श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 24

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 43 मिनट का पठन 124 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् | सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ||२४||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
उत्सीदेयु
नष्ट हो जाएँ
इमे
ये
लोका
लोक
न
नहीं
कुर्याम्
करूँ
कर्म
कर्म
चेत्
यदि
अहम्
मैं
सङ्करस्य
वर्णसंकर का
च
और
कर्ता
करने वाला
स्याम्
होऊँ
उपहन्याम्
नष्ट करूँ
इमा
इन
प्रजा
प्रजाओं को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सारे लोक नष्ट हो जाएँ। मैं वर्णसंकर का कर्ता होऊँ और इन प्रजाओं का नाश करने वाला बनूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय (कर्मयोग) का २४वां श्लोक संपूर्ण सृष्टि के संचालन, सामाजिक मर्यादा और ईश्वरीय उत्तरदायित्व का एक ऐसा अनुपम दस्तावेज है, जो हमें निष्क्रियता के भयावह परिणामों से सचेत करता है। इस श्लोक में जगद्गुरु भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह समझा रहे हैं कि कर्म केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं है, बल्कि यह समूचे ब्रह्मांडीय संतुलन (Cosmic Order) को बनाए रखने की धुरी है। यदि स्वयं ईश्वर या समाज के मार्गदर्शक (श्रेष्ठ पुरुष) अपने नियत कर्मों का परित्याग कर दें, तो संपूर्ण सामाजिक ढांचा छिन्न-भिन्न हो जाएगा।

संस्कृत वास्तुकला और वैदिक दर्शन के आलोक में, यह श्लोक 'लोकसंग्रह' अर्थात् समाज को एक सूत्र में पिरोए रखने की अवधारणा को प्रतिपादित करता है। भगवान यहाँ स्पष्ट करते हैं कि अधिकार और शक्ति के साथ एक अत्यंत गंभीर उत्तरदायित्व भी आता है। जब समाज के शीर्ष पर बैठे लोग अपने कर्तव्यों से विमुख होते हैं, तो उसका प्रभाव केवल उन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह संपूर्ण जनमानस में अराजकता, नैतिक पतन और वर्णसंकरता (मूल्यों के संकरण) को जन्म देता है। अतः, यह श्लोक हमें सिखाता है कि कर्म से पलायन कभी भी आध्यात्मिक मार्ग नहीं हो सकता, बल्कि निष्काम भाव से किया गया कर्तव्य ही वास्तविक योग है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

॥ श्रीमद्भगवद्गीता - तृतीय अध्याय (कर्मयोग) ॥

"उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ २४ ॥"

देवनागरी लिपि एवं सस्वर पाठ विधि:

इस श्लोक का पाठ शांत चित्त होकर, रीढ़ की हड्डी को सीधा रखकर, पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट और लयबद्ध होना चाहिए ताकि इसके स्पंदन (Vibrations) हृदय में सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकें।

रोमन लिप्यंतरण (Transliteration):

"utsīdeyur ime lokā na kuryāṁ karma ced aham |
saṅkarasya ca kartā syām upahanyām imāḥ prajāḥ || 24 ||"

सरल काव्यानुवाद (भावार्थ):

"यदि मैं भी कर्तव्य तजूं, तो जग सारा नश जायेगा।
वर्णसंकरता का कारण, यह मेरा रूप कहायेगा॥
प्रजा नष्ट हो जायेगी सब, यदि मैं कर्म न आज करूँ।
अतः जगत के पालन हित, मैं भी निज कर्तव्य करूँ॥"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning & Interpretation)

इस श्लोक के प्रत्येक पद में गहन दार्शनिक रहस्य छिपे हुए हैं। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से हम प्रत्येक शब्द के व्याकरणिक, व्यावहारिक और आध्यात्मिक अर्थ को विस्तार से समझेंगे:

