संक्षेप रामायण – श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ॥

हिंदी अनुवाद

जो जीवलोक का रक्षक हो, धर्म की रक्षा करने वाला हो, वेद और वेदांगों के तत्त्व को जानने वाला हो और धनुर्वेद में निष्ठावान् हो।

अर्थ / व्याख्या

वाल्मीकि आगे पूछते हैं – ऐसा कौन है जो जीवों का रक्षक, धर्म का संरक्षक, वेद-वेदांग का ज्ञाता और धनुर्वेद में पारंगत हो।

टिप्पणी

यह श्लोक राजा या शासक के आवश्यक गुणों का वर्णन करता है। रक्षिता जीवलोकस्य से तात्पर्य है कि वह प्रजा का पालनकर्ता हो। धर्मस्य परिरक्षिता – वह धर्म की रक्षा करे। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञ – उसे शास्त्रों का ज्ञान हो। धनुर्वेदे निष्ठितः – वह युद्धकला में निपुण हो। ये सभी गुण श्रीराम में विद्यमान थे।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड – प्रथम सर्ग – पञ्चम श्लोक ॥

रक्षिता जीवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ॥
rakṣitā jīvalokasya dharmasya parirakṣitā | vedavedāṅgatattvajño dhanurvede ca niṣṭhitaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : जो जीवलोक का रक्षक हो, धर्म की रक्षा करने वाला हो, वेद और वेदांगों के तत्त्व को जानने वाला हो और धनुर्वेद में निष्ठावान् हो।

🔹 English Translation : Who is the protector of the living world, the preserver of dharma, knower of the essence of Vedas and Vedangas, and proficient in the science of archery.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
रक्षितासंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनरक्षक, पालनकर्ता
जीवलोकस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचनप्राणियों के लोक का
धर्मस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचनधर्म का
परिरक्षितासंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनभलीभाँति रक्षा करने वाला
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनवेद और वेदांगों के सत्य को जानने वाला
धनुर्वेदेपुल्लिंग, सप्तमी एकवचनधनुर्वेद (शस्त्रविद्या) में
अव्ययऔर
निष्ठितःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचननिष्ठावान्, पारंगत

📚 व्याख्या एवं ऐतिहासिक संदर्भ

यह श्लोक आदर्श राजा के चार आवश्यक कर्तव्यों को रेखांकित करता है: प्रजापालन, धर्मसंरक्षण, शास्त्रज्ञान और शस्त्रकौशल। प्राचीन भारत में राजा को लोकपाल कहा जाता था। धनुर्वेद न केवल युद्धविद्या है, बल्कि यह आयुर्वेद का भी एक उपांग माना जाता है, जिसमें शस्त्र-शास्त्र का समग्र ज्ञान सम्मिलित है। श्रीराम इन सभी क्षेत्रों में सिद्धहस्त थे।

व्याकरण की दृष्टि से रक्षिता और परिरक्षिता तृजन्त प्रत्ययान्त शब्द हैं, जो कर्ता के अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञः में समास है (वेदाश्च वेदाङ्गानि च, तेषां तत्त्वं वेत्तीति)।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक हमें सिखाता है कि सच्चा नेता वही है जो दूसरों की रक्षा करे, धर्म की स्थापना करे, ज्ञानी हो और अपने कर्म में निपुण हो। हमें भी अपने जीवन में इन गुणों को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए, चाहे हम राजा न हों, पर अपने परिवार और समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारियाँ हैं।

॥ जय श्री राम ॥