बाल काण्ड अध्याय 1

संक्षेप रामायण

बाल काण्ड का प्रथम सर्ग 'संक्षेप रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भगवान् राम की सम्पूर्ण जीवन-गाथा का संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है। यह संवाद महर्षि वाल्मीकि और देवर्षि नारद के बीच होता है, जिसमें नारद जी राम के चरित्र, गुणों एवं लीलाओं का वर्णन करते हैं। इसी सर्ग में वाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा मिलती है।

विवरण

यह सर्ग सम्पूर्ण रामायण का सार है। प्रारम्भ में भगवान् वाल्मीकि देवर्षि नारद से पूछते हैं कि क्या इस संसार में कोई सर्वगुण सम्पन्न, पराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ पुरुष है? तब नारद जी श्रीराम का आदर्श चरित्र प्रस्तुत करते हैं। वे राम के जन्म, बाललीलाओं, विश्वामित्र के यज्ञ-रक्षण, सीता स्वयंवर, परशुराम से संवाद, अयोध्या वापसी, केकयी के वरदान, वनवास, दण्डक वन यात्रा, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, वालि वध, हनुमान की खोज, लंका दहन, रावण वध एवं अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक तक की सम्पूर्ण कथा संक्षेप में सुनाते हैं। इस प्रकार नारद जी द्वारा वर्णित इस संक्षिप्त रामकथा को सुनकर वाल्मीकि मुनि अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और उन्हें रामायण महाकाव्य की रचना करने की प्रेरणा मिलती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग १ (संक्षेप रामायण)

ॐ श्री परमात्मने नमः
॥ अथ प्रथमः सर्गः ॥
(नारद-वाल्मीकि संवाद – संक्षेप रामायण)

❓ वाल्मीकि जी का प्रश्न – कौन है वह परम गुणवान् पुरुष?

॥ श्लोक १ ॥
तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥ १-१-१ ॥
पदच्छेदः – तपःस्वाध्यायनिरतम् = तप और स्वाध्याय में निरत; तपस्वी = तपस्वी; वाग्विदाम् = वक्ताओं में; वरम् = श्रेष्ठ; नारदम् = नारद को; परिपप्रच्छ = भली-भाँति पूछा; वाल्मीकिः = वाल्मीकि ने; मुनिपुङ्गवम् = मुनियों में श्रेष्ठ।
भावार्थ : तप और स्वाध्याय में लीन रहने वाले, तपस्वी, वक्ताओं में श्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ नारद जी से महर्षि वाल्मीकि ने यह प्रश्न पूछा।
व्याख्या : यहाँ वाल्मीकि जी ने नारद जी की विशेषताएँ बताईं – वे तपस्या और स्वाध्याय में निरत हैं, अर्थात् सदा साधना और वेद-अध्ययन में लगे रहते हैं। साथ ही वे वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, अतः उनके पास सर्वोत्तम ज्ञान है। ऐसे महान् मुनि से वाल्मीकि जी ने प्रश्न किया, जो दर्शाता है कि वे जिज्ञासा से भरे हुए हैं।
॥ श्लोक २ ॥
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥ १-१-२ ॥
पदच्छेदः – कः = कौन है; नु = निश्चय ही; अस्मिन् = इस; साम्प्रतम् = वर्तमान में; लोके = लोक में; गुणवान् = गुणों से युक्त; कः = कौन है; च = और; वीर्यवान् = पराक्रमी; धर्मज्ञः = धर्म को जानने वाला; च = और; कृतज्ञः = उपकार मानने वाला; च = और; सत्यवाक्यः = सत्य बोलने वाला; दृढव्रतः = दृढ़ प्रतिज्ञा वाला।
भावार्थ : "इस वर्तमान लोक में कौन-सा पुरुष ऐसा है जो गुणवान् है, पराक्रमी है, धर्मज्ञ है, कृतज्ञ है, सत्यवादी है और दृढ़प्रतिज्ञ है?"
व्याख्या : वाल्मीकि जी के इस प्रश्न में आदर्श पुरुष के छः लक्षण गिनाए गए हैं – गुणवान् (शील-स्वभाव से सम्पन्न), वीर्यवान् (शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से युक्त), धर्मज्ञ (धर्म के मर्म को जानने वाला), कृतज्ञ (किए हुए उपकार को मानने वाला), सत्यवाक्य (सत्य बोलने वाला), दृढ़व्रत (अपने संकल्प पर अटल रहने वाला)। ऐसे पुरुष की खोज में वाल्मीकि जी हैं।