पद / शब्द (Sanskrit Word) सरल हिंदी अर्थ (Literal Meaning) आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ (Deep Philosophical Significance)
उत्सीदेयुः (Utsīdeyuḥ) नष्ट हो जाएँगे / छिन्न-भिन्न हो जाएँगे यदि कर्म की श्रृंखला टूट जाए, तो संपूर्ण सृष्टि में प्रलय या घोर अव्यवस्था व्याप्त हो जाएगी। यह विनाश भौतिक और नैतिक दोनों स्तरों पर होगा।
इमे (Ime) ये सभी यह केवल पृथ्वी लोक के लिए नहीं, बल्कि समस्त चौदह भुवनों और उनमें निवास करने वाले सभी प्राणियों की ओर संकेत करता है।
लोकाः (Lokāḥ) संसार / समस्त लोक विभिन्न आयामों में फैले हुए जीवन के चक्र और सामाजिक व्यवस्थाएं, जो एक-दूसरे पर आश्रित हैं।
न कुर्याम् (Na Kuryām) यदि मैं न करूँ भगवान कृष्ण स्वयं को एक कर्ता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जो बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के केवल जगत कल्याण के लिए निरंतर क्रियाशील रहते हैं।
कर्म (Karma) कर्तव्य कर्म / नियत कार्य सृष्टि के नियमों के अनुसार निर्धारित किए गए वे कार्य जो ब्रह्मांडीय संतुलन और सामाजिक मर्यादा को बनाए रखने के लिए आवश्यक हैं।
चेत् (Cet) यदि (If) यह एक परिकल्पनात्मक स्थिति है, जिसके माध्यम से भगवान अर्जुन को निष्क्रियता के भयानक दुष्परिणामों की कल्पना करने के लिए प्रेरित करते हैं।
अहम् (Aham) मैं (स्वयं परमेश्वर) यहाँ 'अहम्' शब्द अहंकार का सूचक नहीं, बल्कि उस परम चेतना का प्रतीक है जो संपूर्ण ब्रह्मांड की नियंता और आधार है।
सङ्करस्य (Saṅkarasya) वर्णसंकरता का / अवांछित मिश्रण का नैतिक मूल्यों, कर्तव्यों और सामाजिक मर्यादाओं के घालमेल से उत्पन्न होने वाली अराजकता, जहाँ धर्म और अधर्म का भेद समाप्त हो जाता है।
च (Ca) और (And) यह दो विनाशकारी परिणामों को जोड़ने वाला संयोजक है - सामाजिक पतन और व्यक्तिगत विनाश।
कर्ता (Kartā) उत्पन्न करने वाला / जिम्मेदार यदि भगवान निष्क्रिय हो जाएं, तो वे अप्रत्यक्ष रूप से इस संसार में फैलने वाली बुराई और विनाश के उत्तरदायी बन जाएंगे, जो उनके दयालु स्वरूप के विपरीत है।
स्याम् (Syām) हो जाऊँगा यह भगवान की उस करुणा को दर्शाता है जिसके तहत वे कभी भी अपनी प्रजा के पतन का कारण नहीं बनना चाहते।
उपहन्याम् (Upahanyām) नष्ट करने वाला / हनन करने वाला कर्तव्यहीनता अंततः विनाश की ओर ले जाती है। भगवान कहते हैं कि कर्म न करके मैं अपनी ही बनाई हुई सृष्टि का संहारक बन जाऊँगा।
इमाः प्रजाः (Imāḥ Prajāḥ) इन समस्त प्रजाओं को / जीवों को संसार के समस्त प्राणी जो ईश्वर की संतान हैं और अपने अस्तित्व के लिए उनके द्वारा स्थापित नियमों पर निर्भर हैं।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध की रणभूमि से जुड़ी है। अर्जुन, जो अपने समय के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे, अपने ही सगे-संबंधियों, गुरुओं और पिताओं के समान पूज्य भीष्म पितामह को युद्ध क्षेत्र में सामने देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं। वे अपने धनुष 'गांडीव' को रख देते हैं और युद्ध न करने का निर्णय लेते हैं। अर्जुन का तर्क था कि युद्ध से कुल का नाश होगा, स्त्रियाँ दूषित होंगी और वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होंगी। वे सन्यास लेकर भिक्षाटन करने को श्रेयस्कर मानते हैं।

भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के इस पलायनवादी दृष्टिकोण को पहचानते हैं। वे जानते हैं कि अर्जुन का यह वैराग्य वास्तविक ज्ञान से नहीं, बल्कि कायरता और मोह से उत्पन्न हुआ है। यदि अर्जुन जैसा महान योद्धा और समाज का नायक अपने क्षत्रिय धर्म (कर्तव्य) से विमुख हो जाएगा, तो समाज में एक अत्यंत गलत संदेश जाएगा। साधारण मनुष्य हमेशा अपने नेताओं और महापुरुषों के आचरण का अनुकरण करते हैं ("यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः")। यदि अर्जुन युद्ध से भाग खड़ा होता, तो आने वाली पीढ़ियां अधर्म के विरुद्ध खड़े होने का साहस खो देतीं।

