भक्ति काव्य व भजन मंगलवार विशेष (श्री हनुमान जी व मंगल देव)

ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन भजन इन हिंदी लिरिक्स

मीराबाई का प्रसिद्ध भजन 'ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन' के हिंदी लिरिक्स और भावार्थ पढ़ें। कृष्ण भक्ति में लीन करने वाली यह रचना Bhaktilok पर उपलब्ध है।

परिचय एवं भक्ति भाव

कृष्ण भक्ति की अनन्य और अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत करने वाली संत शिरोमणि मीराबाई का यह पावन भजन ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन भगवान श्री कृष्ण के प्रति पूर्ण शरणागति और आत्मसमर्पण का प्रतीक है। यह भजन केवल एक संगीत रचना नहीं, बल्कि एक साधारण राजकुमारी के मीराबाई बनने की उस आध्यात्मिक यात्रा का जीवंत दस्तावेज है, जिसने लोक-लाज, राजमहलों के सुख और सांसारिक बंधनों को त्यागकर बाँसुरी वाले की प्रीति को ही अपने जीवन का एकमात्र ध्येय बना लिया। जब मनुष्य के भीतर गोविंद के प्रति ऐसी अगाध प्रीति जग जाती है, तब दुनिया की हर बाधा गौण हो जाती है। यह भजन श्रोता के हृदय में भक्ति रस का संचार करता है और उसे भौतिक मोह-माया से ऊपर उठकर परम सत्य यानी भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में ध्यान लगाने के लिए प्रेरित करता है। सुबह की बेला में, संध्या वंदन के समय या किसी भी सत्संग और संकीर्तन में इस भजन का गान करने से मन को अपार शांति और आनंद की अनुभूति होती है।

सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics

मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन - शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें:


है आँख वो जो श्याम का दर्शन किया करे
है शीश जो प्रभु चरण में वंदन किया करे।
बेकार वो मुख है जो व्यर्थ बातों में
मुख है वो जो हरी नाम का सुमिरन किया करे .....2

हीरे मोती से नहीं शोभा है हाथ की
है हाथ जो भगवान् का पूजन किया करे।
मर के भी अमर नाम है उस जीव का जग में
प्रभु प्रेम में बलिदान जो जीवन किया करे .....2

ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन।
वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी .....2

महलों में पली बन के जोगन चली।
मीरा रानी दीवानी कहाने लगी .....2

कोई रोके नहीं कोई टोके नहीं
मीरा गोविन्द गोपाल गाने लगी।
बैठी संतो के संग रंगी मोहन के रंग
मीरा प्रेमी प्रीतम को मनाने लगी।
वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी .....2

राणा ने विष दिया मानो अमृत पिया
मीरा सागर में सरिता समाने लगी।
दुःख लाखों सहे मुख से गोविन्द कहे
मीरा गोविन्द गोपाल गाने लगी।
वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी .....2

भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth

यह अत्यंत पावन भजन हमें मानव जीवन के वास्तविक उद्देश्य से अवगत कराता है। भजन की प्रारंभिक पंक्तियों में शरीर के विभिन्न अंगों और उनके सदुपयोग पर प्रकाश डाला गया है। रचनाकार कहते हैं कि नेत्र वही धन्य हैं जो अपने आराध्य श्री श्याम सुंदर के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त करते हैं, मस्तक वही श्रेष्ठ है जो भगवान के चरणों में झुककर वंदन करता है। जो मुख व्यर्थ की सांसारिक चर्चाओं और निंदा में समय गंवाता है, वह व्यर्थ है; सच्चा मुख वही है जो निरंतर भगवान के पावन नामों का सुमिरन करता है। इसी प्रकार, हाथों की शोभा सोने-चांदी या हीरे-मोती के कंगन पहनने से नहीं, बल्कि भगवान की पूजा-अर्चना करने से बढ़ती है। जो मनुष्य अपना जीवन प्रभु के प्रेम में उत्सर्ग कर देता है, उसका नाम इस संसार में अमर हो जाता है।