🎙️ नारद जी का उत्तर – राम ही वह आदर्श पुरुष हैं

॥ श्लोक ३ ॥
श्रुत्वा वाक्यं तु वाल्मीकेः प्रत्युवाच महामुनिः ।
नारदो वाक्यतत्त्वज्ञस्तदिदं वदतां वरः ॥ १-१-३ ॥
पदच्छेदः – श्रुत्वा = सुनकर; वाक्यम् = वचन; तु = तो; वाल्मीकेः = वाल्मीकि का; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; महामुनिः = महामुनि; नारदः = नारद ने; वाक्यतत्त्वज्ञः = वाक्य के तत्त्व को जानने वाले; तत् = वह; इदम् = यह; वदताम् = वक्ताओं में; वरः = श्रेष्ठ।
भावार्थ : वाल्मीकि जी के वचनों को सुनकर महामुनि नारद, जो वाक्यतत्त्व के ज्ञाता और वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, ने यह उत्तर दिया।
॥ श्लोक ४ ॥
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः ।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्गुणैरुपबृंहितम् ॥ १-१-४ ॥
पदच्छेदः – बहवः = बहुत; दुर्लभाः = दुर्लभ; च = और; एव = ही; ये = जो; त्वया = तुम्हारे द्वारा; कीर्तिताः = कहे गए; गुणाः = गुण; मुने = हे मुने!; वक्ष्यामि = कहूँगा; अहम् = मैं; बुद्ध्वा = जानकर; तैः = उन; गुणैः = गुणों से; उपबृंहितम् = सम्पन्न पुरुष को।
भावार्थ : "हे मुने! तुमने जिन गुणों का वर्णन किया है, वे बहुत दुर्लभ हैं। मैं उन सब गुणों से सम्पन्न एक पुरुष का वर्णन करूँगा।"
व्याख्या : नारद जी कहते हैं कि वाल्मीकि द्वारा बताए गए गुण साधारण नहीं हैं – ये अत्यन्त दुर्लभ हैं। फिर भी एक ऐसा पुरुष है जो इन सबसे युक्त है। अब वे उसका परिचय देंगे।

🏹 राम का वंश, नाम एवं स्वरूप

॥ श्लोक ५ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्यशः ॥ १-१-५ ॥
पदच्छेदः – इक्ष्वाकुवंशप्रभवः = इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न; रामः = राम; नाम = नाम से; जनैः = लोगों द्वारा; श्रुतः = सुने गए; नियतात्मा = संयमित चित्त वाले; महावीर्यः = महान् पराक्रमी; द्युतिमान् = तेजस्वी; धृतिमान् = धैर्यवान्; यशः = यशस्वी।
भावार्थ : "इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न, राम नाम के एक पुरुष हैं, जो लोगों में प्रसिद्ध हैं। वे संयमित आत्मा वाले, महापराक्रमी, तेजस्वी, धैर्यवान् और यशस्वी हैं।"
॥ श्लोक ६ ॥
विद्वान् निपुणितो वाग्मी सुन्दरः स्मितभाषणः ।
महासेनो महाबुद्धिः सर्वलोकहिते रतः ॥ १-१-६ ॥
भावार्थ : "वे विद्वान्, निपुण, वाक्पटु, सुन्दर, मधुरभाषी, महान् सेनापति, महाबुद्धि और समस्त लोकों के हित में रत हैं।"
॥ श्लोक ७ ॥
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ।
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥ १-१-७ ॥
भावार्थ : "वे आर्य (श्रेष्ठ चरित्र वाले), सबके प्रति समभाव रखने वाले, सदा प्रियदर्शन हैं। वे समस्त गुणों से युक्त, माता कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं।"

