श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 3 (कर्म योग (Karma Yoga))

अध्याय 3 · श्लोक 23

कर्म योग (Karma Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 43 41 मिनट का पठन 130 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||२३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
यदि
यदि
हि
निश्चय ही
अहम्
मैं
न
नहीं
वर्तेयम्
प्रवृत्त रहूँ
जातु
कभी
कर्मणि
कर्म में
अतन्द्रित
सावधान
मम
मेरा
वर्त्म
मार्ग
अनुवर्तन्ते
अनुसरण करते हैं
मनुष्याः
मनुष्य
पार्थ
हे पार्थ
सर्वशः
सभी प्रकार से।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यदि मैं कभी भी सावधानीपूर्वक कर्म में न लगूँ, तो हे पार्थ! सब मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करेंगे।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय (कर्मयोग) का २३वां श्लोक संपूर्ण सृष्टि के संचालन, सामाजिक व्यवस्था की सुदृढ़ता और मानव मात्र के कर्तव्य-बोध का एक अनुपम और कालजयी दस्तावेज है। इस श्लोक में जगतगुरु भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के माध्यम से संपूर्ण मानवता को यह समझा रहे हैं कि कर्म केवल व्यक्तिगत स्वार्थ या फल की प्राप्ति के लिए नहीं किया जाता, बल्कि यह समष्टि (समाज) के संतुलन और मर्यादा की रक्षा के लिए अनिवार्य है। जब स्वयं पूर्णकाम, अजन्मा और सर्वशक्तिमान ईश्वर मानव रूप में अवतरित होकर बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के निरंतर कर्म में लीन रहते हैं, तो साधारण मनुष्यों के लिए कर्म से विमुख होने का कोई मार्ग ही शेष नहीं बचता। यह श्लोक हमें सिखाता है कि समाज के शीर्ष पर बैठे व्यक्तियों, नेताओं, गुरुओं और विचारकों का आचरण कितना महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि जनसामान्य बिना किसी तर्क के उनके पदचिह्नों का अनुसरण करता है। यदि ईश्वर स्वयं आलस्य रहित होकर कर्म न करें, तो संपूर्ण सृष्टि में अराजकता, अकर्मण्यता और नैतिक पतन का साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। अतः, यह श्लोक केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय संतुलन को बनाए रखने का एक दिव्य सूत्र है, जो हमें अकर्मण्यता के अंधकार से निकालकर निष्काम कर्म के प्रकाश की ओर ले जाता है।

संपूर्ण मूल पाठ / प्रामाणिक श्लोक / विधि

"यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः |

मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ||२३||"

संस्कृत उच्चारण एवं पाठ विधि (Chanting Guide):

इस श्लोक का पाठ अनुष्टुप छंद में किया जाता है। इसका सस्वर पाठ करने से मन में चेतना, स्फूर्ति और कर्तव्य-बोध का उदय होता है। पाठ करते समय निम्नलिखित बिंदुओं का ध्यान रखें:

  • शुद्धि और आसन: प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  • उच्चारण स्पष्टता: 'ह्यहं' का उच्चारण 'ह्य-अहम्' की भांति करें और 'कर्मण्यतन्द्रितः' को 'कर्मणि-अतन्द्रितः' के संधि-विच्छेद के भाव के साथ स्पष्ट बोलें।
  • ध्यान मुद्रा: हृदय कमल में रथ पर सारथी के रूप में विराजमान भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए इस श्लोक का कम से कम ११ या २१ बार जप करें।

काव्य रूप में सरल अनुवाद:

"हे पार्थ! यदि मैं कभी भी आलस्य से रहित होकर अपने नियत कर्मों को न करूँ, तो यह निश्चित है कि सभी मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करने लगेंगे, जिससे संपूर्ण सामाजिक और नैतिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाएगी।"

पद-दर-पद शब्दार्थ एवं गूढ़ भावार्थ (Word-by-Word Meaning)

श्लोक के प्रत्येक शब्द में गहन दार्शनिक रहस्य छिपा हुआ है। नीचे दी गई तालिका के माध्यम से प्रत्येक पद के शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ को विस्तार से समझें:

पद / शब्द सरल हिंदी अर्थ आध्यात्मिक एवं दार्शनिक भावार्थ
यदि (Yadi) अगर / यदि एक संभावित परिस्थिति को दर्शाता है, जिसके माध्यम से भगवान अर्जुन को कर्म न करने के दुष्परिणाम समझा रहे हैं।
हि (Hi) निश्चित ही / अवश्य ही यह शब्द इस बात पर बल देता है कि भगवान का आचरण संपूर्ण जगत के लिए एक अकाट्य नियम की तरह है।
अहम् (Aham) मैं (स्वयं परमेश्वर) यहाँ 'अहम्' अहंकार सूचक नहीं, बल्कि सृष्टि के नियंता, सर्वव्यापी परमात्मा श्रीकृष्ण का सूचक है।
न वर्तेयम् (Na Varteyam) प्रवृत्त न होऊँ / कार्य न करूँ यदि भगवान स्वयं को कर्मों से अलग कर लें, तो सृष्टि की गतिशीलता ही समाप्त हो जाएगी।
जातु (Jātu) कभी भी / किसी भी समय यह दर्शाता है कि भगवान के लिए कर्म से विश्राम का कोई क्षण नहीं होता; वे निरंतर क्रियाशील हैं।
कर्मणि (Karmaṇi) कर्तव्य कर्मों में सृष्टि के संचालन, धर्म की स्थापना और मर्यादा की रक्षा के लिए आवश्यक कर्म।
अतन्द्रितः (Atandritaḥ) आलस्य रहित / अत्यंत सावधान होकर बिना थके, बिना प्रमाद के, पूर्ण सजगता के साथ कर्म करना। ईश्वर का प्रत्येक कार्य पूर्णता से युक्त होता है।
मम (Mama) मेरे ही / मेरे द्वारा स्थापित चूँकि ईश्वर ही आदि-पुरुष हैं, इसलिए उनका मार्ग ही सनातन मार्ग (धर्म) कहलाता है।
वर्त्म (Vartma) मार्ग का / आचरण का ईश्वर द्वारा प्रदर्शित जीवन जीने की शैली और नैतिक मूल्यों का मार्ग।
अनुवर्तन्ते (Anuvartante) अनुसरण करते हैं मनुष्य स्वभाव से ही अपने से श्रेष्ठ या पूज्य व्यक्तियों की नकल करता है।
मनुष्याः (Manuṣyāḥ) सभी मनुष्य / मानव समाज संपूर्ण मानव जाति, जो मार्गदर्शन के लिए सदैव उच्च आदर्शों की खोज में रहती है।
पार्थ (Pārtha) हे पृथापुत्र (अर्जुन)! अर्जुन को उनकी माता पृथा (कुंती) के नाम से पुकारकर भगवान उनके क्षत्रिय धर्म और पारिवारिक गौरव का स्मरण कराते हैं।
सर्वशः (Sarvaśaḥ) सब प्रकार से / पूरी तरह से मनुष्य जीवन के हर क्षेत्र में ईश्वर के ही बनाए नियमों और उनके आचरण का अनुकरण करता है।

धार्मिक, पौराणिक एवं शास्त्रीय पृष्ठभूमि (Scriptural Story & History)

इस श्लोक की पृष्ठभूमि महाभारत के कुरुक्षेत्र युद्ध के मैदान से जुड़ी है। अर्जुन जब अपने ही सगे-संबंधियों, गुरुओं और पिताओं को युद्ध भूमि में सामने खड़े देखता है, तो वह मोहग्रस्त हो जाता है। वह अपने धनुष 'गांडीव' को रख देता है और कर्म (युद्ध) से पलायन करने का मन बना लेता है। अर्जुन का तर्क था कि युद्ध करने से कुल का नाश होगा, वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होंगी और समाज में पाप फैलेगा। इसलिए, वह सन्यास लेकर भिक्षा मांगना अधिक श्रेयस्कर समझता है।

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के इस पलायनवादी दृष्टिकोण को पहचानते हैं। वे जानते हैं कि यदि अर्जुन जैसा महान योद्धा और समाज का प्रतिष्ठित नायक युद्ध से पीछे हट गया, तो आने वाली पीढ़ियां इसे कायरता नहीं, बल्कि धर्म मान लेंगी। लोग कहेंगे कि जब अर्जुन ने अधर्म के खिलाफ हथियार नहीं उठाए, तो हमें भी संघर्ष करने की क्या आवश्यकता है? इससे समाज में अधर्म और अन्याय का बोलबाला हो जाएगा।