इसके पश्चात भजन मीराबाई की अलौकिक कथा पर केंद्रित हो जाता है। मेवाड़ के राजमहलों में अत्यंत सुख-सुविधाओं के बीच पली-बढ़ी मीरा ने जब गोपाल से प्रेम किया, तो वे महलों का मोह छोड़कर जोगन बन गईं। समाज और कुल की मर्यादाओं की परवाह किए बिना मीरा रानी दीवानी होकर गलियों में घूमने लगीं और हरि गुण गाने लगीं। उन्हें रोकने-टोकेने वाला कोई बंधन नहीं रोक पाया क्योंकि उनकी आत्मा गिरधर गोपाल से जुड़ चुकी थी। संतों की संगति में बैठकर वे कृष्णमय हो गईं। जब उनके देवर राणा ने क्रोधित होकर उन्हें विष का प्याला भेजा, तो मीरा ने उसे सहज भाव से अमृत मानकर पी लिया। जिस प्रकार कोई छोटी नदी अंततः विशाल सागर में मिलकर एक हो जाती है, उसी प्रकार मीरा का प्राण भी परमात्मा में विलीन हो गया। जीवन में लाखों कष्ट मिलने के बावजूद उनके मुख से केवल गोविंद का ही नाम निकला।

भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance

इस भजन का मुख्य स्वर 'प्रेमाभक्ति' और 'पूर्ण समर्पण' है। भगवान श्रीकृष्ण और उनकी परम भक्त मीराबाई के बीच के अनन्य संबंध को यह भजन अत्यंत सरल और हृदयस्पर्शी शैली में प्रस्तुत करता है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  • शरीर का सदुपयोग: मनुष्य योनि की सार्थकता भगवान के स्मरण, पूजन और दर्शन में ही निहित है।
  • सांसारिक मोह का त्याग: भौतिक सुख-सुविधाओं और राजसी वैभव से ऊपर उठकर ईश्वर प्राप्ति की लालसा जगाना।
  • संकटों में अडिग आस्था: जीवन में कितने भी कष्ट या विषैली परिस्थितियां (जैसे राणा द्वारा दिया गया विष) क्यों न आएं, सच्चे भक्त का विश्वास प्रभु से नहीं डगमगाता।
  • संत संगति का महत्व: संतों की संगति और सत्संग से ही मनुष्य परब्रह्म के रंग में रंग पाता है।

भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing

भक्ति संगीत के रस का आनंद लेने के लिए समय और पवित्रता का विशेष महत्व होता है। इस भजन को निम्नलिखित अवसरों और विधियों के अनुसार गाया जा सकता है:

  • ब्रह्ममुहूर्त एवं प्रातःकालीन वंदन: सुबह उठकर पूजा घर में दीपक प्रज्वलित करने के पश्चात इस भजन का स्मरण करने से पूरा दिन सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर रहता है।
  • संध्याकालीन आरती एवं सत्संग: शाम के समय जब घर के सभी सदस्य एकत्र होते हैं, तब इस भजन को गाने से पारिवारिक शांति और आध्यात्मिक वातावरण का निर्माण होता है।
  • एकादशी एवंजन्माष्टमी उत्सव: श्री कृष्ण जन्माष्टमी, एकादशी व्रतों और मीरा जयंती जैसे विशेष अवसरों पर संकीर्तन के दौरान यह भजन मुख्य आकर्षण होता है।
  • मानसिक शांति के लिए: जब भी मन अशांत हो, एकांत में बैठकर इस भजन को सुनने या गुनगुनाने से मानसिक तनाव दूर होता है और हृदय में भक्ति भाव जागृत होता है।

भजन से जुड़े देवी-देवता एवं संत | Associated Deity / Saint

इस भजन के केंद्र में ब्रज के प्राणनाथ, बंशीवट पर रास रचाने वाले भगवान श्री कृष्ण (गिरधर गोपाल) और उनकी अनन्य उपासिका संत मीराबाई हैं। मीराबाई सोलहवीं शताब्दी की एक महान कृष्ण भक्त कवयित्री थीं, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन बांके बिहारी की सेवा और उनके पदों की रचना में समर्पित कर दिया। उनकी भक्ति में मधुरा भक्ति की पराकाष्ठा देखने को मिलती है, जहाँ भक्त अपने आराध्य को पति, प्रियतम और सर्वस्व मान लेता है। मीराबाई के पद और भजन आज भी संपूर्ण उत्तर भारत और विशेषकर राजस्थान, गुजरात और बृजमंडल में अत्यंत श्रद्धा के साथ गाए जाते हैं। आप श्री कृष्ण स्तोत्र और राधा अष्टमी से जुड़े पावन लेखों के माध्यम से कृष्ण-राधा भक्ति की परंपरा को और गहराई से समझ सकते हैं।