📜 नारद-कथित संक्षिप्त रामायण (श्लोक ८ से ९८ तक)

राम का बाल्यकाल : राजा दशरथ के चार पुत्र – राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। राम सबके प्रिय, सदा धर्म में स्थित।

विश्वामित्र का आगमन : विश्वामित्र ऋषि यज्ञरक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ अनिच्छा से भी सहमत होते हैं।

ताड़का-सुबाहु वध : राम ने ताड़का का वध किया, सुबाहु को मारा, मारीच को समुद्र के पार भगाया।

अहिल्या उद्धार : गौतम आश्रम में अहिल्या शापमुक्त हुईं। (यहाँ अहिल्या की कथा का संकेत)

जनकपुरी और सीता स्वयंवर : शिव-धनुष भंग, सीता-राम विवाह। परशुराम का क्रोध और शांति।

अयोध्या वापसी : राम का राज्याभिषेक निश्चित। केकयी का वरदान – राम वनवास, भरत राज्य।

वनवास : राम, सीता, लक्ष्मण वन गए। भरत मिलन, पादुका ग्रहण, नन्दिग्राम में निवास।

दण्डक वन : ऋषियों की तपोभूमि। शूर्पणखा का प्रसंग, खर-दूषण वध। रावण का षड्यंत्र – मारीच द्वारा स्वर्णमृग रूप, सीता हरण, जटायु वध।

राम का विलाप : सीता की खोज, कबन्ध वध, शबरी का आश्रम, पम्पा सरोवर।

सुग्रीव-मैत्री : ऋष्यमूक पर्वत पर मिलन, वालि-वध, सुग्रीव का राज्य।

हनुमान की लंका यात्रा : समुद्रलंघन, सीता से भेंट, अशोक वाटिका विध्वंस, लंका दहन।

रावण-वध : वानर सेना का सेतु-निर्माण, युद्ध, कुम्भकर्ण, मेघनाद, रावण का वध।

सीता की अग्निपरीक्षा : अयोध्या वापसी, भरत से मिलन, राज्याभिषेक, रामराज्य।

रामराज्य का वर्णन : प्रजा सुखी, न कोई दुःखी, धर्म की स्थापना।

📖 रामायण श्रवण-पठन का फल

॥ श्लोक ९९ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते ॥ १-१-९९ ॥
भावार्थ : जो इस रामायण को नित्य सुनता है और जो नित्य कीर्तन करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में महान् बनता है।
॥ श्लोक १०० ॥
रामायणमिदं पुण्यं यः पठेच्छृणुयादपि ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १-१-१०० ॥
भावार्थ : जो इस पवित्र रामायण को पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से छूट जाता है और सब मनोरथों को प्राप्त करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

इस प्रथम सर्ग का नाम ही "संक्षेप रामायण" है – यह सम्पूर्ण रामकथा का बीज है। जैसे वट-बीज में विशाल वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इन १०० श्लोकों में पूरे रामायण का सार समाया है। वाल्मीकि जी का प्रश्न यह दर्शाता है कि मनुष्य सदा आदर्श की खोज में रहता है। नारद जी राम के रूप में वह आदर्श प्रस्तुत करते हैं जो सर्वगुण-सम्पन्न है। इस प्रकार राम का चरित्र "मर्यादा पुरुषोत्तम" के रूप में स्थापित होता है।

इस सर्ग की एक और महत्त्वपूर्ण घटना है – वाल्मीकि को क्रौंच पक्षी के शोक से पहला श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्...) की प्राप्ति, जो इसी सर्ग के अन्तर्गत आती है (हालाँकि वह इस सर्ग के अन्त में या अगले सर्ग में आती है, परम्परा के अनुसार यहाँ उल्लेखनीय है)। उस श्लोक से वाल्मीकि को छन्दों की रचना की प्रेरणा मिली और उन्होंने सम्पूर्ण रामायण की रचना की।

इस प्रकार यह सर्ग रामायण का आधार-स्तम्भ है – इसे पढ़ने मात्र से सम्पूर्ण रामकथा का ज्ञान हो जाता है और अशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

