संक्षेप रामायण – श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः। स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः॥
हिंदी अनुवाद
वे आर्य (सभ्य/श्रेष्ठ), सभी के प्रति समान भाव रखने वाले, सदा प्रियदर्शन (सुंदर) हैं। वे सभी गुणों से युक्त एवं कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाले हैं।
अर्थ / व्याख्या
राम के चरित्र की उदात्तता एवं माता के प्रति उनके विशेष संबंध का वर्णन।
टिप्पणी
यहाँ "सर्वसमः" राम की समदर्शिता को दर्शाता है, जो एक आदर्श राजा का लक्षण है। कौसल्यानन्दवर्धन कहकर उनके पारिवारिक प्रेम का उल्लेख।
॥ श्लोक ११ ॥
🔹 हिन्दी : आर्य, सभी के प्रति समान, सदा प्रियदर्शन, सभी गुणों से युक्त एवं कौसल्या के आनंदवर्धन हैं।
🔹 English : Noble, impartial towards all, always pleasing to behold, endowed with all virtues, and the increaser of Kausalya's joy.
🔍 शब्दार्थ
| संस्कृत | हिन्दी अर्थ |
|---|---|
| आर्यः | सभ्य/श्रेष्ठ |
| सर्वसमः | सभी के प्रति समान |
| च | और |
| एव | ही |
| सदैव | सदा |
| प्रियदर्शनः | प्रिय दर्शन वाला |
| सः | वह |
| च | और |
| सर्वगुणोपेतः | सभी गुणों से युक्त |
| कौसल्यानन्दवर्धनः | कौसल्या के आनंद को बढ़ाने वाला |
यह श्लोक राम के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है – सामाजिक (आर्य), नैतिक (सर्वसम), सौंदर्य (प्रियदर्शन) और पारिवारिक (कौसल्यानन्दवर्धन)।