवान विष्णु जागृत होते हैं। इस जागृति के साथ ही संपूर्ण सृष्टि में एक नई चेतना और ऊर्जा का संचार होता है। इस दिन शालिग्राम रूपी भगवान विष्णु और तुलसी जी (वृंदा) का विवाह रचाया जाता है, जिसे सनातन संस्कृति में अत्यंत शुभ और मोक्षदायक माना गया है।

भजन में आगे कहा गया है कि जब तुलसा रानी दुल्हन बनती हैं और जगत के स्वामी हरि उनके दूल्हा बनते हैं, तब संपूर्ण देवलोक इस उत्सव में सम्मिलित होता है। समस्त देवी-देवता इस बारात के बाराती बनते हैं और आनंद से पूरा संसार झूम उठता है। शहनाइयों की गूंज और जय-जयकार के बीच वृंदा जी का घूंघट में शर्माना और भगवान हरि का अपार हर्षित होना, भक्त और भगवान के बीच के उस मधुर और पवित्र रिश्ते को दर्शाता है जहाँ प्रेम ही सर्वोपरि है। अंत में रचनाकार कहते हैं कि जो भी इस पावन गाथा को स्मरण या श्रवण करता है, उसे जीवन के चारों पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) सहज ही प्राप्त हो जाते हैं।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

  • देवउठनी एकादशी प्रसंग: यह भजन चातुर्मास की समाप्ति और प्रबोधिनी एकादशी के उत्सव को समर्पित है।
  • तुलसी विवाह का उत्सव: इसमें शालिग्राम और तुलसी के विवाह के सजीव और आनंददायक दृश्य का वर्णन है।
  • भक्ति और संगीत का संगम: पारंपरिक लोक धुनों पर आधारित होने के कारण यह महिलाओं और संगीत प्रेमियों के बीच अत्यधिक लोकप्रिय है।
  • चारों पुरुषार्थ की प्राप्ति: भजन श्रवण मात्र से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति का संदेश दिया गया है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन को देवउठनी एकादशी के दिन संध्याकाल में, तुलसी विवाह मंडप के समक्ष, अथवा किसी भी मांगलिक उत्सव, महिला संगीत, और भगवान विष्णु के पूजन के दौरान गाया जा सकता है। इसे शुद्ध उच्चारण और वाद्य यंत्रों (जैसे ढोलक, मंजीरा और शहनाई की धुन) के साथ गाने से घर में सकारात्मक ऊर्जा और मांगलिकता का वास होता है। आप इसे नियमित रूप से देवउठनी एकादशी व्रत कथा के पाठ के उपरांत भी गा सकते हैं।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस पावन भजन के केंद्र में जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु (शालिग्राम रूप) और उनकी प्रिय भक्त माता तुलसी (वृंदा) हैं। इसके साथ ही इस भजन की रचना प्रसिद्ध भक्त कवि 'मधुप' जी द्वारा की गई है, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से लोक-संस्कृति और भक्ति का सुंदर समन्वय प्रस्तुत किया है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल अर्थ संदर्भ / प्रसंग
मंगलाचार शुभ कार्य या मांगलिक गीत विवाह या उत्सव के आरंभ में होने वाले मंगल कार्य
सुकाल अच्छा और पावन समय कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि
तुलसां रानी माता तुलसी विवाह में दुल्हन के रूप में सुसज्जित तुलसी जी
हरि सरकार भगवान विष्णु सृष्टि के संचालनकर्ता और दूल्हा बने भगवान
फल चार चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"देवउठनी एकादशी आई, कार्तिक-शुक्ल सुकाल-बधईया.."
भावार्थ: कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की वह पवित्र एकादशी तिथि आ गई है, जिसे देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। यह समय अत्यंत सुकाल और शुभ है, इसलिए चहुंओर बधाइयाँ बज रही हैं।

