श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 32

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 39 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् | सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ||३२||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ये
जो
तु
लेकिन
एतत्
इस
अभ्यसूयन्त
दोष देते हुए
न
नहीं
अनुतिष्ठन्ति
पालन करते
मे
मेरे
मतम्
मत का
सर्वज्ञानविमूढान्
सब प्रकार के ज्ञान से रहित
तान्
उनको
विद्धि
जानो
नष्टान्
नष्ट
अचेतस
विवेकहीन।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु जो लोग इस मेरे मत (उपदेश) में दोष निकालते हुए इसका पालन नहीं करते, उन सब ज्ञानों से रहित, नष्ट और अचेत (विवेकहीन) जानो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता का तृतीय अध्याय 'कर्मयोग' मानव जीवन के व्यावहारिक और आध्यात्मिक पक्षों का एक अद्भुत समन्वय है। इस अध्याय के 32वें श्लोक में, योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को एक अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी देते हैं। यह श्लोक उस मानसिक संकीर्णता, ईर्ष्या और अहंकार पर प्रहार करता है जो मनुष्य को ईश्वर के कल्याणकारी उपदेशों को स्वीकार करने से रोकती है। जब कोई जीव परमात्मा के मत की आलोचना करता है या उसमें दोष ढूंढता है, तो वह केवल एक दार्शनिक सिद्धांत को अस्वीकार नहीं कर रहा होता, बल्कि वह अपनी स्वयं की आध्यात्मिक और मानसिक प्रगति के द्वार बंद कर रहा होता है।

इस श्लोक की ब्रह्मांडीय प्रासंगिकता इस बात में निहित है कि यह सृष्टि के शाश्वत नियमों (ऋत और धर्म) के साथ हमारे तादात्म्य को परिभाषित करता है। भगवान का 'मत' कोई व्यक्तिगत राय नहीं है, बल्कि वह ब्रह्मांड को सुचारू रूप से चलाने वाला परम सत्य है। जो मनुष्य इस सत्य के प्रति द्वेष भाव रखता है, वह अपनी बुद्धि को भ्रमित कर बैठता है। इस विवेचनात्मक लेख में हम इस श्लोक के गहरे आध्यात्मिक रहस्यों, इसके व्यावहारिक निहितार्थों और इसके नियमित पठन से होने वाले चमत्कारी मानसिक व आत्मिक लाभों का विस्तार से अध्ययन करेंगे।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।

सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः ॥ ३२ ॥


ye tv etad abhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam |
sarva-jñāna-vimūḍhāṁs tān viddhi naṣṭān acetasaḥ || 32 ||

श्लोक पाठ एवं साधना की प्रामाणिक विधि:

इस अत्यंत प्रभावशाली श्लोक का पाठ करने के लिए साधक को एक निश्चित और पवित्र विधि का पालन करना चाहिए, जिससे इसके स्पंदन (vibrations) अंतःकरण को शुद्ध कर सकें:

  • 1. शुभ समय (Timing): इस श्लोक का पाठ करने के लिए सर्वोत्तम समय ब्राह्ममुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व सुबह 4:00 से 6:00 बजे) माना गया है। इस समय वातावरण में सत्वगुण की प्रधानता होती है।
  • 2. आसन और दिशा (Posture & Direction): पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के स्वच्छ आसन पर बैठें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें।
  • 3. ध्यान और प्रार्थना (Meditation): पाठ आरंभ करने से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण के सारथी रूप का हृदय में ध्यान करें, जहाँ वे अर्जुन को कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता का उपदेश दे रहे हैं।
  • 4. उच्चारण शुद्धि (Pronunciation): श्लोक के प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट और लयबद्ध होना चाहिए। 'अभ्यसूयन्तो' और 'सर्वज्ञानविमूढांस्तान्' जैसे संयुक्त अक्षरों का उच्चारण करते समय विशेष ध्यान दें।
  • 5. संकल्प (Resolution): मन में यह संकल्प लें कि आप अपने भीतर की ईर्ष्या, संशय और अहंकार का त्याग कर भगवान के शरणागत हो रहे हैं।