इस संदर्भ में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं का उदाहरण देते हैं। वे कहते हैं कि तीनों लोकों में मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है, न ही मुझे कुछ प्राप्त करना है जो मुझे प्राप्त न हो, फिर भी मैं निरंतर कर्म करता हूँ। भगवान का जीवन चरित्र देखें तो वे द्वारका के राजा, पांडवों के दूत, और कुरुक्षेत्र में एक साधारण सारथी की भूमिका निभा रहे हैं। वे सुबह उठकर संध्यावंदन करते हैं, यज्ञ करते हैं, और समाज की मर्यादाओं का पालन करते हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में भी वर्णन आता है कि नारद जी जब द्वारका गए, तो उन्होंने देखा कि भगवान श्रीकृष्ण गृहस्थ धर्म के सभी नियमों का अत्यंत निष्ठापूर्वक पालन कर रहे थे।

भगवान अर्जुन को समझाते हैं कि यदि वे स्वयं 'अतन्द्रितः' (बिना आलस्य के) कर्म न करें, तो लोग भी अकर्मण्य हो जाएंगे। राजा जनक जैसे महापुरुषों ने भी कर्म के माध्यम से ही परम सिद्धि प्राप्त की थी। अतः, समाज के कल्याण (लोकसंग्रह) के लिए कर्म करना अनिवार्य है। यह श्लोक हमें यह संदेश देता है कि हम चाहे जितने भी ऊंचे आध्यात्मिक स्तर पर क्यों न पहुँच जाएं, हमें समाज के सामने एक आदर्श प्रस्तुत करने के लिए अपने नियत कर्तव्यों का पालन करते रहना चाहिए।

नियमित पाठ, जप एवं मनन के सिद्ध आध्यात्मिक व मानसिक लाभ

इस श्लोक का नियमित चिंतन, मनन और पाठ करने से साधक के जीवन में चमत्कारी परिवर्तन आते हैं। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:

  • 1
    आलस्य और प्रमाद का नाश: यह श्लोक साधक के भीतर छिपे हुए आलस्य (Tamas) को नष्ट कर रज और सत्व गुणों का विकास करता है, जिससे कार्यक्षमता बढ़ती है।
  • 2
    कर्तव्य-बोध की जागृति: व्यक्ति अपने पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक दायित्वों को बोझ न मानकर उन्हें ईश्वर की सेवा के रूप में स्वीकार करने लगता है।
  • 3
    नेतृत्व क्षमता (Leadership) का विकास: यह श्लोक सिखाता है कि एक अच्छा नेता वही है जो स्वयं आचरण करके दूसरों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करता है।
  • 4
    निष्काम कर्मयोग की प्राप्ति: फल की चिंता किए बिना केवल कर्तव्य भावना से कर्म करने की कला विकसित होती है, जिससे मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है।
  • 5
    सकारात्मक ऊर्जा का संचार: श्लोक के स्पंदन से मस्तिष्क में सकारात्मक तरंगें उत्पन्न होती हैं, जो अवसाद और निराशा को दूर भगाती हैं।
  • 6
    अहंकार का शमन: जब मनुष्य देखता है कि स्वयं सृष्टि के स्वामी भी कर्म में लीन हैं, तो उसका यह भ्रम टूट जाता है कि वह बहुत बड़ा कर्ता है।
  • 7
    सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि: जो व्यक्ति इस श्लोक के भाव को जीवन में उतारकर अनुशासित आचरण करता है, उसे समाज में अत्यधिक सम्मान और यश प्राप्त होता है।
  • 8
    चित्त की शुद्धि: निष्काम भाव से किए गए कर्मों से संचित पाप कर्मों का क्षय होता है और अंतःकरण निर्मल हो जाता है।
  • 9
    ईश्वरीय कृपा की अनुभूति: भगवान के वचनों पर अटूट विश्वास रखने वाले साधक को हर संकट में भगवान श्रीकृष्ण के अदृश्य संरक्षण का अनुभव होता है।

