प्रकाशित तिथि: 2026 | श्रेणी: भक्ति संगीत, हिंदी भजन, शरणागति मार्ग
"ऐसे कौन से कर्म करे जो साथ मिल जाए तेरा" यह दिव्य भजन जीवात्मा की उस असीम व्याकुलता, तड़प और पुकार को व्यक्त करता है जो संसार के अनित्य मायाजाल और भवसागर के भंवर में भटकते हुए अपने एकमात्र आराध्य, परमपिता परमात्मा को पाने के लिए छटपटा रही है। भारतीय सनातन भक्ति परंपरा और विशेषकर संत मत में 'शरणागति' (पूर्ण आत्म-समर्पण) को ईश्वर प्राप्ति का सबसे सुगम और श्रेष्ठ मार्ग माना गया है। कलयुग की इस भागदौड़ भरी, भौतिकवादी और व्यस्त दुनिया में, जहां मनुष्य दिन-रात धन, यश और सुख-सुविधाओं के पीछे दौड़ते हुए स्वयं को नितांत अकेला और खोया हुआ पाता है, यह भजन हमें हमारी मूल आध्यात्मिक पहचान का स्मरण कराता है। यह इस बात की गवाही देता है कि ईश्वर को पाने के लिए किसी अत्यंत कठिन हठयोग, पहाड़ों की गुफाओं में वर्षों की तपस्या या बड़े-बड़े अनुष्ठानों की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि इसके लिए एक सच्चे, निष्कलंक, निर्मल और करुणा से भरे हुए हृदय की आवश्यकता होती है। यह भजन विशेष रूप से उन साधकों और भक्तों के लिए एक संबल है जो अपने दैनिक गृहस्थ जीवन के तमाम उत्तरदायित्वों और कर्मों को निभाते हुए भी प्रभु का निरंतर सानिध्य और प्रेम अनुभव करना चाहते हैं।
इस लेख में हम इस पावन भजन के सम्पूर्ण लिरिक्स, शब्दार्थ, पंक्ति-दर-पंक्ति भावार्थ, दार्शनिक महत्व, गायन की विधि और इससे जुड़ी आध्यात्मिक सीखों का विस्तार से अध्ययन करेंगे। यदि आप अन्य लोकप्रिय भजनों और स्तोत्रों की खोज कर रहे हैं, तो आप हमारे श्री हनुमान चालीसा, शिव तांडव स्तोत्र और श्रीमद्भागवत गीता सार के लेखों को भी पढ़ सकते हैं।
सम्पूर्ण भजन लिरिक्स | Complete Bhajan Lyrics
हे भगवान हम अज्ञान, कैसे ध्यान करे तेरा,
हे भगवान हम अज्ञान, कैसे ध्यान करे तेरा।
ऐसे कौन से कर्म करे जो साथ मिल जाए तेरा,
ये दुनिया का मेला, भटक मैं जाऊं ना,
राहें बहुत सी हैं, कहीं खो जाऊं ना।
हूं अकेला उस भीड़ में, दिल में है घबरा मेरा,
ऐसे कौन से कर्म करे जो साथ मिल जाए तेरा।
तुम से ही होता है, जो भी काम यहाँ है,
तुम्हारे बिन न होता है, कोई भी काम यहाँ है。
तुम्हारी ही तो छाया में, खिल जाए ये जीवन मेरा,
ऐसे कौन से कर्म करे जो साथ मिल जाए तेरा।
माया के इस बंधन में, उलझा हुआ मन है मेरा,
इस भवसागर की लहरों में, डोले तन-मन मेरा।
तू ही खिवैया बन मेरा, पार लगा दे बेड़ा मेरा,
ऐसे कौन से कर्म करे जो साथ मिल जाए तेरा।
सुख में भूले तुझको हम, दुःख में तेरी याद आई,
इस पापी जीवन की नैया, तुमने ही पार लगाई।
चरणों में तेरे स्थान मिले, बस यही सपना मेरा,
ऐसे कौन से कर्म करे जो साथ मिल जाए तेरा।
भजन का सरल हिंदी अर्थ एवं भावार्थ | Bhajan Meaning & Bhavarth
यह भजन एक साधारण मनुष्य और उसके आराध्य के बीच के आत्मीय संवाद का सुंदर चित्रण है। भजन की शुरुआती पंक्तियों में भक्त अपनी अज्ञानता और विवशता को स्वीकार करता है। वह कहता है कि हे प्रभु! मैं बुद्धि और ज्ञान से हीन हूँ, मुझे यह ज्ञात नहीं है कि तुम्हारा ध्यान किस प्रकार लगाया जाए, तुम्हारी आराधना की सही विधि क्या है। मेरे मन में बस एक ही गहरी जिज्ञासा और तड़प है—"ऐसे कौन से कर्म करे जो साथ मिल जाए तेरा"। मनुष्य संसार को एक मेले की भाँति देखता है जहाँ विभिन्न प्रकार के आकर्षण और मार्ग मौजूद हैं। उसे इस बात का निरंतर भय सताता है कि कहीं वह संसार के प्रलोभनों में भटक न जाए और अपनी असली मंजिल यानी ईश्वर को न भूल बैठे।
भजन के अगले चरण में भक्त परम सत्य को स्वीकार करता है कि इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटित हो रहा है, वह सब प्रभु की इच्छा और शक्ति से ही संभव है। पत्ते का हिलना भी परमात्मा की सत्ता के बिना नहीं हो सकता। वह स्वीकार करता है कि उसकी अपनी कोई स्वतंत्र सत्ता नहीं है, बल्कि भगवान की करुणा रूपी छाया में ही उसका जीवन पल्लवित और विकसित होता है।