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक शब्द में ज्ञान का एक महासागर छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक पद का व्याकरणिक, व्यावहारिक और दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
ये (ye) जो लोग / जो मनुष्य यह उन सभी मनुष्यों की ओर संकेत करता है जो स्वतंत्र इच्छाशक्ति (Free Will) का दुरुपयोग करते हैं।
तु (tu) परन्तु / लेकिन यह शब्द पिछले श्लोक (जिसमें श्रद्धावान भक्तों की प्रशंसा की गई थी) से इस श्लोक के विपरीत स्वभाव वाले लोगों के बीच अंतर स्पष्ट करने के लिए प्रयुक्त हुआ है।
एतत् (etat) इस (उपदेश को) भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिए गए निष्काम कर्मयोग के परम कल्याणकारी और वैज्ञानिक सिद्धांत को दर्शाता है।
अभ्यसूयन्तः (abhyasūyantaḥ) दोषारोपण करते हुए / ईर्ष्या करते हुए अहंकारवश भगवान के वचनों में कमियाँ निकालना। जब मनुष्य स्वयं को ईश्वर से श्रेष्ठ समझने लगता है, तब वह उनके उपदेशों की आलोचना करता है।
न अनुतिष्ठन्ति (na anutiṣṭhanti) पालन नहीं करते हैं ज्ञान को केवल सुनना पर्याप्त नहीं है; उसे आचरण में न उतारना ही पतन का मुख्य कारण बनता है।
मे (me) मेरे यहाँ 'मेरे' शब्द भगवान के साकार और निराकार दोनों रूपों का प्रतिनिधित्व करता है, जो परम सत्ता के सूचक हैं।
मतम् (matam) मत को / सिद्धांत को वह शाश्वत नियम जो जीव को बंधन से मुक्त कर मोक्ष की ओर ले जाता है।
सर्वज्ञानविमूढान् (sarva-jñāna-vimūḍhān) समस्त ज्ञान से सर्वथा रहित / अत्यंत भ्रमित ऐसे लोग भौतिक विद्याओं में निपुण हो सकते हैं, परंतु आत्मज्ञान और जीवन के वास्तविक उद्देश्य के मामले में वे पूर्णतः अज्ञानी होते हैं।
तान् (tān) उनको उन अविश्वासी और संशयवादी व्यक्तियों को संबोधित किया गया है।
विद्धि (viddhi) जानो / समझो भगवान अर्जुन को यह स्पष्ट निर्देश दे रहे हैं कि वे ऐसे लोगों की मानसिक स्थिति को भली-भांति पहचान लें।
नष्टान् (naṣṭān) नष्ट हुए / पतित जो अपने जीवन के अमूल्य अवसर (मानव जन्म) को व्यर्थ गंवा चुके हैं और आध्यात्मिक रूप से मृतप्राय हैं।
अचेतसः (acetasaḥ) चेतनाहीन / विवेकहीन जिनकी बुद्धि और विवेक अंधकारमय हो चुके हैं, जो सही और गलत का अंतर समझने की क्षमता खो चुके हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध की विभीषिका और अर्जुन के विषाद से जुड़ी हुई है। अर्जुन जब अपने ही सगे-संबंधियों को युद्ध भूमि में सामने खड़ा देखता है, तो वह मोहग्रस्त होकर अपने क्षत्रिय धर्म से विमुख होने लगता है। तब भगवान श्रीकृष्ण उसे निष्काम कर्मयोग का उपदेश देते हैं। इस उपदेश के दौरान, भगवान स्पष्ट करते हैं कि सृष्टि का चक्र केवल तभी संतुलित रह सकता है जब प्रत्येक जीव अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन बिना किसी फल की आसक्ति के करे।

इस श्लोक से ठीक पहले (श्लोक 31 में), भगवान ने कहा था कि जो मनुष्य ईर्ष्यारहित होकर, पूर्ण श्रद्धा के साथ मेरे इस मत का अनुसरण करते हैं, वे कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। लेकिन, भगवान केवल सकारात्मक पक्ष बताकर नहीं रुकते। वे एक कुशल शिक्षक की भांति नकारात्मक पक्ष के प्रति भी सचेत करते हैं। वे जानते हैं कि संसार में ऐसे लोग भी होंगे जो अपने अहंकार, संकीर्णता या बौद्धिक घमंड के कारण भगवान के इन वचनों की आलोचना करेंगे।

