अध्याय 1: संक्षेप रामायण
श्लोक 12
संक्षेप रामायण – श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
सत्यविक्रमवीर्याभ्यां महद्भ्यामिव सागरः। सदा समुदितो रामः प्रजानां हितकाम्यया॥
हिंदी अनुवाद
सत्य, विक्रम और वीर्य रूपी दो महान् सागरों के समान (गहरे) राम सदा प्रजा के हित की कामना से युक्त रहते हैं।
अर्थ / व्याख्या
राम के सत्य, पराक्रम एवं वीर्य की गहराई तथा प्रजापालन की भावना का वर्णन।
टिप्पणी
यहाँ सत्य, विक्रम और वीर्य – इन तीनों को समुद्र के समान अपार बताया गया है, और राम उनसे युक्त होकर भी प्रजाहित में लीन हैं।
॥ श्लोक १२ ॥
सत्यविक्रमवीर्याभ्यां महद्भ्यामिव सागरः। सदा समुदितो रामः प्रजानां हितकाम्यया॥
satyavikramavīryābhyāṃ mahadbhyāmiva sāgaraḥ | sadā samudito rāmaḥ prajānāṃ hitakāmyayā ||
🔹 हिन्दी : सत्य, विक्रम और वीर्य रूपी दो महान् सागरों के समान राम सदा प्रजा के हित की कामना से युक्त रहते हैं।
🔹 English : Rama, who is like a great ocean in truth, prowess, and valor, is always risen (active) for the welfare of his people.
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| सत्यविक्रमवीर्याभ्याम् | सत्य, विक्रम और वीर्य रूपी दो से |
| महद्भ्याम् | महान् दो से |
| इव | जैसे |
| सागरः | सागर |
| सदा | सदा |
| समुदितः | उदित / तत्पर |
| रामः | राम |
| प्रजानाम् | प्रजा की |
| हितकाम्यया | हित की इच्छा से |
राजा का प्रजापालन ही परम धर्म है। राम इसी भावना से सदा ओत-प्रोत हैं।