इस अध्याय के लोकप्रिय श्लोक

श्लोक 1

239

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥…

“हे निषाद! तूने काममोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला, इसलिए तू कभ…”

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श्लोक 3

151

कोऽस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥…

“इस समय इस संसार में कौन गुणवान्, कौन वीर्यवान्, कौन धर्मज्ञ, कौन कृतज्ञ, कौन सत्…”

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श्लोक 16

127

तस्य भ्राता चतुर्वर्षात् लक्ष्मणः शत्रुसूदनः। भरतश्च शत्रुघ्नश्च सर्वे रामानुजाः प्रियाः॥…

“उनके चार भाई हैं – लक्ष्मण (शत्रुसूदन), भरत और शत्रुघ्न। ये सभी राम के अनुज (छोट…”

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श्लोक 60

108

रामोऽपि बहुवर्षाणि राज्यं कृत्वा महायशाः । सभ्राता सह सीतेन स्वर्गलोकं जगाम ह ॥…

“राम ने भी बहुत वर्षों तक राज्य करके महान् यश प्राप्त किया, और फिर भाइयों सहित तथ…”

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श्लोक 23

102

तेषां रामो महातेजा लक्ष्मणश्च महाबलः । भरतः शत्रुघ्नश्चैव वीर्यवन्तो महारथाः ॥…

“उनमें राम महातेजस्वी थे, लक्ष्मण महाबली थे, तथा भरत और शत्रुघ्न भी महारथी और परा…”

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अध्याय के श्लोक

श्लोक 1

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मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥
हिंदी अर्थ: हे निषाद! तूने काममोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला, इसलिए तू कभी भी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं करेगा और अनंत काल तक भटकता रहेगा।
यह रामायण का प्रथम श्लोक (आदिश्लोक) है, जो महर्षि वाल्मीकि के मुख से तब निकला जब उन्होंने एक शिकारी को क्रौंच पक्षी के नर को मारते देखा। करुणा से आप्लुष्ट होकर उन्होंने इस श्लोक के रूप में शिकारी को शाप दिया। यह अनुष्टुप् छंद में रचित है और यही वह आधार बना जिस पर वाल्मीकि ने सम्पूर्ण रामायण की रचना की। यह श्लोक धर्म की स्थापना और अहिंसा के संदेश का प्रतीक है।

श्लोक 2

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तमुवाच महातेजा वाल्मीकिर्मुनिपुंगवम् । नारदं वदतां श्रेष्ठं सर्वशास्त्रविशारदम् ॥
हिंदी अर्थ: तब महातेजस्वी वाल्मीकि ने वक्ताओं में श्रेष्ठ, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता, मुनियों में प्रवर नारद से कहा।
महर्षि वाल्मीकि, जो महान तेज से युक्त थे, ने नारद जी से वार्ता प्रारम्भ की। नारद जी को सर्वश्रेष्ठ वक्ता और समस्त शास्त्रों के ज्ञाता के रूप में वर्णित किया गया है।

श्लोक 3

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कोऽस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥
हिंदी अर्थ: इस समय इस संसार में कौन गुणवान्, कौन वीर्यवान्, कौन धर्मज्ञ, कौन कृतज्ञ, कौन सत्यवादी और दृढ़व्रत है?
यह प्रश्न वाल्मीकि ने नारद से पूछा कि वर्तमान में संसार में ऐसा कौन है जो गुणवान्, वीर, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़व्रत हो।

श्लोक 4

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चरित्रवान् कश्च कोपि क्षमावान् कश्च पण्डितः । एकान्तगुणशाली च सर्वशत्रुनिषूदनः ॥
हिंदी अर्थ: कौन चरित्रवान् है, कौन क्षमावान् है, कौन विद्वान् है, कौन एकान्त में भी गुणशाली है और सब शत्रुओं का नाश करने वाला है?
वाल्मीकि ने आदर्श पुरुष के और गुण पूछे – चरित्र, क्षमा, पाण्डित्य, अद्वितीय गुण और शत्रुविनाशक क्षमता।