पौराणिक संदर्भ: दुर्योधन और शिशुपाल का उदाहरण

शास्त्रों में ऐसे कई चरित्रों का वर्णन है जिन्होंने भगवान के प्रत्यक्ष उपदेशों और उनकी सत्ता को चुनौती दी। दुर्योधन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। महाभारत में एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग आता है जहाँ दुर्योधन कहता है:

"जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिः, जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः।"
(अर्थात: मैं धर्म को जानता हूँ, पर उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं है। मैं अधर्म को भी जानता हूँ, पर उससे मेरी निवृत्ति नहीं है।)

दुर्योधन का यह वक्तव्य 'अचेतसः' (विवेकहीनता) और 'अभ्यसूयन्तः' (ईर्ष्या) की पराकाष्ठा है। वह भगवान श्रीकृष्ण की महिमा से परिचित था, परंतु उसके भीतर की ईर्ष्या ने उसे भगवान के शांति प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करने दिया। परिणामतः, वह अपने पूरे कुल के विनाश का कारण बना। इसी प्रकार, शिशुपाल ने भगवान श्रीकृष्ण की निरंतर निंदा की, उनके गुणों में दोष ढूंढे, और अंततः अपने विनाश को आमंत्रित किया।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि जब हम किसी सत्य या दिव्य उपदेश की आलोचना केवल इसलिए करते हैं क्योंकि वह हमारे अहंकार या हमारी व्यक्तिगत इच्छाओं के अनुकूल नहीं है, तो हम स्वयं का ही अहित कर रहे होते हैं। वेदों में भी कहा गया है कि 'श्रद्धा' ही ज्ञान की पहली सीढ़ी है। यदि श्रद्धा ही नष्ट हो जाए, तो मनुष्य का विवेक अंधकार में विलीन हो जाता है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित रूप से मनन, चिंतन और पाठ करने से साधक के जीवन में निम्नलिखित सकारात्मक बदलाव आते हैं:

1. अहंकार का शमन (Dissolution of Ego)

यह श्लोक हमें निरंतर याद दिलाता है कि हमारी व्यक्तिगत बुद्धि उस परमेश्वर की समष्टिगत बुद्धि के सामने अत्यंत सूक्ष्म है, जिससे हमारे भीतर का अहंकार शांत होता है।

2. ईर्ष्या और द्वेष से मुक्ति (Freedom from Envy)

'अभ्यसूयन्तः' शब्द पर ध्यान केंद्रित करने से साधक के भीतर दूसरों के प्रति ईर्ष्या और दोष ढूंढने की प्रवृत्ति का नाश होता है।

3. विवेक शक्ति का जागरण (Awakening of Intellect)

इस श्लोक के नियमित पाठ से मस्तिष्क की तंत्रिकाएं (neurons) इस प्रकार सक्रिय होती हैं कि व्यक्ति में सही और गलत का निर्णय लेने की क्षमता (विवेक) बढ़ती है।

4. मानसिक स्पष्टता (Mental Clarity)

यह श्लोक हमें 'सर्वज्ञानविमूढान्' (भ्रमित अवस्था) से बाहर निकालकर जीवन के वास्तविक लक्ष्यों के प्रति मानसिक स्पष्टता प्रदान करता है।

5. सकारात्मक ऊर्जा का संचार (Positive Aura)

इस श्लोक के दिव्य स्पंदन साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और सकारात्मक ऊर्जा क्षेत्र (Aura) का निर्माण करते हैं, जिससे नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं।

6. निष्काम कर्म की प्रेरणा (Inspiration for Selfless Action)

यह श्लोक हमें सचेत करता है कि भगवान के मत (निष्काम कर्मयोग) की उपेक्षा करने से हमारा जीवन व्यर्थ हो सकता है, जिससे हम सही कर्म करने के लिए प्रेरित होते हैं।

7. अवसाद और तनाव से मुक्ति (Relief from Depression)

जब हम अपनी चिंताओं को भगवान के चरणों में समर्पित कर उनके मत को स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारा मानसिक तनाव स्वतः ही समाप्त हो जाता है।

