भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

रघुराई हे रघुराई पग धोकर नांव चढ़ियो केवट प्रसंग भक्ति इन हिंदी लिरिक्स

पढ़ें रघुराई हे रघुराई पग धोकर नांव चढ़ियो केवट प्रसंग भक्ति इन हिंदी लिरिक्स का शुद्ध पाठ, शब्दार्थ, विस्तृत हिंदी भावार्थ, पूजा विधि एवं आध्यात्मिक महत्व भ

"रघुराई हे रघुराई पग धोकर नांव चढ़ियो" यह भजन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और उनके अनन्य भक्त निषादराज केवट के बीच के उस पावन, भावुक और दार्शनिक संवाद का संगीतमय निरूपण है, जो रामायण के सबसे मर्मस्पर्शी प्रसंगों में से एक है। जब प्रभु श्री राम, माता सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ वनवास की ओर प्रस्थान करते हैं, तब गंगा पार करने के लिए वे केवट से नाव की याचना करते हैं। केवट, जो प्रभु की महिमा से भली-भांति परिचित है, अपनी चतुरता और निश्छल भक्ति के बल पर प्रभु के चरण पखारने का हठ करता है। यह भजन उसी अलौकिक क्षण की जीवंत प्रस्तुति है, जहाँ एक साधारण मल्लाह ब्रह्मांड के स्वामी को अपनी शर्तों पर नाव में बिठाता है। इस भजन का गायन श्रोताओं के हृदय में अनन्य समर्पण, विनय और करुणा का संचार करता है। विशेष रूप से राम नवमी, सुंदरकांड पाठ, सत्संग और पारिवारिक मांगलिक अवसरों पर इस भजन का श्रवण अत्यंत कल्याणकारी और मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना जाता है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

रघुराई हे रघुराई पग धोकर नांव चढ़ियो

रघुराई हे रघुराई, पग धोकर नांव चढ़ियो,
केवट की भक्ति देख, प्रभु मन ही मन मुस्कायो।

चरण पखारत केवट बोले, प्रभु मेरी सुन लीजो,
नाव चढ़ाने से पहले, प्रभु चरण पखारन दीजो।
कहत है केवट प्रभु, मैं तो हूँ एक साधारण नर,
आपकी चरण धूलि से, तर गई मेरी नारी घर।

रघुराई हे रघुराई, पग धोकर नांव चढ़ियो...

नहीं लूंगा मैं उतराई, नहीं लूंगा मैं दाम,
बस इतनी विनती है प्रभु, मन में रहे आपका नाम।
भवसागर से पार उतारो, जैसे नाव चढ़ाई,
केवट की नैया के प्रभु, आप ही हो रघुराई।

रघुराई हे रघुराई, पग धोकर नांव चढ़ियो...

गंगा के तीरे खड़े प्रभु, मुस्काए सुखधाम,
केवट का भाग्य जगा, मिले साक्षात श्री राम।
चरण धोए आंसुओं से, नैनन नीर बहाई,
धन्य हुआ वह केवट, जिसने पाई राम की शरणाई।

रघुराई हे रघुराई, पग धोकर नांव चढ़ियो...

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

इस भजन का मूल भाव केवट की निश्छल, चतुर और अनन्य भक्ति पर आधारित है। केवट भगवान श्री राम से कहता है कि हे मर्यादा पुरुषोत्तम! मैं आपको अपनी नाव पर तब तक नहीं चढ़ने दूंगा, जब तक मैं आपके चरणों को अच्छी तरह से धो नहीं लेता। इसके पीछे केवट का तर्क अत्यंत कौतुकपूर्ण और प्रेम से भरा है। वह कहता है कि मैंने सुना है कि आपके चरणों की धूलि में ऐसा चमत्कार है कि पत्थर की शिला भी एक सुंदर स्त्री (अहिल्या) बन गई। मेरी नाव तो लकड़ी की है, यदि इस पर आपकी चरण धूलि लग गई, तो यह भी स्त्री बन जाएगी। ऐसी स्थिति में, मैं अपने परिवार का भरण-पोषण कैसे करूँगा? मेरी आजीविका का एकमात्र साधन यह नाव ही है।

