संक्षेप रामायण – श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विचक्षणः । सर्वदाभिगतः सद्भिः सर्वचारित्रवान् शुचिः ॥
हिंदी अनुवाद
जो सब लोकों को प्रिय हो, साधु हो, उदासीन या दीन न हो, चतुर हो, सज्जनों से सदा पूजित हो, सब प्रकार के चरित्र से युक्त हो और पवित्र हो।
अर्थ / व्याख्या
वाल्मीकि ने आदर्श पुरुष के और गुण बताए – लोकप्रियता, साधुता, अदीनता, चतुराई, सज्जनों द्वारा सम्मान, सर्वगुणसम्पन्नता और पवित्रता।
टिप्पणी
यह श्लोक वाल्मीकि के प्रश्नों की शृंखला को पूरा करता है। इन सभी गुणों का समावेश श्रीराम के चरित्र में है। सर्वदाभिगतः सद्भिः का अर्थ है कि वे सदा सज्जनों द्वारा सेवित रहते हैं। सर्वचारित्रवान् का अर्थ है सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त। शुचिः का अर्थ बाहरी और आंतरिक शुद्धि।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – प्रथम सर्ग – षष्ठ श्लोक ॥
सर्वदाभिगतः सद्भिः सर्वचारित्रवान् शुचिः ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : जो सब लोकों को प्रिय हो, साधु हो, उदासीन या दीन न हो, चतुर हो, सज्जनों से सदा पूजित हो, सब प्रकार के चरित्र से युक्त हो और पवित्र हो।
🔹 English Translation : Who is beloved of all people, virtuous, not depressed, clever, always approached by good people, of excellent conduct, and pure.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सर्वलोकप्रियः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सभी लोकों को प्रिय |
| साधुः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सज्जन, उत्तम |
| अदीनात्मा | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (अदीन + आत्मन्) | दीनता रहित, उत्साही |
| विचक्षणः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | चतुर, निपुण |
| सर्वदा | अव्यय | सदा |
| अभिगतः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (अभि + गम् + क्त) | पूजित, सेवित, प्राप्त |
| सद्भिः | विशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन (सत्) | सज्जनों द्वारा |
| सर्वचारित्रवान् | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सभी प्रकार के आचरणों से युक्त |
| शुचिः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | पवित्र, शुद्ध |
📜 साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक वाल्मीकि द्वारा पूछे गए गुणों की सूची का समापन करता है। कुल मिलाकर, वाल्मीकि ने लगभग 16 गुणों का उल्लेख किया है, जो एक आदर्श पुरुष में होने चाहिए। नारद आगे इन सभी गुणों से युक्त श्रीराम का वर्णन करेंगे। यहाँ सर्वलोकप्रियः राम की सार्वजनिक स्वीकार्यता को दर्शाता है। सद्भिः अभिगतः – सज्जन लोग उनका सदा संग करते हैं। शुचिः – वे सदा पवित्र हैं।
व्याकरणिक दृष्टि से सर्वदाभिगतः में सन्धि है (सर्वदा + अभिगतः)। सद्भिः तृतीया बहुवचन का प्रयोग कर्ता के अर्थ में हुआ है (सज्जनों द्वारा)।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
ये सभी गुण एक आदर्श मानव के लक्षण हैं। अदीनात्मा का अर्थ है जो कभी निराश न हो, सदा आशावान रहे। विचक्षणः – व्यवहारकुशल। सर्वचारित्रवान् – जिसका चरित्र सर्वांगीण हो। हमें इन गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए।
॥ जय श्री राम ॥