भजन की रचना एवं पृष्ठभूमि | Composition & Background

पारंपरिक लोक धुनों और संतवाणी पर आधारित यह भजन पीढ़ियों से मौखिक और लिखित रूप से संकीर्तन प्रेमियों के बीच प्रसारित होता रहा है। इसकी पृष्ठभूमि मीराबाई के जीवन के संघर्षों और उनकी कृष्ण भक्ति से जुड़ी है। मीरा का विवाह मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश में राजकुमार भोजराज के साथ हुआ था, किंतु उनका मन संसारिक राजपाट में कभी नहीं रमा। उनका अंतरमन हमेशा से वृंदावन के बांके बिहारी से जुड़ा हुआ था। परिवार और समाज के कड़े विरोध के बावजूद उन्होंने अपनी साधना नहीं छोड़ी। इसी ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक संघर्ष को इस भजन में बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया गया है, जो हर सुनने वाले को भावविभोर कर देता है।

भजन की भाषा एवं काव्य शैली | Language & Literary Style

इस भजन की भाषा बहुत ही सरल, सहज और हृदयस्पर्शी हिंदी (ब्रज और राजस्थानी मिश्रित लोक भाषा) है। इसमें शास्त्रीय जटिलताओं के स्थान पर सीधे और आम बोलचाल के शब्दों का प्रयोग किया गया है ताकि हर आयु वर्ग का व्यक्ति इसे आसानी से समझ सके और गा सके। काव्य शैली की दृष्टि से इसमें रूपक, अनुप्रास और उपमा अलंकारों की सुंदर छटा देखने को मिलती है—जैसे "सागर में सरिता समाने लगी" पंक्ति में जीवात्मा के परमात्मा में विलीन होने के दार्शनिक सत्य को नदी और सागर के माध्यम से बहुत ही सहजता से समझाया गया है।

भजन में व्यक्त आध्यात्मिक संदेश एवं जीवन सीख | Spiritual Message & Life Lessons

यह भजन हमें जीवन के कई गहरे दार्शनिक और व्यावहारिक संदेश देता है:

  1. भक्ति ही सबसे बड़ा बल है: यदि हृदय में ईश्वर के प्रति सच्ची लगन हो, तो बड़े से बड़ा संकट भी आसानी से कट जाता है।
  2. शरीर का सदुपयोग: हमारे अंग-प्रत्यंग और इंद्रियां केवल भोग-विलास के लिए नहीं हैं, बल्कि इनका उपयोग भगवान की सेवा और सुमिरन में होना चाहिए।
  3. समाज के बंधनों से मुक्ति: सत्य और ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चलते समय यदि समाज विरोध भी करे, तो भी अपने मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए।
  4. समर्पण का भाव: मीरा की तरह जीवन के हर सुख-दुःख को प्रभु की इच्छा मानकर स्वीकार करना ही सच्ची शरणागति है।

भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings

शब्द / वाक्यांश सरल हिंदी अर्थ संदर्भ
लगन अनन्य प्रेम, धुन या अनुराग ईश्वर के प्रति अटूट आकर्षण
मगन आनंदित, विभोर या तल्लीन भक्ति रस में डूबा हुआ मन
सुमिरन निरंतर स्मरण करना या जपना भगवान के नाम का जाप
जोगन वैराग्य धारण करने वाली स्त्री राजपाट छोड़कर ईश्वर की शरण में जाने वाली
विष जहर मीरा को दिया गया कष्टदायक पेय
सरिता नदी मीरा के जीवन रूपी धारा
सागर महासागर परमात्मा रूपी अनंत ब्रह्म

पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ | Line-by-Line Explanation

"है आँख वो जो श्याम का दर्शन किया करे..."
इस पंक्ति का अर्थ है कि मानव को अपनी हर इंद्रिय का उपयोग भगवान की आराधना में करना चाहिए। आंखें वही धन्य हैं जो ठाकुर जी के दर्शन का लाभ उठाएं और मुख वही श्रेष्ठ है जो उनके नाम का जाप करे।

"ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन, वो तो गली गली हरी गुण गाने लगी..."
जब मीरा को गिरधर गोपाल से सच्ची प्रीत हो गई, तो वे बाहरी दुनिया की सुध-बुध खोकर आनंद में मग्न हो गईं और गलियों में घूम-घूमकर कृष्ण यश का गान करने लगीं।

"राणा ने विष दिया मानो अमृत पिया, मीरा सागर में सरिता समाने लगी..."
राज परिवार के मुखिया राणा द्वारा दिए गए जहर को मीरा ने प्रभु प्रसाद मानकर पी लिया और उस पर भगवान की ऐसी कृपा हुई कि विष भी अमृत बन गया। उनकी आत्मा परमात्मा में ऐसे समा गई जैसे नदी समुद्र में मिल जाती है।