इस मधुर हठ के पीछे वास्तव में केवट की यह तीव्र इच्छा थी कि वह किसी भी प्रकार से त्रिलोकीनाथ के उन चरणों का स्पर्श कर सके, जिन्हें पाने के लिए बड़े-बड़े योगी-मुनि युगों तक तपस्या करते हैं। भगवान राम केवट के इस निश्छल प्रेम और चतुरता को देखकर मन ही मन मुस्कुराते हैं और उसे अपने चरण धोने की अनुमति दे देते हैं। भजन के अगले भाग में केवट कहता है कि वह प्रभु से कोई भौतिक उतराई या धन नहीं चाहता। उसकी केवल एक ही प्रार्थना है कि जिस प्रकार आज वह प्रभु को गंगा नदी पार करा रहा है, उसी प्रकार अंत समय में प्रभु उसे इस संसार रूपी भवसागर से पार उतार दें। यह समर्पण ही इस भजन का वास्तविक प्राण है।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

यह भजन भारतीय भक्ति परंपरा के उस शिखर को दर्शाता है जहाँ भगवान और भक्त के बीच का भेद समाप्त हो जाता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • भक्ति की पराकाष्ठा: केवट का प्रसंग यह सिद्ध करता है कि ईश्वर को पाने के लिए किसी कठिन साधना, शास्त्र ज्ञान या उच्च कुल की आवश्यकता नहीं है। केवल निष्कपट प्रेम और पूर्ण समर्पण ही पर्याप्त है।
  • सामाजिक समरसता का संदेश: प्रभु श्री राम ने समाज के सबसे वंचित और साधारण वर्ग के प्रतिनिधि केवट को गले लगाकर यह संदेश दिया कि उनकी दृष्टि में सभी जीव समान हैं। यह प्रसंग जातिगत भेदभाव को पूरी तरह से खारिज करता है।
  • अहंकार का विसर्जन: जो प्रभु संपूर्ण सृष्टि के संचालक हैं, वे एक साधारण मल्लाह के सामने चुपचाप खड़े होकर अपने पैर धुलवा रहे हैं। यह दृश्य दर्शाता है कि ईश्वर केवल प्रेम के भूखे हैं और प्रेम के वशीभूत होकर वे भक्त के अधीन भी हो जाते हैं।
  • भवसागर से मुक्ति की कामना: केवट द्वारा भौतिक उतराई न लेकर आध्यात्मिक मुक्ति की मांग करना यह सिखाता है कि संसार की नश्वर वस्तुओं की तुलना में प्रभु की भक्ति और उनका नाम ही शाश्वत सत्य है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

इस भजन का गायन और श्रवण भक्त के हृदय में करुणा और समर्पण का भाव जाग्रत करता है। इसे गाने और सुनने की सर्वोत्तम विधि इस प्रकार है:

  • शुभ अवसर: यह भजन विशेष रूप से श्री राम भजन संध्या, राम नवमी, चैत्र नवरात्रि, सुंदरकांड के पाठ के दौरान और सामूहिक सत्संगों में गाया जाता है।
  • सर्वोत्तम समय: प्रातःकाल की पूजा के समय या संध्या आरती के पश्चात शांत मन से इस भजन का गायन अथवा श्रवण करना अत्यंत फलदायी होता है।
  • गायन की विधि: इस भजन को गाते समय मन में केवट और श्री राम के प्रसंग का ध्यान करना चाहिए। केवट के स्थान पर स्वयं को रखकर, अश्रुपूर्ण नेत्रों और आर्त भाव से प्रभु के चरणों में आत्मसमर्पण करने की भावना रखनी चाहिए।
  • श्रवण का प्रभाव: इस भजन को एकाग्रचित्त होकर सुनने से मन के विकार दूर होते हैं, मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है और साधक के भीतर विनम्रता का विकास होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

यह भजन मुख्य रूप से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और उनके अनन्य भक्त निषादराज केवट को समर्पित है। इस प्रसंग की मूल रचना गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित महाकाव्य 'श्री रामचरितमानस' के अयोध्या कांड में मिलती है। तुलसीदास जी ने इस प्रसंग को अत्यंत सजीव और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया है। उनके बाद के कई संतों और कवियों ने इस प्रसंग को लोकगीतों और भजनों के रूप में ढाला, जिससे यह जन-जन का कंठहार बन गया। इस भजन में भगवान लक्ष्मण और माता सीता की उपस्थिति भी परोक्ष रूप से समाहित है, जो इस पावन दृश्य के साक्षी बनते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