श्लोक 5

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रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ॥
हिंदी अर्थ: जो जीवलोक का रक्षक हो, धर्म की रक्षा करने वाला हो, वेद और वेदांगों के तत्त्व को जानने वाला हो और धनुर्वेद में निष्ठावान् हो।
वाल्मीकि आगे पूछते हैं – ऐसा कौन है जो जीवों का रक्षक, धर्म का संरक्षक, वेद-वेदांग का ज्ञाता और धनुर्वेद में पारंगत हो।

श्लोक 6

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सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः । सर्वदाभिगतः सद्भिः सर्वचारित्रवान् शुचिः ॥
हिंदी अर्थ: जो सब लोकों को प्रिय हो, साधु हो, उदासीन या दीन न हो, चतुर हो, सज्जनों से सदा पूजित हो, सब प्रकार के चरित्र से युक्त हो और पवित्र हो।
वाल्मीकि ने आदर्श पुरुष के और गुण बताए – लोकप्रियता, साधुता, अदीनता, चतुराई, सज्जनों द्वारा सम्मान, सर्वगुणसम्पन्नता और पवित्रता।

श्लोक 7

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बुद्धिमान् नीतिमान् वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिबर्हणः। विपुलांसो महाबाहुः कम्बुग्रीवो महाहनुः॥
हिंदी अर्थ: वे बुद्धिमान्, नीतिज्ञ, वक्ता, श्रीमान्, शत्रुओं का नाश करने वाले, विशाल कंधों वाले, लंबी भुजाओं वाले, शंख के समान ग्रीवा वाले एवं विशाल हनु (ठोढी) वाले हैं।
राम के बौद्धिक, नैतिक, वाक् एवं शारीरिक गुणों का वर्णन।

श्लोक 8

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महोरस्को महाबाहुः सिंहविक्रान्तगामी च। महासत्त्वो महातेजा नित्यः सर्वगुणान्वितः॥
हिंदी अर्थ: वे विशाल वक्षःस्थल वाले, लंबी भुजाओं वाले, सिंह के समान विक्रांत गति वाले, महासत्त्व (महान सत्वगुण से युक्त), महातेजस्वी और सदा सभी गुणों से संपन्न हैं।
राम के शारीरिक, गाम्भीर्य एवं तेजोगुण का वर्णन।

श्लोक 9

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वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः। सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमान् प्रतिभानवान्॥
हिंदी अर्थ: वे वेद और वेदांगों के तत्त्व को जानने वाले, धनुर्वेद में निष्णात, सभी शास्त्रों के अर्थ तत्त्व को जानने वाले, स्मृतिमान् और प्रतिभाशाली हैं।
राम की विद्वत्ता एवं शास्त्रज्ञान का वर्णन।

श्लोक 10

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सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः। सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः॥
हिंदी अर्थ: वे सभी लोकों के प्रिय, साधु (सज्जन), दीनतारहित (उदार) आत्मा वाले, विचक्षण (कुशल) हैं। सज्जनों द्वारा सदा सेवित हैं, जैसे नदियों द्वारा समुद्र।
राम की लोकप्रियता एवं सज्जनों द्वारा उनकी सेवा का वर्णन।

श्लोक 11

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आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः। स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः॥
हिंदी अर्थ: वे आर्य (सभ्य/श्रेष्ठ), सभी के प्रति समान भाव रखने वाले, सदा प्रियदर्शन (सुंदर) हैं। वे सभी गुणों से युक्त एवं कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाले हैं।
राम के चरित्र की उदात्तता एवं माता के प्रति उनके विशेष संबंध का वर्णन।

श्लोक 12

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सत्यविक्रमवीर्याभ्यां महद्भ्यामिव सागरः। सदा समुदितो रामः प्रजानां हितकाम्यया॥
हिंदी अर्थ: सत्य, विक्रम और वीर्य रूपी दो महान् सागरों के समान (गहरे) राम सदा प्रजा के हित की कामना से युक्त रहते हैं।
राम के सत्य, पराक्रम एवं वीर्य की गहराई तथा प्रजापालन की भावना का वर्णन।