8. आध्यात्मिक सुरक्षा (Spiritual Protection)

यह श्लोक एक कवच की भांति कार्य करता है, जो साधक को नास्तिकता, कुसंगति और वैचारिक भटकाव से बचाता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह समीक्षा 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत आती है, जिसका उद्देश्य श्रीमद्भगवद्गीता के गूढ़ रहस्यों को अत्यंत सरल, सुलभ और व्यावहारिक रूप में पाठकों तक पहुँचाना है। इस विश्लेषण को तैयार करने के लिए प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और भगवद्गीता) के पारंपरिक भाष्यों, विशेष रूप से आदि शंकराचार्य के 'शांकरभाष्य', श्री रामानुजाचार्य के 'श्रीभाष्य' और आधुनिक युग के महान संतों के विचारों का गहन अध्ययन किया गया है।

हमारा उद्देश्य पाठकों को केवल शाब्दिक अर्थ प्रदान करना नहीं है, बल्कि उन्हें उस दार्शनिक गहराई से परिचित कराना है जो उनके दैनिक जीवन के निर्णयों को प्रभावित कर सके। यह सामग्री पूरी तरह से वैदिक सिद्धांतों, संस्कृत व्याकरण के नियमों और सनातन धर्म की समृद्ध व्याख्यात्मक परंपरा पर आधारित है। हम पाठकों से अनुरोध करते हैं कि वे इस श्लोक के संदेश को केवल एक धार्मिक उपदेश न मानकर, मानसिक अनुशासन और आत्म-उन्नति का एक वैज्ञानिक मार्गदर्शक समझें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

'अभ्यसूयन्तः' का अर्थ है किसी के सद्गुणों में भी दोष ढूंढना। जब कोई व्यक्ति भगवान के उपदेशों या धर्म के नियमों को सुनता है, तो उसका अहंकार उसे स्वीकार करने से रोकता है। वह सोचता है, "मैं भगवान की बात क्यों मानूँ? मैं स्वयं बुद्धिमान हूँ।" यह ईर्ष्या और अहंकार मनुष्य की ग्रहणशीलता को समाप्त कर देते हैं। जब ग्रहणशीलता ही नहीं रहती, तो ज्ञान का प्रवेश असंभव हो जाता है, जिससे मनुष्य का पतन निश्चित है।

भगवान श्रीकृष्ण का मत 'निष्काम कर्मयोग' है, जो हमें बिना फल की चिंता किए कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जो व्यक्ति इस मत का पालन नहीं करता, वह सकाम कर्मों (फल की इच्छा वाले कर्मों) के जाल में फंस जाता है। इससे उसे केवल चिंता, तनाव, क्रोध और निराशा ही हाथ लगती है। भगवान कहते हैं कि ऐसे लोग 'नष्टान्' (नष्ट हुए) के समान हैं, क्योंकि वे जीवन के वास्तविक आनंद और मोक्ष के मार्ग से भटक जाते हैं।

हाँ, बिल्कुल। 'सर्वज्ञानविमूढान्' का अर्थ है जो सभी प्रकार के वास्तविक ज्ञान से सर्वथा वंचित और भ्रमित हैं। आधुनिक युग में कोई व्यक्ति बहुत बड़ा वैज्ञानिक, डॉक्टर या इंजीनियर हो सकता है (जो कि भौतिक ज्ञान है), लेकिन यदि उसके पास आत्मज्ञान नहीं है, यदि वह यह नहीं जानता कि जीवन का उद्देश्य क्या है, और वह अपने क्रोध, लोभ व अहंकार पर नियंत्रण नहीं रख सकता, तो आध्यात्मिक दृष्टि से उसे 'विमूढ़' (अत्यंत भ्रमित) ही कहा जाएगा।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 32 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 32/43 74% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!
🕉️
🚩 दैनिक अमृतवाणी

दैनिक पंचांग व पावन व्रत अलर्ट प्राप्त करें

प्रतिदिन प्रातः शुभ मुहूर्त, चौघड़िया एवं एकादशी व्रत कथा सीधे अपने इनबॉक्स में पाएं।

पंचांग
पेज लिंक कॉपी हो गई!