इस भजन की पृष्ठभूमि त्रेतायुग की उस ऐतिहासिक घटना से जुड़ी है जब राजा दशरथ की आज्ञा और कैकेयी के वरदान स्वरूप श्री राम को चौदह वर्ष का वनवास प्राप्त होता है। जब श्री राम, सीता जी और लक्ष्मण जी के साथ तमसा और श्रृंगवेरपुर पार करते हुए गंगा नदी के तट पर पहुँचते हैं, तब उन्हें नदी पार करने के लिए एक नाव की आवश्यकता होती है। वहाँ का केवट (मल्लाह) उन्हें पहचान लेता है। वह जानता है कि ये वही श्री राम हैं जिन्होंने गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार केवल अपने चरणों के स्पर्श से किया था। यहीं से केवट के मन में प्रभु के चरण धोने की युक्ति सूझती है, जो इस भजन की रचना का मुख्य आधार बनी। यह लोक-भजन सदियों से उत्तर भारत की लोक-संस्कृति और रामलीलाओं का एक अभिन्न हिस्सा रहा है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा सरल, सुबोध और लोक-संवेदना से जुड़ी हुई हिंदी है, जिसमें अवधी और भोजपुरी के मधुर पुट देखने को मिलते हैं। इसकी काव्य शैली संवादात्मक (Dialogue Style) है, जो श्रोता के समक्ष एक दृश्य बिंब (Visual Imagery) उपस्थित करती है। भजन में प्रयुक्त शब्द जैसे 'पग', 'नांव', 'पखारत', 'उतराई' और 'नैया' ग्रामीण और लोक जीवन की सोंधी महक को समेटे हुए हैं। इसमें शांत रस और भक्ति रस का अद्भुत समन्वय है। केवट के संवादों में जहाँ एक ओर चतुरता और हास्य का पुट है, वहीं दूसरी ओर प्रभु के प्रति अगाध श्रद्धा और समर्पण की अविरल धारा प्रवाहित होती है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन केवल एक पौराणिक कथा का गान नहीं है, बल्कि यह हमें जीवन के कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और व्यावहारिक संदेश देता है:

  • निश्छलता और सरलता: ईश्वर चतुराई से नहीं, बल्कि हृदय की सरलता से रीझते हैं। केवट की दलीलें भले ही तर्कहीन लगें, लेकिन उनके पीछे का प्रेम निष्कपट था। हमें भी ईश्वर की आराधना निश्छल भाव से करनी चाहिए।
  • समर्पण का महत्व: केवट ने प्रभु से कोई भौतिक सुख या धन नहीं मांगा। उसने केवल प्रभु के चरणों की सेवा और भवसागर से पार होने का वरदान मांगा। यह हमें सिखाता है कि प्रार्थना में सांसारिक वस्तुओं की मांग करने के बजाय ईश्वर से स्वयं ईश्वर को ही मांग लेना चाहिए।
  • समानता का व्यवहार: भगवान राम ने केवट को गले लगाकर समाज को यह सिखाया कि कोई भी व्यक्ति अपने जन्म या व्यवसाय से छोटा या बड़ा नहीं होता। सच्ची महानता केवल भक्ति और चरित्र से तय होती है।
  • संतोष और सेवा भाव: केवट का चरित्र हमें निस्वार्थ सेवा की सीख देता है। उसने बिना किसी स्वार्थ के प्रभु की सेवा की और अंततः परम पद का अधिकारी बना।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द/वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक संदर्भ
रघुराई रघुकुल के स्वामी, भगवान श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम राम का आदरसूचक नाम
पग चरण, पैर प्रभु के पावन चरण जो मोक्ष प्रदान करने वाले हैं
पखारन धोना, साफ करना श्रद्धापूर्वक चरणों को जल से धोना
नारी घर घर की स्त्री, पत्नी अहिल्या के उद्धार के संदर्भ में केवट का कौतुकपूर्ण भय
उतराई नाव से पार उतारने का किराया या दाम संसार में कर्मों के बदले मिलने वाला फल या पारिश्रमिक
भवसागर संसार रूपी सागर जन्म और मृत्यु का चक्र जिससे मुक्ति पाना ही मोक्ष है
सुखधाम सुखों के निवास स्थान, ईश्वर भगवान राम जो सभी आनंद और शांति के स्रोत हैं

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

पंक्ति: "रघुराई हे रघुराई, पग धोकर नांव चढ़ियो, केवट की भक्ति देख, प्रभु मन ही मन मुस्कायो।"
भावार्थ: केवट प्रभु श्री राम से अत्यंत आदर और अधिकार के साथ कहता है कि हे रघुराई! आप मेरे चरणों को धोए बिना मेरी नाव पर पैर मत रखिएगा। केवट के इस अनूठे हठ और उसके भीतर छिपे अगाध प्रेम को देखकर अंतर्यामी प्रभु श्री राम मन ही मन मुस्कुराने लगते हैं।

