संक्षेप रामायण – श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः। सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः॥

हिंदी अनुवाद

वे सभी लोकों के प्रिय, साधु (सज्जन), दीनतारहित (उदार) आत्मा वाले, विचक्षण (कुशल) हैं। सज्जनों द्वारा सदा सेवित हैं, जैसे नदियों द्वारा समुद्र।

अर्थ / व्याख्या

राम की लोकप्रियता एवं सज्जनों द्वारा उनकी सेवा का वर्णन।

टिप्पणी

यहाँ समुद्र-नदी उपमा राम के महान एवं आकर्षक व्यक्तित्व को दर्शाती है, जिसकी ओर सभी सज्जन स्वतः आकर्षित होते हैं।

॥ श्लोक १० ॥

सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः। सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिन्धुभिः॥
sarvalokapriyaḥ sādhuradeenātma vicakṣaṇaḥ | sarvadābhigataḥ sadbhiḥ samudra iva sindhubhiḥ ||

🔹 हिन्दी : सभी लोकों के प्रिय, साधु, दीनतारहित आत्मा वाले, विचक्षण हैं। सज्जनों द्वारा सदा सेवित, जैसे नदियों द्वारा समुद्र।

🔹 English : Dear to all the worlds, gentle, noble-minded, and skillful. Always approached by the virtuous, just as the ocean is by rivers.

🔍 शब्दार्थ

संस्कृतहिन्दी अर्थ
सर्वलोकप्रियःसभी लोकों के प्रिय
साधुःसज्जन
अदीनात्माउदार चित्त वाला
विचक्षणःकुशल
सर्वदासदा
अभिगतःसेवित
सद्भिःसज्जनों द्वारा
समुद्रःसमुद्र
इवजैसे
सिन्धुभिःनदियों द्वारा

यह श्लोक राम के सार्वभौम आकर्षण को प्रदर्शित करता है। वे केवल राजा ही नहीं, बल्कि सज्जनों के हृदय के सम्राट हैं।