इस संदर्भ में, भगवान कृष्ण स्वयं का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि यद्यपि वे तीनों लोकों के स्वामी हैं, उनके लिए कुछ भी पाना शेष नहीं है और न ही उनका कोई व्यक्तिगत स्वार्थ है, फिर भी वे निरंतर कर्म करते हैं। वे द्वारका के राजा के रूप में, पांडवों के दूत के रूप में, और यहाँ तक कि अर्जुन के रथ के सारथी के रूप में भी अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से पालन कर रहे हैं।

पौराणिक काल में जब-जब धर्म की हानि हुई, तब-तब भगवान ने अवतार लेकर कर्म की महत्ता को स्थापित किया। त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने एक आदर्श पुत्र, पति और राजा के रूप में कठोरतम कर्तव्यों का पालन किया। उन्होंने कभी भी अपने दायित्वों से मुंह नहीं मोड़ा। इसी प्रकार, वेदों और उपनिषदों में भी 'ऋत' (Cosmic Order) की अवधारणा दी गई है, जिसके अनुसार सूर्य, चंद्रमा, वायु और नदियां बिना रुके अपने-अपने कर्मों में लीन हैं। यदि सूर्य उदित होना बंद कर दे या वायु बहना छोड़ दे, तो जीवन का अंत निश्चित है। भगवान कृष्ण इसी शाश्वत सत्य को अर्जुन के समक्ष उजागर कर रहे हैं कि कर्म ही जीवन का मूल आधार है।

नियमित पाठ, जप एवं दर्शन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक के नियमित चिंतन, मनन और इसके अर्थ के ध्यान से साधक को निम्नलिखित अद्भुत आध्यात्मिक, मानसिक और व्यावहारिक लाभ प्राप्त होते हैं:

  • 1
    कर्तव्य बोध की जागृति: यह श्लोक व्यक्ति के भीतर सोई हुई जिम्मेदारी की भावना को जगाता है, जिससे वह अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सहर्ष स्वीकार करता है।
  • 2
    आलस्य और प्रमाद का नाश: इसके नियमित चिंतन से तामसिक प्रवृत्तियों जैसे कि आलस्य, टालमटोल और अकर्मण्यता का समूल नाश होता है और राजसिक व सात्विक ऊर्जा का संचार होता है।
  • 3
    मानसिक स्पष्टता और निर्णय क्षमता: जब व्यक्ति यह समझ जाता है कि कर्म न करना कोई विकल्प नहीं है, तो उसका द्वंद्व समाप्त हो जाता है और वह कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने में सक्षम होता है।
  • 4
    निष्काम कर्मयोग की प्राप्ति: यह श्लोक साधक को फल की चिंता किए बिना, केवल ईश्वर को समर्पित होकर कर्म करने की कला सिखाता है, जो मानसिक शांति का मुख्य स्रोत है।
  • 5
    नेतृत्व गुणों (Leadership Skills) का विकास: यह श्लोक सिखाता है कि एक नेता या मार्गदर्शक का आचरण कैसा होना चाहिए। यह प्रबंधकों और प्रशासकों के लिए एक उत्कृष्ट मार्गदर्शिका है।
  • 6
    सकारात्मक आभा मंडल (Positive Aura): इस श्लोक के स्पंदन से साधक के चारों ओर एक सुरक्षात्मक और ऊर्जावान आभा मंडल का निर्माण होता है, जो नकारात्मक विचारों को दूर रखता है।
  • 7
    कर्म बंधन से मुक्ति: जब कर्म को भगवान की पूजा मानकर किया जाता है, तो वे कर्म साधक को बांधते नहीं हैं, बल्कि उसके पूर्व संचित पापों का क्षय करते हैं।
  • 8
    सामाजिक समरसता की भावना: यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि हमारा हर छोटा-बड़ा कार्य समाज को प्रभावित करता है, जिससे हमारे भीतर परोपकार और संवेदनशीलता की भावना प्रबल होती है।
  • 9
    ईश्वरीय कृपा की अनुभूति: जो मनुष्य भगवान के बताए मार्ग पर चलकर अपने कर्तव्यों का पालन करता है, उसे पग-पग पर ईश्वरीय सुरक्षा और मार्गदर्शन का अनुभव होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context & EEAT Note)