पंक्ति: "चरण पखारत केवट बोले, प्रभु मेरी सुन लीजो, नाव चढ़ाने से पहले, प्रभु चरण पखारन दीजो।"
भावार्थ: केवट प्रभु के चरण धोते हुए अत्यंत विनम्रता से विनती करता है कि हे प्रभु! मेरी एक छोटी सी प्रार्थना सुन लीजिए। आपको अपनी नाव पर बिठाने से पहले मुझे आपके इन पावन चरणों को धोने की अनुमति अवश्य दीजिए, क्योंकि यही मेरी सबसे बड़ी अभिलाषा है।

पंक्ति: "कहत है केवट प्रभु, मैं तो हूँ एक साधारण नर, आपकी चरण धूलि से, तर गई मेरी नारी घर।"
भावार्थ: केवट कहता है कि मैं तो एक अत्यंत साधारण और अज्ञानी मनुष्य हूँ। मैंने सुना है कि आपकी चरण धूलि के स्पर्श मात्र से एक पत्थर की शिला सुंदर स्त्री बन गई। यदि मेरी नाव भी स्त्री बन गई, तो मेरे घर में पहले से ही एक पत्नी है, दूसरी आ जाएगी तो मैं क्या करूँगा? इसलिए मुझे धूलि साफ करने दीजिए।

पंक्ति: "नहीं लूंगा मैं उतराई, नहीं लूंगा मैं दाम, बस इतनी विनती है प्रभु, मन में रहे आपका नाम।"
भावार्थ: केवट कहता है कि हे प्रभु! मैं आपको नदी पार कराने के बदले कोई धन या उतराई नहीं लूंगा। मेरी तो बस इतनी ही प्रार्थना है कि मेरे हृदय में सदैव आपके नाम का वास रहे और मुझे आपकी अनवरत भक्ति प्राप्त होती रहे।

पंक्ति: "भवसागर से पार उतारो, जैसे नाव चढ़ाई, केवट की नैया के प्रभु, आप ही हो रघुराई।"
भावार्थ: केवट अंत में अपनी वास्तविक इच्छा प्रकट करते हुए कहता है कि हे प्रभु! जिस प्रकार आज मैं आपको इस छोटी सी नदी से अपनी नाव पर बिठाकर पार उतार रहा हूँ, उसी प्रकार जब मेरा अंत समय आए, तो आप मुझे इस भयानक भवसागर से पार उतार देना। मेरी जीवन रूपी नैया के खैया केवल आप ही हैं।

भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

केवट प्रसंग की दिव्यता को समझने के लिए 'श्री रामचरितमानस' का यह प्रसिद्ध दोहा अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ केवट के प्रेम को देखकर लक्ष्मण और सीता जी भी चकित रह जाते हैं:

"पद पखारि जलु पान सुचि करि आपु सहित परिवार।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार॥"

(श्रीरामचरितमानस - अयोध्याकाण्ड)

अर्थ: केवट ने भगवान के चरणों को धोकर, उस चरणामृत को स्वयं पिया और अपने पूरे परिवार को पिलाया। ऐसा करके उसने अपने पितरों को मोक्ष प्रदान किया और फिर अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर प्रभु को गंगा पार ले गया।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण बिंदु महत्वपूर्ण जानकारी
भजन का नाम रघुराई हे रघुराई पग धोकर नांव चढ़ियो
मुख्य आराध्य देव भगवान श्री राम (मर्यादा पुरुषोत्तम)
मुख्य प्रसंग केवट प्रसंग (गंगा पार उतरना), रामायण
मूल रचयिता/प्रेरणा गोस्वामी तुलसीदास (रामचरितमानस पर आधारित पारंपरिक लोक भजन)
काव्य भाषा सरल हिंदी (अवधी मिश्रित लोक शैली)
भक्ति रस/भाव वात्सल्य, सख्य और अनन्य समर्पण भाव (दास्य-सख्य भाव)
उपयुक्त अवसर राम नवमी, सत्संग, सुंदरकांड पाठ, दैनिक संध्या आरती

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

इस भजन का मुख्य संदेश यह है कि भगवान केवल सच्चे प्रेम और निश्छल भक्ति के भूखे हैं। वे किसी सामाजिक ऊंच-नीच, धन या जाति को नहीं देखते। केवट की सरल और निस्वार्थ भक्ति के सामने ब्रह्मांड के स्वामी भी नतमस्तक हो जाते हैं।