श्लोक 13

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धर्मज्ञः सत्यसन्धश्च प्रजानां च हिते रतः। यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान्॥
हिंदी अर्थ: वे धर्मज्ञ, सत्यप्रतिज्ञ, प्रजा के हित में रत, यशस्वी, ज्ञानसम्पन्न, पवित्र, वश्य (सबके वश में करने वाले) और समाधिमान् (एकाग्रचित्त) हैं।
राम के धार्मिक, नैतिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक गुणों का वर्णन।

श्लोक 14

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रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः सर्वशास्त्रार्थकोविदः॥
हिंदी अर्थ: वे जीवलोक के रक्षक, धर्म के परिरक्षक, वेद-वेदांग के तत्त्वज्ञ और सभी शास्त्रों के अर्थ के कोविद (पारंगत) हैं।
राम के लोकरक्षण, धर्मरक्षण एवं शास्त्रज्ञान का वर्णन।

श्लोक 15

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आदिपुरुषः साक्षात् परमात्मा नराकृतिः। अवतीर्णः कृपासिन्धुः रामचन्द्रः सनातनः॥
हिंदी अर्थ: वे साक्षात् आदिपुरुष, परमात्मा, मनुष्य रूप में अवतीर्ण, कृपा के सागर एवं सनातन रामचन्द्र हैं।
राम के दिव्य स्वरूप एवं अवतार का वर्णन।

श्लोक 16

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तस्य भ्राता चतुर्वर्षात् लक्ष्मणः शत्रुसूदनः। भरतश्च शत्रुघ्नश्च सर्वे रामानुजाः प्रियाः॥
हिंदी अर्थ: उनके चार भाई हैं – लक्ष्मण (शत्रुसूदन), भरत और शत्रुघ्न। ये सभी राम के अनुज (छोटे भाई) और प्रिय हैं।
राम के तीन भाइयों (लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न) का परिचय।

श्लोक 17

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रामो लक्ष्मणपूर्वश्च भरतः शत्रुघ्नेन च। सीतापि राघवं प्राप्ता पतिव्रता च सुन्दरी॥
हिंदी अर्थ: राम, लक्ष्मण सहित, भरत शत्रुघ्न सहित, और सीता जो पतिव्रता एवं सुंदरी हैं, राघव (राम) को प्राप्त हुईं।
राम के साथ लक्ष्मण, भरत के साथ शत्रुघ्न एवं सीता के राम से मिलन का वर्णन।

श्लोक 18

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रामः सीता च लक्ष्मणः प्रविष्टो दण्डकावनम्। जनस्थाने वसन्तस्ते राक्षसैः समुपद्रुताः॥
हिंदी अर्थ: राम, सीता और लक्ष्मण दण्डकावन में प्रविष्ट हुए। जनस्थान में रहते हुए वे राक्षसों द्वारा उपद्रवित हुए।
राम, सीता, लक्ष्मण के वनगमन एवं राक्षसों द्वारा उत्पीड़न का वर्णन।

श्लोक 19

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तत्र रामेण वै सीता राक्षसैः समुपद्रुता। निरस्ता राक्षसाः सर्वे ये चान्ये तत्र राक्षसाः॥
हिंदी अर्थ: वहाँ राम द्वारा सीता (की रक्षा हुई) जो राक्षसों से उपद्रवित थी। उन सभी राक्षसों को मार गिराया गया, तथा अन्य जो भी राक्षस वहाँ थे।
राम द्वारा सीता की रक्षा एवं राक्षसों के वध का वर्णन।

श्लोक 20

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ततः शूर्पणखा नाम राक्षसी कामरूपिणी। अभ्यगच्छद् वनं तत्र यत्र रामः सलक्ष्मणः॥
हिंदी अर्थ: तब शूर्पणखा नाम की कामरूपिणी (मनचाहा रूप धारण करने वाली) राक्षसी उस वन में आई, जहाँ राम लक्ष्मण सहित थे।
शूर्पणखा के वन में आगमन का वर्णन।