"बनी दुल्हनियां तुलसां रानी, दुल्हा हरि सरकार- बधईया.."
भावार्थ: इस पावन प्रसंग पर माता तुलसी एक सुंदर दुल्हन की भांति सजकर बैठी हैं और जगत के स्वामी भगवान विष्णु उनके दूल्हा बने हैं। इस अलौकिक युगल रूप को देखकर सभी आनंदित हैं।

"देवी देव बने बाराती, नाच रहा संसार-बधईयां.."
भावार्थ: इस ब्रह्मांडीय विवाह में समस्त देवी-देवता बाराती बनकर सम्मिलित हुए हैं, और उनके साथ पूरा संसार इस उत्सव में झूम रहा है व नाच रहा है।

"कहै ‘‘मधुप’’ यह पावन गाथा, देती है फल चार-बधईया.."
भावार्थ: रचनाकार 'मधुप' जी कहते हैं कि यह पावन गाथा और संकीर्तन मनुष्य को जीवन के चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को प्रदान करने वाला है।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

उत्तिष्ठ गोविन्द त्यज निद्रां जगत्पतये। त्वयि सुप्ते जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम्॥

अर्थात्: हे जगत्पते गोविंद! निद्रा त्यागकर उठिए। आपके सो जाने पर यह सारा संसार भी मानो सो जाता है।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

भजन का नाम बधईया बाज रही (देवउठनी एकादशी भजन)
समर्पित देवता भगवान श्री हरि विष्णु और माता तुलसी
रचियता / कवि कवि ‘मधुप’
भाषा सरल हिंदी / ब्रज-अवधी मिश्रित लोक भाषा
मुख्य थीम तुलसी विवाह और देवउठनी एकादशी उत्सव
भक्ति भाव उल्लास, आनंद, समर्पण और उत्सव
उपयुक्त अवसर देवउठनी एकादशी, तुलसी विवाह, महिला संगीत

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

देवउठनी एकादशी के दिन 'बधईया बाज रही', 'उठो देव बैठो देव' और तुलसी विवाह से जुड़े पारंपरिक लोकगीत व भजन प्रमुख रूप से गाए जाते हैं।

इस पावन भजन की रचना प्रसिद्ध भक्त कवि 'मधुप' जी द्वारा की गई है, जिन्होंने अपनी कविताओं में सनातन उत्सवों का सुंदर चित्रण किया है।

इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा के पश्चात जागते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास समाप्त होता है और सभी मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश आदि पुनः आरंभ हो जाते हैं।

तुलसी विवाह सामान्यतः कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी (देवउठनी एकादशी) अथवा कई स्थानों पर द्वादशी तिथि को मनाया जाता है।

हाँ, यह भजन अपनी पारंपरिक लोक धुन और उत्सवधर्मी प्रकृति के कारण तुलसी विवाह और महिला संगीत के आयोजनों में अत्यंत चाव से गाया जाता है।

इस पावन भजन के स्मरण और श्रवण से मन को शांति मिलती है, घर में सकारात्मकता आती है और भगवान विष्णु तथा माता तुलसी की विशेष कृपा प्राप्त होती है।

इस दिन व्रत रखने वाले भक्तों को भगवान विष्णु का विधि-विधान से पूजन करना चाहिए, गन्ने का मंडप बनाकर तुलसी विवाह कराना चाहिए और रात्रि में भजन-कीर्तन करना चाहिए।

इस भजन को पारंपरिक सोहर या बधाई गीत की धुन 'मथे ते चमकन बाल' पर आसानी से गाया जा सकता है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख सनातन परंपरा, लोक साहित्य और धार्मिक उत्सवों के अध्ययन पर आधारित है। इसे पाठकों की सुविधा के लिए संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के रूप में प्रस्तुत किया गया है ताकि देवउठनी एकादशी के पावन पर्व पर सही और प्रामाणिक जानकारी मिल सके।

स्रोत एवं संदर्भ:

  • सनातन पंचांग एवं व्रत कथा संग्रह
  • पारंपरिक लोकगीत एवं संकीर्तन परंपरा
  • पद्म पुराण एवं कार्तिक मास माहात्म्य संदर्भ

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संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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