केवट जानता था कि प्रभु के चरणों के स्पर्श से पत्थर की शिला अहिल्या बन गई थी। उसने कौतुकवश तर्क दिया कि यदि उसकी लकड़ी की नाव भी स्त्री बन गई, तो उसकी आजीविका छिन जाएगी। परंतु वास्तव में, वह प्रभु के पावन चरणों का स्पर्श कर मोक्ष प्राप्त करना चाहता था।

यह भजन गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'श्री रामचरितमानस' के अयोध्या कांड में वर्णित 'केवट प्रसंग' से प्रेरित है। यह प्रसंग प्रभु श्री राम के वनवास प्रस्थान के समय का है।

केवट ने बहुत ही सुंदर तर्क दिया कि एक ही पेशे के लोग आपस में उतराई नहीं लेते। उसने कहा, "हे प्रभु! मैं इस गंगा नदी का केवट हूँ और आप इस संसार रूपी भवसागर के केवट हैं। आज मैंने आपको पार उतारा है, जब मेरा समय आए तो आप मुझे भवसागर से पार उतार देना।"

इस भजन के नियमित गायन और श्रवण से मन में विनम्रता आती है, अहंकार का नाश होता है और भगवान श्री राम के प्रति अनन्य भक्ति जाग्रत होती है। यह मानसिक तनाव को दूर कर आंतरिक शांति प्रदान करता है।

'भवसागर' का अर्थ है जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का वह चक्र जिसमें जीव फंसा रहता है। केवट प्रभु से प्रार्थना करता है कि जिस प्रकार उसने प्रभु को भौतिक गंगा नदी पार कराई, उसी प्रकार प्रभु उसे इस संसार के दुखों और जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करें।

यह भजन पारंपरिक रूप से लोक धुनों पर आधारित है। इसे अत्यंत सरल और सुरीली तर्ज पर गाया जाता है, जिससे आम लोग भी आसानी से सामूहिक रूप से इसका गायन कर सकें। इसमें ढोलक, मंजीरा और हारमोनियम का प्रयोग मुख्य रूप से होता है।

हाँ, केवट प्रसंग का उल्लेख महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में भी मिलता है, परंतु गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इसे जो भावुक, संवादात्मक और दार्शनिक रूप दिया है, वह अद्भुत है और लोकमानस में उसी की गहरी छाप है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह लेख और भजन की व्याख्या "संपादकीय रूप से तैयार सामग्री" के अंतर्गत प्रस्तुत की गई है। इस भजन के प्रत्येक शब्द और भावार्थ को सनातन धर्म के प्रामाणिक ग्रंथों, विशेष रूप से 'श्री रामचरितमानस' के आलोक में विश्लेषित किया गया है। केवट प्रसंग केवल एक कथा नहीं है, बल्कि यह वेदांत दर्शन के उस सिद्धांत को प्रतिपादित करता है जहाँ जीव और ब्रह्म के बीच का संबंध केवल प्रेम और भक्ति के माध्यम से ही पूर्णता को प्राप्त होता है। हमारी संपादकीय टीम ने इस सामग्री की शुद्धता, साहित्यिक सौंदर्य और आध्यात्मिक गहराई को सुनिश्चित किया है ताकि पाठकों को एक उच्च-गुणवत्तापूर्ण और ज्ञानवर्धक अनुभव प्राप्त हो सके।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • श्रीरामचरितमानस: गोस्वामी तुलसीदास कृत, गीता प्रेस गोरखपुर (अयोध्याकाण्ड, केवट प्रसंग)।
  • अध्यात्म रामायण: भगवान वेदव्यास प्रणीत, जिसमें केवट के पूर्वजन्म और उसकी भक्ति का विस्तृत वर्णन है।
  • पारंपरिक लोक भजन संग्रह: उत्तर भारतीय रामलीला और संकीर्तन परंपराओं से संकलित मौखिक एवं लिखित पाठ।

संबंधित भजन एवं लेख

यदि आपको केवट प्रसंग का यह पावन भजन पसंद आया है, तो आप हमारी वेबसाइट पर निम्नलिखित संबंधित लेख और भजन भी पढ़ सकते हैं जो आपकी आध्यात्मिक यात्रा को और समृद्ध करेंगे:

संपादकीय रूप से तैयार एवं समीक्षित धार्मिक सामग्री

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 13 Oct 2026

पाठकों के विचार (0)

भक्ति रस चर्चा में भाग लें

लिरिक्स कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!