यह विश्लेषण 'संपादकीय रूप से तैयार सामग्री' के अंतर्गत आता है, जिसे वैदिक साहित्य के गहन अध्ययन, आदि शंकराचार्य के गीता भाष्य, रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत भाष्य और आधुनिक दार्शनिक व्याख्याओं के समन्वय से तैयार किया गया है। श्रीमद्भगवद्गीता के इस श्लोक का संदेश शाश्वत और सार्वभौमिक है। यह किसी विशेष जाति, धर्म या काल के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव जाति के लिए है। हमारा उद्देश्य पाठकों तक बिना किसी मिलावट के, शास्त्रों के वास्तविक और व्यावहारिक ज्ञान को सरल भाषा में पहुँचाना है, ताकि वे अपने दैनिक जीवन में धर्म और कर्म के बीच संतुलन स्थापित कर सकें।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

शास्त्रीय संदर्भ में, 'सङ्करस्य' या वर्णसंकरता का अर्थ केवल जैविक मिश्रण नहीं है, बल्कि इसका गहरा अर्थ कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों का घालमेल है। जब समाज में लोग अपने निर्धारित कर्तव्यों (स्वधर्म) को छोड़कर दूसरों के कार्यों में हस्तक्षेप करने लगते हैं या बिना योग्यता के अधिकार प्राप्त कर लेते हैं, तो सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाती है। व्यावहारिक रूप से, इसका अर्थ उस अराजकता से है जहाँ सही और गलत, न्याय और अन्याय के बीच की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं और समाज पतन की ओर अग्रसर होता है।

भगवान कृष्ण स्वयं स्पष्ट करते हैं कि उनके लिए तीनों लोकों में न तो कुछ पाना शेष है और न ही कुछ अप्राप्त है। वे पूर्णकाम हैं। लेकिन, वे केवल 'लोकसंग्रह' अर्थात् अपनी बनाई हुई सृष्टि की रक्षा और मनुष्यों के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करने के लिए कर्म करते हैं। यदि वे कर्म नहीं करेंगे, तो अज्ञानी मनुष्य उनके इस व्यवहार को आदर्श मानकर निष्क्रिय हो जाएंगे, जिससे पूरी सृष्टि का विनाश हो जाएगा। ईश्वर का कर्म करना उनकी करुणा और प्रेम का प्रतीक है।

आज के समय में 'लोकसंग्रह' का अर्थ है सामाजिक उत्तरदायित्व (Corporate Social Responsibility - CSR) और नैतिक नेतृत्व। किसी भी संस्था, कंपनी या समाज के शीर्ष अधिकारियों, राजनेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों को यह समझना चाहिए कि उनके आचरण का अनुसरण उनके अधीन काम करने वाले लोग करते हैं। यदि कोई लीडर समय का पाबंद, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ है, तो उसकी टीम भी वैसी ही बनेगी। इसके विपरीत, यदि लीडर भ्रष्ट या कामचोर होगा, तो पूरी संस्था नष्ट हो जाएगी।

यह श्लोक सन्यास का खंडन नहीं करता, बल्कि 'मिथ्याचार' या झूठे सन्यास का विरोध करता है। गीता के अनुसार, केवल गेरुए वस्त्र धारण कर लेना या कर्मों को बाहर से छोड़ देना सन्यास नहीं है। यदि मन के भीतर वासनाएं और विचार चल रहे हैं, तो वह ढोंग है। वास्तविक सन्यास कर्मों के स्वरूप को छोड़ना नहीं, बल्कि कर्मों के फल के प्रति आसक्ति (Attachment) को छोड़ना है। भगवान कृष्ण अर्जुन को 'कर्म-सन्यास' की जगह 'कर्म-योग' अपनाने की शिक्षा देते हैं।

एक विद्यार्थी के लिए उसका 'स्वधर्म' (कर्तव्य) पढ़ाई करना है, और एक नौकरीपेशा के लिए पूरी ईमानदारी से अपना काम करना। यह श्लोक सिखाता है कि हमें कभी भी अपने तात्कालिक संकटों या मानसिक तनाव से घबराकर अपने कर्तव्यों से भागना नहीं चाहिए। पलायनवाद किसी समस्या का समाधान नहीं है। हमें यह विश्वास रखना चाहिए कि जब हम अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से करते हैं, तो हम ईश्वर के ही कार्य में सहयोग कर रहे होते हैं, और इसका परिणाम हमेशा कल्याणकारी होता है।

"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।"

अपने नियत कर्मों को निष्काम भाव से करते हुए ईश्वर की शरण में रहें। यही जीवन का परम सत्य है।

श्लोक का अर्थ / Meaning

यदि मैं कर्म न करूँ तो लोक नष्ट हो जाएँ और अव्यवस्था फैले। If I do not act, the worlds would be destroyed and chaos would ensue.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 24 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 24/43 56% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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