भजन से जुड़े जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok

मीराबाई की इस अगाध भक्ति का समर्थन श्रीमद्भागवत गीता और अन्य पुराणों के श्लोक भी करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण गीता में अर्जुन से कहते हैं:

"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमुरुस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैव आत्मानं मत्परणायणः।।"

अर्थात: "तुम मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरा पूजन करो और मुझको ही नमस्कार करो। इस प्रकार मुझमें ही मन को स्थिर करके तुम अंततः मुझे ही प्राप्त होगे।" यही भाव मीरा के इस भजन में पूरी तरह चरितार्थ होता है। आप श्रीमद्भागवत गीता सार के माध्यम से ऐसे ही दिव्य संदेशों का अध्ययन कर सकते हैं।

एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information

विवरण तथ्य
भजन का नाम ऐसी लागी लगन मीरा हो गयी मगन
समर्पित देवता भगवान श्री कृष्ण (गिरधर गोपाल)
रचनाकार / प्रेरणा स्रोत संत शिरोमणि मीराबाई की जीवन गाथा एवं पारंपरिक लोक शैली
भाषा सरल हिंदी / ब्रज एवं राजस्थानी लोक भाषा
मुख्य विषय प्रेम, भक्ति, पूर्ण शरणागति और वैराग्य
स्थायी भाव भक्ति रस, प्रेम और आनंद
उपयुक्त अवसर प्रातः स्मरण, सत्संग, संकीर्तन, एकादशी और जन्माष्टमी

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

यह भजन भगवान श्री कृष्ण की परम भक्त संत मीराबाई के जीवन, उनकी अटूट भक्ति और उनके कृष्ण प्रेम को समर्पित है।

इस भजन को प्रातः काल पूजा के समय, संध्या वंदन के दौरान, या किसी भी धार्मिक सत्संग और संकीर्तन के समय गाया जा सकता है।

मीराबाई का मन बालयकाल से ही गिरधर गोपाल की मूर्ति में बस चुका था। वे संसारिक मोह-माया और महलों के सुख को छोड़कर भगवान की सेवा में लीन हो गईं।

ऐतिहासिक और पौराणिक कथाओं के अनुसार, मीराबाई के संतों के साथ उठने-बैठने से नाराज होकर उनके देवर राणा ने उन्हें मारने के लिए विष का प्याला भेजा था, जिसे मीरा ने प्रभु प्रसाद समझकर पी लिया था और कृष्ण कृपा से वह अमृत बन गया।

इस भजन के शब्द और भाव मन को भौतिक चिंताओं से हटाकर दिव्यता की ओर ले जाते हैं, जिससे आंतरिक शांति और सकारात्मकता की प्राप्ति होती है।

हाँ, इसकी लय बहुत सरल और प्रवाहित है, इसलिए बच्चे भी इसे बहुत कम समय में आसानी से याद करके गा सकते हैं।

इसका तात्पर्य जीवात्मा का परमात्मा में पूर्ण रूप से विलीन हो जाना है, जैसे छोटी नदी अंत में समुद्र में मिलकर एक हो जाती है।

इसके लिए कोई कठिन नियम नहीं हैं, बस इसे शुद्ध उच्चारण और सच्चे भक्ति भाव के साथ गाना ही सबसे महत्वपूर्ण है।

संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ

यह सामग्री पारंपरिक भक्ति साहित्य, मीराबाई के पदों और संत परंपरा के ऐतिहासिक संदर्भों पर आधारित है। पाठकों को शुद्धतम और प्रेरणादायी सामग्री उपलब्ध कराने के लिए इसे विशेष रूप से तैयार किया गया है। यह सामग्री संपादकीय रूप से तैयार सामग्री के अंतर्गत प्रस्तुत की गई है, जिसका उद्देश्य सनातन संस्कृति और कृष्ण भक्ति के संदेश को घर-घर तक पहुँचाना है।

स्रोत एवं संदर्भ | Sources & References

  • मीराबाई की पदावली एवं संकीर्तन परंपरा
  • श्रीमद्भागवत महापुराण एवं गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन
  • भक्ति आंदोलन और संत साहित्य के ऐतिहासिक ग्रंथ
  • पारंपरिक लोक गाथाएं एवं भजन संकलन

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यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

संदर्भ-आधारित समीक्षा अंतिम अद्यतन: 10 Oct 2026

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