संपादकीय समीक्षा एवं प्रामाणिक संदर्भ (Editorial Context)

यह विश्लेषण श्रीमद्भगवद्गीता के शांकरभाष्य, रामानुजभाष्य और आधुनिक युग के महान संतों जैसे स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद और स्वामी चिन्मयानंद के विचारों के गहन अध्ययन पर आधारित है। यह संपादकीय रूप से तैयार सामग्री पाठकों को गीता के व्यावहारिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों से परिचित कराने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। गीता का यह श्लोक आज के आधुनिक कॉर्पोरेट जगत, पारिवारिक जीवन और व्यक्तिगत विकास के लिए भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि पांच हजार वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र के मैदान में था। यहाँ दी गई व्याख्या पूर्णतः प्रामाणिक ग्रंथों के आलोक में की गई है ताकि जिज्ञासुओं को शुद्ध और कल्याणकारी ज्ञान प्राप्त हो सके।

अक्सर पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न (FAQs)

भगवान श्रीकृष्ण पूर्णकाम हैं, उन्हें किसी वस्तु की लालसा नहीं है। परंतु, वे जानते हैं कि वे समाज के लिए सर्वोच्च आदर्श हैं। यदि वे कर्म करना छोड़ देंगे, तो साधारण मनुष्य भी आलसी हो जाएंगे और अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाएंगे। समाज को पतन से बचाने और मर्यादा स्थापित रखने के लिए भगवान स्वयं को कर्म में लगाए रखते हैं।

'अतन्द्रितः' का अर्थ है - बिना किसी आलस्य, प्रमाद या शिथिलता के, अत्यंत सजग और तत्पर होकर कर्म करना। हमारे दैनिक जीवन में यह शब्द हमें सिखाता है कि हमें अपने कार्यों को टालना (Procrastination) नहीं चाहिए, बल्कि पूरी ऊर्जा और एकाग्रता के साथ उन्हें समय पर पूरा करना चाहिए।

यह श्लोक बाहरी सन्यास (कर्मों को छोड़ देने) का खंडन करता है और आंतरिक सन्यास (कर्मफलों के प्रति आसक्ति को छोड़ देने) का समर्थन करता है। भगवान के अनुसार, केवल गेरुआ वस्त्र धारण कर कर्मों से भागना सच्चा सन्यास नहीं है; बल्कि समाज के बीच रहकर अनासक्त भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करना ही वास्तविक कर्मयोग और सन्यास है।

यह श्लोक आधुनिक प्रबंधकों (Managers) और नेताओं (Leaders) के लिए 'Lead by Example' (उदाहरण प्रस्तुत कर नेतृत्व करना) का स्वर्ण नियम है। यदि किसी संस्था का प्रमुख स्वयं अनुशासित, समय का पाबंद और कर्मठ होगा, तो उसके कर्मचारी स्वतः ही उसका अनुसरण करेंगे। यह श्लोक कार्यस्थल पर कार्य-संस्कृति (Work Culture) को बेहतर बनाने का अचूक मंत्र है।

'लोकसंग्रह' का अर्थ है - समाज का कल्याण, उसकी मर्यादाओं की रक्षा और लोगों को सही मार्ग पर बनाए रखना। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि वे जो भी कर्म करते हैं, वह केवल लोकसंग्रह के लिए ही करते हैं, ताकि समाज में धर्म और मर्यादा की स्थापना बनी रहे।

यद्यपि भगवान के वचनों का स्मरण किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः ४ से ६ बजे) या संध्याकाल में इस श्लोक का पाठ करना मानसिक शांति और एकाग्रता के लिए सर्वाधिक उपयुक्त माना जाता है। कार्य की शुरुआत करने से पहले इसका स्मरण करने से कार्य में सफलता मिलती है।

॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

"अपने नियत कर्मों को निष्काम भाव से करें, यही ईश्वर की सच्ची आराधना है।"

श्लोक का अर्थ / Meaning

यदि भगवान भी कर्म न करें तो सभी मनुष्य उनका अनुसरण करेंगे और अकर्म में लग जाएँगे। If the Lord Himself does not act, all men would follow and become inactive.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 3: कर्म योग (Karma Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 23 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 23/43 53% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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पंचांग
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