अंतिम चरणों में भक्त अपनी कमजोरी यानी माया के बंधनों का उल्लेख करता है। वह संसार रूपी भवसागर की भयंकर लहरों में स्वयं को असहज पाता है और भगवान से प्रार्थना करता है कि वे ही उसके जीवन की नाव के खिवैया (नाविक) बनें। अंत में वह स्वीकार करता है कि मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह सुख के दिनों में ईश्वर को भुला बैठता है और संकट के समय ही उसकी याद आती है, फिर भी करुणासागर प्रभु अपने भक्तों का त्याग नहीं करते। भक्त की एकमात्र अंतिम अभिलाषा यही है कि उसे प्रभु के चरण कमलों में स्थान प्राप्त हो जाए।
भजन की मुख्य विशेषताएं एवं महत्व | Highlights & Spiritual Significance
शरणागति का भाव (Surrender)
यह भजन भक्त की अकिंचनता और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण (शरणागति) को रेखांकित करता है। यह सिखाता है कि जब अहंकार समाप्त होता है, तभी सच्ची भक्ति का उदय होता है।
माया से मुक्ति की पुकार
संसार की भीड़ और प्रलोभनों में भटकने के भय से मुक्ति पाने के लिए ईश्वर का हाथ थामने की अकुलता इस भजन की आत्मा है।
भजन गायन व श्रवण का समय एवं विधि | When & How to Sing
भक्ति संगीत को अपने अंतःकरण तक उतारने के लिए उचित समय और मानसिक स्थिति का होना अति आवश्यक है। इस भजन को गाने या सुनने के लिए निम्नलिखित समय और विधियां उपयुक्त मानी जाती हैं:
- ब्रह्ममुहूर्त एवं प्रातःकाल: सुबह उठकर स्नान के पश्चात जब मन शांत होता है, तब इस भजन का गायन पूरे दिन सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
- संध्यावदन एवं दीपदान के समय: संध्या काल में जब दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर शांत चित्त बैठते हैं, तब यह भजन आत्ममंथन का अवसर देता है।
- साप्ताहिक सत्संग और कीर्तन: सामूहिक सत्संग या परिवार के साथ बैठकर इसे गाने से आपसी प्रेम और आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ती है।
- एकांत साधना: जब व्यक्ति मानसिक रूप से विचलित हो या अकेलापन महसूस करे, तब यह भजन संबल का कार्य करता है।
भजन के प्रमुख शब्दों का अर्थ | Important Word Meanings
| शब्द / वाक्यांश | सरल हिंदी अर्थ | आध्यात्मिक संदर्भ |
|---|---|---|
| अज्ञान | अविद्या, ज्ञान की कमी | आध्यात्मिक सच्चाई से अनभिज्ञता |
| भवसागर | संसार रूपी समुद्र | जन्म-मृत्यु का चक्र और सांसारिक मोह-माया |
| खिवैया | नाविक, पार लगाने वाला | ईश्वर या गुरु जो जीवन की नैया पार लगाते हैं |
| माया | भ्रम, प्रलोभन | संसार की नाशवान वस्तुएं जो सत्य से भटकाती हैं |
| शरणागति | पूर्ण आत्म-समर्पण | अपनी रक्षा का भार पूरी तरह प्रभु को सौंपना |
भजन से जुड़े मंत्र एवं श्लोक | Related Mantra & Shlok
शरणागति और भगवान के साथ मिलन की कामना से जुड़े कई वैदिक और पौराणिक श्लोक शास्त्रों में मिलते हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध श्लोक भगवत गीता का है:
"मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमुरु।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥"
(गीता १८.६५) - निरंतर मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरा पूजन करो और मुझे नमस्कार करो। तुम निश्चित रूप से मुझको ही प्राप्त होगे।
इसी प्रकार शरण जाने वाले भक्तों के लिए श्रीमद्भागवत में भी अनेक प्रसंग मिलते हैं। अधिक जानकारी के लिए आप श्रीमद्भागवत गीता के उपदेश पढ़ सकते हैं।
एक नजर में भजन की जानकारी | Bhajan Quick Information
| भजन का नाम | ऐसे कौन से कर्म करे जो साथ मिल जाए तेरा |
|---|---|
| भक्ति परंपरा | संत मत एवं शरणागति भक्ति |
| मुख्य भाव | विनय, विरह, पुकार और समर्पण |
| भाषा | सरल हिंदी / ब्रज-अवधी मिश्रित बोलचाल |
| उपयुक्त अवसर | नित्य पूजा, सत्संग, एकांत साधना, संकट निवारण |
| मुख्य संदेश | निर्मल हृदय और प्रभु में अटूट विश्वास |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
संपादकीय समीक्षा एवं संदर्भ
यह लेख सनातन धर्म की भक्ति परंपरा, संत साहित्य और शरणागति सिद्धांत के आधार पर संपादकीय रूप से तैयार सामग्री है। इसका उद्देश्य पाठकों को प्रामाणिक भजन लिरिक्स और उनके आध्यात्मिक भावार्थ से अवगत कराना है।
स्रोत एवं संदर्भ
- श्रीमद्भागवत गीता (व्याख्या सहित) - गीताप्रेस गोरखपुर
- संत साहित्य एवं पारंपरिक भक्ति पद संग्रह
- सनातन धर्म के विभिन्न भक्ति ग्रंथ एवं प्रवचन
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